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शनिवार, 9 मार्च 2024

तेरी यादें



इस तन्हाई में तेरी 

यादें तो हैं मेरे साथ 

वक्त-वेवक्त, सुख-दुःख

खट्टी मीठी सभी किस्म की यादें।


ठंड में गुन-गुनी धूप 

गर्मी में बांज की घनी छाया

बनी रहती हैं  यादें ।


रात-दिन, उठते-बैठते

खाते-पीते, सोते-जगते

बहती रहती हैं यादें 

कल-कल करती

सदा नीरा की तरह।


कुछ यादें तालाब की लहरों

की तरह किनारे आकर

थककर शांत हो जाती हैं

कुछ भागती गंगा की

लहरों की तरह

छलारें मारती

किनारे पटकती रहती हैं।


कुछ धार के सुरसुरिया बथों

की तरह सहलाती रहती हैं

कुछ बर्फ़ीली साड़ की तरह

काटती रहती हैं।


कुछ कुतक्याळी लगाती रहती हैं

कुछ रुसा भी जाती हैं

इन्हीं के सहारे गुजर रही हैं 

मेरी तन्हाई 

मैं थक जाता हूँ

पर 

थकती नहीं  तेरी यादें।


@ बलबीर राणा 'अडिग'

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