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शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

रवांईं लोक संस्मरण

 


चा पाणि त हयगू, तैका साथ अजाण मनखि ले चटपट बाड़ि बणायिं। #कल्यौ, #गुलथ्या, #लाप्सी #बाड़ी के पर्यावाची शब्द हैं जिन्हें उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है। रवांईं में भी इसे बाड़ी कहते हैं। बाड़ी को हमारे लोक का सुपर फूड कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। बाड़ी गेंहूँ व मंडुवा दोनों के आटे से बनता है और गेहूं का बाड़ी मेहमान नवाजी, विशेष त्यौहारों, देवपूजा में नैवैध्य के रूप में देवताओं को भोग लगाया जाता है। बनाने की विधि में कड़ाई में पानी या दूध डालो उसमें जरुरत अनुसार मीठा व दो चार चम्मच घी उबालना फिर उसमें आटा डाल कर डंडे से घोलना और हल्की मध्यम आँच में मध्यम सारा (टाइट) होने तक मर्दन करते हुए घी के साथ पकाना।

परोसने में थाली में जरुरत अनुसार बाड़ी रखना बाड़ी के बीच में चमच या डाडुला से गहरा करना और जमा या गला घी डालना। फिर घी के साथ सपोड़ा-सपोड़ी।
गढ़वाल की बाड़ी और रवांई की बाड़ी में मामूली फर्क है, रवांई में बनाते समय हल्का नमक का प्रयोग होता है, और मीठा, चीनी या गुड़ थाली में परोसा जाता है कि जितनी जरुरत हो उतना लो। #रवांई में नमकीन बाड़ी के प्रयोग की धारणा है कि मीठे से ज्यादा नमक से बाड़ी तागतवर होता है, ऐसा हमने भी महसूस किया।
बाड़ी का औषधीय उपयोग में प्रसूता व घायल के लिए बहुत उपयोगी माना जाता है।
अब संस्मरण के मूल विषय पर। कि चाय पाणी तो हुआ अनजान आगंतुककों के लिए चटपट अति विशिष्ट भोजन बाड़ी भी खिलाया। रवांईं रामासिरांई गुन्दियाट गाँव में आना ड्यूटी का उपक्रम था, बतौर एन सी सी प्रशिक्षक अटल उत्कृष्ट राजकीय इंटर कॉलेज गुन्दियाट गाँव में एक हफ्ते का प्रशिक्षण कार्यक्रम था। रहने खाने की व्यवस्था विद्यालय की और से की गई थी, वैसे भी ग्रामिण क्षेत्रों में खाने व रहने के ठौर की चिंता नहीं होती है।
सुबह पीटी के तहत गाँव के मध्य से निकल रहे थे, माधव बिजल्वाण सुपुत्र श्री द्वारिका प्रसाद बिजल्वाण जी अपने चौक से आवाज़ देते हैं सर जय हिन्द NCC से हो?
जी हाँ, जय हिन्द, खूब छन, घर में सब कुशल मंगल ?
जी सर सब कुशल, आओ चाय पानी पी जाओ।
बेटा अभी नहीं जरा घूम कर आते हैं।
जी सर वापसी में पक्का चाय नाश्ता करके जाना हम इंतजार करेंगे नहीं तो !!!
अरे पक्का यार।
अनजानो के लिए इतनी आत्मीयता हमारे लोक में ही मिलती है, चाहे रवांई हो या उत्तराखंड के अन्य पहाड़ी क्षेत्र।
घंटा डेड घंटे में वापस आये, मन में नहीं था कि माधव के घर चाय पीनी है। सामान्य औपचारिकता समझ ली थी। पर जब माधव के घर के सामने से गुजर रहे थे तो फिर आवाज़ आयी, सर आ गए ? आओ, आओ हम #जाग्याँ
अब तो जाना ही पड़ा। माधव के घर पर बैठे थे ही थे कि बेटी (माधव की दीदी) पहले पानी फिर चाय ले आयी। सरपट माँ और दादी भी चाय में शामिल हो असल कुशल और छुवीं-बत्त का हिस्सा बन गई। परिचय हेतु बेसिक औपचारिकताएं कि कहाँ से हो? इधर कैसे, कैसे लग रहा है उगैरा उगैरा। बातचीत में पहचान व अपनेपन का सुख दुःख लगने लगा, छुवीं-बत्त में गाँव के एक दो मर्द माणिक भी बैठ गए। मैं ठेरा मातृभाषा प्रेमी, रवांई तो नहीं बोल पा रहा था लेकिन ग़ढ़वाळि व कहीं कहीं पर हिंदी में अपनी तरफ की छुवीं बत्त व संप्रेशण करने लगा। एक आद शब्द छोड़ रवांई अच्छी समझ रहा था। साथी मोहन मन रखने के लिए हुंगरा दे रहा था, रवांईं समझना मुझे इसलिए थोड़ा आसान हो रहा था कि भैजी #महावीर_रवांल्टा जी व अन्य रवांल्टी साहित्यकारों को पढता रहता हूँ।
शारदा काकी (माधव की दादी) कब उठी पता नहीं चला और आधे घंटे में माधव कहता है सर चलो नाश्ता तैयार हो गया। अरे नाश्ता नहीं जी, हमारा नाश्ता बना है। तभी माधव की ब्वे अंदर से आती है, #का_छुवीं_लानी, #कुखि_नि_नौण, पैलि नाश्ता करो। संकोच हो रहा था कि "मान ना मान मैं तेरा मेहमान" माधव हाथ पकड़ कर कीचन में ले गया, बैठने के लिए दरी के ऊपर चौंकले पहले से रखे हुए थे।
काकी चुल्ले के साथ बाड़ी की कड़ाई लिए बैठी थी, बबा आवा बैठा।
काकी (अपनी उम्र के हिसाब से माधव की दादी के लिए मेरा रिश्ता काकी ही बनता था ) यति जल्दी हमूतैं बाड़ी किलै बणायी ?
बबा तुमू मेरा मेमान, मेमान भगवान को रूप रौं, तुमुले नि बड़ौण त #कोयलै बड़ौण।
औ ?? यु ही चरित्र हमारा विशुद्ध लोकै पछयाण छ।
ठिक काकी द्यावा, आज तुमारा हाथक खौला।
काकी ने थाली में बाड़ी परोसी, करछी से बीच में गाढ्ढा किया, दो बड़े चम्मच घी डाला और मुट्ठी भर चीनी थाली के किनारे अलग रखी। मैं और मोहन ( मेरा साथी) ऊहापोह में कि चीनी अलग क्यों, मोहन मेरि तरफ देख रहा था, और माधव अर बौ (माधव की ब्वे) हम दोनों को। मैंने स्थिति पर कंट्रोल करने के लिए, आहा बड्या बोल कर सीधे बाड़ी के कोर पर एकाग्रता रखी। पहला कोर लिया ही था कि समझ में आया चीनी इस लिए अलग सा दिया गया, क्योंकि रवांई में बाड़ी हल्के नमक के साथ बनती है और हमारे यहाँ पूरा मीठे के साथ, हल्का नमकीन, चीनी और घी के साथ और भी अच्छा सवादी (स्वादिष्ट) था। समझ आया कि यहाँ की लोक परम्परा में नमक के साथ ही बाड़ी बनती है। चीनी व घी के साथ मिलकर खूब सपोड़ा फिर छुवीं बातों में अपने यहाँ के मीठे कल्यौ यानि बाड़ी का जिकर किया। शारधा काकी (दादी) बोली, बबा मिठाक साथ बाड़ि मरमरौ कम हौं, अर नूणक साथ खूब मरमरौ रौ, स्वीलड़ू मा बाड़ि बेटमास ले बड्या रौ, बबा स्वीलड़ा मा हम य बाड़ि छक्की खाऊँ तब्बी त यति मरमरा रौ।
हम दोनों के साथ माधव भी खा रहा था, छुवीं बत्त के बीच काकी परोसती रही हम खाते रहे। माधव हिंदी संस्कृति से ग्रेजुएशन कर रहा है, मिलनसार युवा है । बल "जन मयेड़ी तनि जयेड़ी"। दादी, माँ बाप पूरा परिवार मिलनसार एवं अतिथि देवो भव:, सेवा भाव वाले हों तो बच्चों पर संस्कार तो आना ही ठैरा। अतिथि भोजन के बाद काकी से साथ खूब छुवीं बत्त हुई। इस दौरान गाँव में जब किसी से भी औपचारिक बातचीत करो तो आवाभगत के लिए अड़ जाते हैं कि चलो घर में, पर ऐसे जाना जरा संकोच होता ही है।
जहाँ आम शहरी वातावरण में अनजान आगंतुक से दो शब्द सलीके के नहीं बोले जाते हैं व शक की निगाह से देखा जाता है, कौन है? क्यों घूम रहा है? आदि तीखे सवालों से घेरा जाता है वहीं अपने लोक में अनजान आगंतुकों को अथिति रूप में पूजने में संकोच नहीं करते। पूछा जाता है कखा होला, कख होणी दौड़? आवा चा-पाणि पी जावा, जिट घड़ी थौक टेका। सेवाभाव सर्वत्र विराजता है । इसी लिए हमारा लोक साधारणता, सीधेपन व ईमानदारी के लिए विशिष्ट माना जाता है।
@ बलबीर राणा 'अडिग'

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

माँ का सन्दूक



     


    ऐ पूसू लालाऽऽ। है रे कोई घर पर ? माँ ने पुष्कर (पूसू) लाला के चौक की मुंडेर से आवाज लगाई। हाँ, आ रहा हूँ। कौन है ? कैसे लोग हैं पूजा भी नहीं करने देते सुबह सुबह क्या चाहिए होगा ? पुष्कर लाला पूजा की घंटी बजाते हुए मन ही मन बड़बड़ाया। माँ ने पुष्कर लाला के चौक की मुंडेर पर कर्छुले से दरांती निकाल टिकातें हुए बोली, पूसू बाहर आ क्या कर रहा है अन्दर ? घाम दुपहरी को आया है तेरी पूजा अभी तक चल ही रही है अरे ज्यादा पूजा पाठ से नहीं होता जो भाग्य में लिखा है वो मिल जाएगा, जल्दी आ मुझे अभी बहुत काम है। कुछ देर बाद पूसू लाला पूजाघर से बाहर आते हुए बोला, बोजी क्या चाहिए क्यों इतनी हड़बड़ाहट में है ? मिल जायेगा सारी दुकान तुम्हारी ही है। माँ ताना देते हुए बोली, हाँ हाँ दुकान हमारी क्यों नही होनी है ! तेरी दुकान ही तो है मेरा चव्वा खाली करने पर लगी है। लाला, क्या बोल रही है ? क्या हो गया तुझे आज सुबह सुबह ? मेरे पास तो उज्याड़ खाने वाले गाजी भी नहीं है खुंडे पर एक भैंस बंधी है घास पानी खुंडे से बाहर नहीं फिर मुझे क्या सुना रही है आज सुबह- सुबह ।

     अरे लाला उज्याड़ खाया होता तो कोई बात नहीं थी, पर तुने काम ही ऐसा किया कि तेरी धोण काटनी हो रखी है। लाला, काट दे मैने जो इतना गुनाह किया तो। बोल क्या बात है? अपने घर की बात है परेसान न हो। माँ रुआँसी होते हुए बोली, लाला तू मेरे पैंसे वापस दे दे मैने कैसे-कैसे एक-एक करके  जोड़े थे। लाला सकते में, अरे बोजी तेरी तबियत तो ठीक है न ! क्या बोल रही है कौन से पैंसे कैसे पैंसे ? कब दिए तूने मुझे पैंसे ? आ हा हा ! कौन से पैंसे ? देखो कैसे अनजान बन रहा है। ऐसा अन्यों करेगा तो कैसे पचेंगे तुझे ? माँ ने गुस्से में कहा। दुकानदार अचरज में पड़ गया कि मैने इनसे कोई पैंसा लिया नहीं लेकिन ये ऐसा आरोप क्यों लगा रही है। लाला कुछ सोचने के बाद बोला, अच्छा …! तो ये बात है ।

     लाला समझा गया था। लाला हँसते हुए बोला, तभी तों, मैं सोचता था कि ये लड़का डेली पैंसे कहाँ से लाता है। माँ, हाँऽऽ..... ! चल अब दाँत मत निपोड़। इतना मातबर मत बन। तु सोचता तो मेरी घर कूड़ी खाली नहीं होती।  अरे बोजी मैं सोचता था कि अपका बुड़ापे का लड़का है और तुम उसे देते होंगे। अरे इतना तो पार चैंधार वाला मास्टर और तल्ला ख्वाळा का सुबेदार भी नहीं देता अपने बच्चों को। सम्भालो अपने लड़के को। बल ‘सुई पर गीजी च्वोर मौड़ पर गीजी मनस्वाग‘। आज अपने घर का सफाचट कर रहा है कल हमारे घर में भी हाथ साफ करेगा, लाला उपदेश पर आ गया।

     माँ, फिर ताना देते हुए। ओ हो हो....! हे मेरा इमानदार। पूसू तू भला काम नहीं कर रहा है, मेरी जड़ घाम लगेगी तो फिर देख गरीब के आँसू कहाँ लगेंगे। अरे जब तू समझा गया था कि बच्चा घर से पैंसे चुराकर तेरी दुकान से टॉफी बिस्कुट खा रहा है तो तूने हमको क्यों नहीं बताया ? कुछ जमीर बचा या नहीं ? हाँऽऽ... तुम दुकानदारों को तो अपनी बिक्री से मतलब है। अब हिंकी फिंकी न कर और मेरे जितने पैंसे हैं तेरी दुकान में आये हैं उसे लौटा दे। लाला। अच्छा ! कितनी सयानी हो रखी है, जैसे ये सब समान तूने खरीद कर रखे हों मेरे पास। मेरी टोफी बिस्कुट जैसे फ्री के आ रखे होगें। तेरा बेटा पिछले तीन महिने से खुद भी चटका रहा है और अपने दोस्तों को भी खिला रहा है। तभी तो ! मैं कह रहा था कि आजकल मस्तू मास्टर और सोबनी सुबेदार का लड़का तेरे बेटे के साथ एक गळज्यू क्यों हो रखे हैं, हर समय उसके साथ चिपके रहते हैं। कोई चीज होती तो मैं बोलता वापस कर दो, अब खाने वाली चीज कैसे वापिस करोगे ? कर सकते हो तो कर दो मैं आपके पैंस वापस कर दूँगा वैसे एक बार खरीदा हुआ समान वापस नहीं होता।  

     माँ फुसलाने वाले अन्दाज में, चल ये बता वो खडोण्यां आज तक कितने पैंसे लाया होगा तेरे यहाँ ? लाला इतना हिसाब मैंने भी नहीं लगाया लेकिन लगभग पाँचेक सौ से ज्यादा तो चटका गया होगा, तीन महिने से लगभग हर दिन आ रहा वह दुकान में। माँ, यहाँ क्या किसी और दुकान में से भी खाता होगा, पाँचेक सौं से गड्डी इतनी कम नहीं होती। वो तो कल मेरी नजर पड़ गयी कुट्यारी पर। तू ही बता लाला, मैं तो ठैरी निरपट अनपढ, गिनना मुझे आता नहीं। अब कितने थे पर गठठी से अन्दाज है चारेक हजार से उपर ही होंगे। अब वहाँ आधे भी नहीं हैं। सबसे छोटा एक रुपये के नोट से सौ तक थे, बड़े नोट वहीं है पर छोटे वाले सफाचट कर गया निहोण्यां। चल तुने भी क्या करना दुकानदार सौकार जो है, अपना ही सिक्का खोटा है।  और माँ आँसू पौंछते हुए पुष्कर लाला के घर से निकल गयी।

     इस पूरे वार्तालाभ को मैं लाला के घर के पीछे छुपकर सुन रहा था, मुझे काटो तो खून नहीं। अब आज घर में मेरी जो पूजा होनी थी उससे अभी से कंपकंपी आने लग गयी थी। और उस दिन पहली बार मेरे बाल चित को अपराध बोध का अहसास हुआ। उस दिन शाम को कंडाली से खूब स्वागत हुआ। पिताजी जरा नरम स्वभाव के थे हैरान तो थे लेकिन आखिर माँ के हाथ से कंडाली उन्होने छीनी थी । तात मन कितना दीर्घ और बड़ा होता है यह भी पहली बार महसूस हुआ। एक दो दिन बाद फिर सब सामान्य हो गया था सन्दूक की चाबी अब माँ अपने अंगडी पर रखने लग गयी थी, हाँ चोरी की परिभाषा मेरे दिलो दिमाग में हमेशा के लिए लाॅक हो गया थी। 

     छः सात साल उम्र की वह घटना मुझे जीवन का एक बड़ा सूत्र सिखा गयी थी। पुष्कर लाला के शब्द आज भी कानों में गूँजते रहते हैं कि ‘सुई पर गीजी च्वोर मौड़ पर गीजी मनस्वाग।

     वाकया मेरे बाल्यकाल अस्सी के दशक के उत्तरार्ध का है मेरी उम्र महज छः सात साल की रही होगी। घर में खाने पीने और पहनने ओड़ने की कमी नहीं थी और स्कूल के लिए हप्ते दस दिन में चैवनी अठ्ठनी पॉकेट मनी के रुप मिल जाती थी। एक दिन की बात है मुझे स्कूल के लिए पैंसे चाहिए थे और पिताजी घर पर नहीं थे मैंने माँ से पैंसों की मांग की। माँ अन्दर घरबार में गई मैं भी माँ के पीछे चला था। माँ ने एक छोटे से काठ के सन्दूक की चाबी खोली और उससे एक पोटली निकाली जिसके अन्दर दो तीन मोटी गड्डियां नोटों की थी। माँ ने एक गड्डी के बीच से दो रुपये का नोट मुझे दिया था। उसे गिनना तो नहीं आता था लेकिन नोट का साईज और रंग से पहचान जाती थी कितने का नोट है। उस दिन मैं गड्डियों को देख अचंभित हुआ कि यहाँ तो बहुत माया है। बस क्या था कैसे ना कैसे मैने चाबी रखने की जगह खोज ली और शुरु हो गया वहाँ से नोट खिसकाने। दो तीन महिने तक यह सिलसिला चलता रहा जब तक पकड़ायी नहीं मिली थी।    

     माँ का वह सन्दूक प्रतिकूल परिस्थितियों में हमारे परिवार की लाईफ लाईन थी। सन्दूक क्या वह ऐन मौके पर द्रपदी का कृष्ण था। विषेशकर मेहमान नवाजी में। उस सन्दूक में माँ के जेवर या कपड़े नहीं बल्कि वे जरुरी सामान होते थे जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जरुरत को पूरा करते थे। जैसे सेर पाथी घी, दाल, चीनी, चाय पत्ती, चांवल, एक आध किलो प्याज, आलू और कुछ सूखी सब्जीयाँ। इस राशन का टर्न ओबर माँ अपने हिसाब से करती रहती थी। परिवार में सबको पता तो था कि इसमे कुछ है लेकिन उन्हें ये पता नहीं था कि क्या क्या है और कितना है, इस्तेमाल होने पर ही पता चलता। सन्दूक की चीजें अमरजेन्सी मे इस्तेमाल की जाती थी। 

     माँ के इन पैंसों का स्रोत शादी ब्याह या कारिजों की पौ-पिठें, घर आये मेहमान द्वारा हमारे हाथों में रखे हुए, या गाय भैंस, बकरी के बिक्री पर क्रेता द्वारा दिया गया किलमकुळा आदि होता था। 

     कोरोनाकाल के सुरुवाती लॉकडाउन के दौर में जब सब कुछ बंद हो गया था और लोग दुकानो से भर-भर राशन जमा करने लगे थे तो तब बरबस ही माँ के उस सन्दूक की याद आई कि संग्रह कैसे संकट मोचन होता है। आज बाजारवाद के इस युग में लाओ और खावो की आदत ने लोगों की इस आदत का साथ छुड़वा दिया है। इस डिजीटल दौर में तो लोग घर पर पैंसे भी नहीं रख रहे हैं। लॉकडाउन या कर्फू जैसे अमरजेन्सी हालात में इन्शान खाली हाथ फिर सरकार और संस्थाओं पर हायतौबा !

     बचपन की चोरी की इस घटना ने प्रशंगवस घर पर संग्रह और बचत के महत्व की प्रसांगिकता को और भी स्पष्ट कर दिया है, साथ ही उस डकैती पर गुस्सा, तरस और हँसी भी आती है।

@ बलबीर राणा अडिग   

 

गढ़वाली शब्दों का अर्थ :-

कर्छुले - पगड़ी के अन्दर, बौजी दृ भाभी, चव्वा दृ नीव, उज्याड़ -मवेसियों द्वारा दूसरे के खेत का नुकसान करना, धोण दृ गर्दन, अन्यों दृ अन्या, मातबर दृ ईमानदार, तल्ला ख्वाळे - नीचे का मुहल्ला  सुई पर गीजी च्वोर मौड़ पर गीजी मनस्वाग’- सुई पर चोरी आदत और मुरदे पर बाघ को आदमी के मांस का स्वाद लगना, गळज्यू - एक जी पराण, खडोण्यां - खड्डे डालने लायक (एक प्रकार की गाली) कुट्यारी -पेटली, काठ - लकड़ी, कंडाली - बिच्छू घास, अंगडी - उपर का अंग वस्त्र, निहोण्यां - नहीं होने वाली औलाद (एक प्रकार की गाली), घरबार - घर मे अनाज और अन्य सम्पति रखने का कमरा, सेर पाथी -  एक आध किलो, पौ-पिठें - सगुन, किलमकुळा - जानवर के किले का मोल जिसे सगुन के रुप में दिया जाता है।