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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

वीर वे



काष्ठ कर्मों से वीर विचलित नहीं होते,

लाख झंझावतों में वे धीरज नहीं खोते,

विघ्न वाधाओं को मिशन मूड़ रखकर,

शौर्य गंतव्य पर सदैव गतिमान रहते ।

 

शूल भरी राहों से तनिक ना घबराते,  

पग छालों में भी आह नहीं निकालते,

संकट में शोंणित और वेगवान रहता, 

अपनी विजय पर कभी नहीं इतराते ।

 

इस जग में वो कौन सी बाधा है,

जिसको वीरों ने नहीं साधा है,

बिपत्ति मूल को मिटाने का उनमें, 

मनसा वाचा कर्मणा से मादा है।

 

खड़े गिरी के पाँव उखड़ जाते हैं,

शूरों के कदम जहाँ बड़ जाते हैं,

प्रस्तर भी पानी बन जाता है तब,

जब वे आन बान शान से ठान जाते हैं ।


 

@ बलबीर राणा अडिग 

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

जिंदगी का सफर



 जिंदगी के सफर को 

आहिस्ता ही सही 

पूरा करने का जज्बा रखो

तेज रफ्तार वाले अक्सर 

ठोकर खाके गिर जाते हैं। 

@  बलबीर राणा 'अडिग' 

बुधवार, 8 सितंबर 2021

गजल : आत्महत्या



मत इतना भरने दो कि खुद फूट पड़ों,

एक मासूम सी चोट से ही टूट पड़ो।

 

भाई इतना खुदगर्ज तो नहीं है जीवन,

जो छोटी, अदनी सी बात पर रुठ पड़ो।

 

समस्या धर्ती की है निदान भी यहीं है,

जाने बिना ऐसे मत अनंत में कूद पड़ों।

 

जलजला संभालने वाले भतेरे हैं इर्द गिर्द,

मत खुद को असहाय समझ छूट पड़ो।

 

क्या गुजरेगी उन पर जिन्होने पाला,

उनकी आशाओं को यूँ ना सूट करो ।

 

तेरे जाने से जग खाली नहीं होने वाला,

पल्ला झाड मत अपनत्व को फूक चलो ।

 

आत्महत्या मुक्ति का मार्ग नहीं अडिग,

आत्मा की हद तक जीवन कूट चलो।

 

कूट - संर्घष से जीना

 

रचना : बलबीर राणा अडिग


 

रविवार, 25 जुलाई 2021

पहली गुरु

 


 


नहीं आती थी उसे
गिनती पहाड़ा
पर !
उसने जिन्दगी के हिसाब किताब में
कभी गलती नहीं की ।
 
दिलों को जोड़ना,
बैरीपन घटाना,
दुनियां की रीति नीति का भागफल
और रिस्तों का गुणांक
वह भली भांति जानती थी। 
 
आता था उसे
संसार का रेखागणित ज्यामिति,
उसके त्रिकोणमिती में कोण
हमेशा समकोण रहते थे।
 
मनुष्यता का परिमेय अपरिमेय
कंठस्त था उसको,
गिरस्थी वाणिज्य की तो वो 
मजी हुई वाणिज्यकार थी। 
 
भले
अ, ब, स उसे काला अक्षर 
भैंस बराबर क्यों ना रहा हो 
पर ! उसने
ना कभी गलत गढ़ा,
ना गलत पढ़ा, ना ही पढ़ाया ।
 
उसके शब्दों में
अशुद्धि नहीं होती थी
ना ही व्याकरण में त्रुटि,
क्योंकि भाषा उसके 
पय से निकलती थी ।
उसके
नेह के गीत कविता
होने खाने के छन्द
व्यवहार के मुक्तक
जीवन पथ पर
दिशा र्निदेशित करती हैं।
 
जिन्दगी के हर मोड़ पर
सहारा बनती है
उसकी सुनाई कथा कहानियां।
 
ठोकरों से बचाती हैं
वे एकांकी नाटक
जिसमें वो स्वयं किरदारा रही हो
या मंचन उसके करीब मंचित हुआ हो।   
 
मनसा वाचा कर्मणा से
अडिग रहने का बल देती हैं
पुरखों की जीवनियां, यात्रा वृतान्त
जिसे वह काला टीका लगाते वक्त
मुझे बताया करती थी।
 
कंडाली से चतौड़*
और
मुठ्ठियों से कूटते
अच्छी तरह समझाई थी उसने मुझे
हमारी रीति-रिवाज, देव-धर्म, 
संस्कृति-संस्कार, भलाई बुराई । 
 
उसके अर्थ व्यर्थ नहीं होते थे
समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र
सभी जीवन शास्त्रों की जानकार थी 
मेरी पहली गुरु, शिक्षिका
मेरी माँ लीला देवी राणा।
 
*
कंडाली - बिच्छू घास
चतौड़ -  सेकना / पीटना
 
गुरु पूर्णिमा पर अपनी पहली गुरु माता और सभी गुरुओं को सर्मपित।
 
रचना : बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’


 

शुक्रवार, 11 जून 2021

आठ मुक्तक

 


१.

मेरा चिन्तन गाँव के लिए

मेरा मंथन गाँव के लिए

चाहता हूँ उभरे और कोई भाई

उभरते ही गाँव से जाने के लिए।

 .

वे पलायन पर खूब बातें करते

ग्राम हालात पर चिन्तित दिखते

शहर के आलिशान आशियाने से  

स्टेटसों में बहुत  व्यथित दिखते ।

 ३.

चाहत ने मन को बेमान बनाया  

स्वाद ने रसना को गुलाम बनाया  

लार टपकने से रुकती अब कहाँ 

भौतिकता ने सबको स्वान बनाया।

 ४.

कहाँ है भगवान किसने देखा

क्या होता ईमान किसमें देखा

ऐसे चेतनाहीऩ प्रश्न वालों का   

मर्यादा निदान किसने देखा।

 ५.

धन से खुसी खोजने वालो

हँसी के लिए चमन रौंधने वालो

नहीं मिली सांसे तिजोरी उड़ेल भी

चमन को तिजोरी में भरने वालो । 

 ६.

जल्लादी सीरत पिघल सकती है

पत्थर से जलधारा निकल सकती है

इंशानियत पे आकर तो देख आदमी

भाग्य की रेखा बदल सकती है ।

 ७.

ईमान राजनीति में बिक गई

चाटुकारिता में कलम बिक गई 

अब मत पूछो बिकना क्या बाकी 

कुर्सी की चाह में आत्मा बिक गई।

८.

हम भूखे पेट गुनाहगार बन बैठे

वे खा खा कर बिमार बन बैठे 

चिखते चिल्लाते थे जो जनहित   

वे ही जन के गद्दार बन बैठै ।


@ बलबीर राणा 'अडिग' 

https://adigshabdonkapehara.blogspot.com/

गुरुवार, 12 नवंबर 2020

दिवाली मुक्तक

 


हजारों दिये चाहे जलाओ घर में
झुलाओ झालरों को पूरे शहर में
तम चमक से तिमिर जाने का नहीं
जो राम ना बसा हो अगर उर में।
 
उड़ाओ रॉकेटों को फोड़ों पटाके
चलाओ अनारों को करो धमाके
खुशी नाद बनके गुंजेगी तभी 
जब चले़ कर्म मर्यादा के रास्ते।
 
रहे भान इतना दिवाली अहम ना बने
बारुद और कचरे से माँ धरा ना पटे
जले प्रेम दीप घर और चौक चोबारा
राम लौ से कोई कौना अछूता ना रहे।
 
बटुवे में रोशनी नहीं समाती
बल-दल शक्ति खुशी नहीं लाती 
राम सोच विचार का नाम दिवाली
ये मनुज मन को उज्जास कराती ।
 
जलेगा प्रीत दीप तो अंधिया ढहेगा
निर्मल गंगा के जैसे निर्वाध बहेगा
तन मन पाप मैल से मुक्त होके रहेगा
पर्व पावक था, है, पावक ही रहेगा।
 
दीप छोटा सा है सूर्य अवतार है
धूप ना दे सके फिर भी पहरेदार है
भले एक फूंक का है वो निवाला
लगे देह पर तो फिर वो अंगार है। 
 
भले सुदामा से पिंड छुड़ा लिया हो
दुधिया बल्बों से घर जगमगाया हो 
दुबका तिमिर कौने का भागेगा नहीं  
रामचरित्र दीप जब ना टिमटिमाया हो। 
 
@ बलबीर राणा ‘अडिग’
 
www.adigshabdonkapehara.blogspot.com


 


 

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

मिर्गी वाला

 

पहले गिरता

कटे पेड़ की तरह धड़ाम

फिर अंधड, जलजला

भूकंप, सुनामी

एक साथ थामता

पूरी विनाश लीला को

फिर !

उठ बैठता

शांत सील

जैसा कुछ हुआ ना हो

चुपचाप टटोलता है

बबंडर के अवशेष

शरीर पर।

इस सजा की किसी से

ना सिकवा न शिकायत

हाँ ! आतंकित करता

परिजनों को हमेशा के लिए

थमने का। 

 

@ बलबीर राणा अडिग

Adigshbdonkapehara.blogspot.com