शनिवार, 17 मई 2014

डाळे माया


यूँ अंखियों तें कु समझालू
खुलण त
औंशुन टबरान्दा
लगण त
स्वपनिल स्वेणा देख्दा
मनऽकी बोला ना?
कबि तिरवाल कबि ढ़िस्वाल
कबि उकाल कबि उन्दार
अर दिलऽक !
एऽक कप्त्याट्, कब्ळाट्,
होऽर घबग्याट्
यु पराणी
माया बिगेर रे नि सकदी
मथि वाळा
लोभ दिखायीं मोत लुकयीं 
लोभ मायाक सिक्का द्वी पहलु
बिगेर दौं-किल्वाडा बंधियों
मन-पराण, ज्यू-जागा
सबी बंध्याँ
यु अगासमात्री लग्लू दिनप्रिती
म्यार चौं तरफां घेरण लग्युं,
खैरी औन्दी,
हैंसी-हैंसिक जलणम
रुवे-रुवेक हैंसणम्
होर पीड़ाक छैलाऽम्
ये सुख्याँ होंठड़ियों पर
मुल-मूल्याट!
अरे! डाळा तू किले छे
ये बुडापम मायाक पिछ्वाडी पडि्यों
नया बीज ये बण नि जमी त्
कखी ना कखी त जमोण लग्याँ
सुधि छन वोंतें रुवोणु
जोन पिछवाडी मुड़ी नि देखण,
अवाज पच्छ्याणी त
वर्तमान छे भितर बटिन भट्याणु।

१५ मई २०१४
© सर्वाधिकार सुरक्षित
रचना – बलबीर राणा “अडिग”

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