रविवार, 15 फ़रवरी 2015

"पर" (द्वी घर्यों) वालों का बेलनटाईन डे


जों झुकड़ों प्रेम ज्योत जगी वो रांकाक सारा नि रैन्दा
क्या नाम दिया बेलनटाईन डे अंग्रेज चले गए पूछ थामे हम घिसट रहे हैं । भल मानुसो दिल से सोचो प्रेम प्यार मोहबत माया के लिए कोई घडी समय या दिन चाहिए अगर चाहिए तो वो मानव शरीर ही नहीं हो सकता दानव है या पशु!!  ऐसे प्रेमालाप वाले दिन तो पशुओं या दानवों का आता है । सच कहूँ तो यह दिन " पर " (अनाचार का दोष) वालों का है।  हमारी गढ़वाली में "पर" शब्द को इज्जत पर तीक्ष्ण बाण का घाव माना जाता है अर्थात "पर" उस पर लगता तो द्वी घर्या (दो घरों वाली या वाला) हो जाता है पुरुष हो या महिला।   उसकी औलाद से रिश्ता भी परहेज माना जाता था तो ये दिन पशुवत मनोवृति वाले द्वी घर्या वालों का है जिनके जीवन में प्रेम मात्र एक दिनी होता है । मेरे कटु सत्य को अपने को आधुनिक कहने वाले सहन नहीं कर पाएंगे पर अन्तरात्मा से पूछना जिस दिल में प्रेम की ज्योत जलती है वहां हमेशा अपनत्व का प्रकाश रहता है उसे विशेष दिन की जरुरत नहीं होती । इस दिन का इतिहास जो भी रहा हो लेकिन इसकी भोंडे चलन से यह "पर" वालों का ही दिन लगता है  जो सनातन संस्कृति में अनुचित के साथ औचत्यहीन है।
@ बलबीर राणा अडिग

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

कोटिस प्रणाम


दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी
सुगंध माटी की ललचाती होगी
बंद कमरे में बंद माँ भारती की घुटन
तुमसे सही नहीं जा सकी होगी
आज खुली हवा में सांस लेते देश की
हवा तुम्हें बुलाती होगी।

माटी का कर्ज चुकाया तुमने
अपने स्व को त्याग तुमने
बलिदान दे गए आन बान पर
रंग दे बसंती का चोला पहना तुमने
फांसी के फंदे पर झूलते वक्त
मुस्कराती माँ भारती की तस्बीर देखी होगी
दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी।

शत शत नमन तुम्हें शेर ए हिन्दो
शीश नवा कोटिश प्रणाम
कोटिश प्रणाम
गीत:- बलबीर राणा "अडिग"

प्रकाश आवाज दे रहा है


क्यों मिथ्या भ्रम पाले मित्र
जीवन प्रेम विनोद है
राहें खुली बंद नही
ईश्वर अल्ला भगवान् के बीच का द्वन्द नहीं
अंदर झांको देखो जरा
हर घडी इन्तजार में बैठा है वह
जिसे तलासते फिरते हो
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में
एक ही हाड मांस के पुतले को
कितना अलग देखा तुम्हारी आँखों ने
कब से उसी लाल खून को
काला समझ
बहाते आये
क्या कसूर है उन पंच तत्वों का
उसने एक मूर्ति गड़ी
धर्म जाति की किताब
उसने कभी नहीं पढ़ी
सुनो मुझ अदृश्य प्रकाश की आवाज
जो तुम्हारी आँखों को राहें दिखा रहा
कह रहा हूँ चिल्लाकर
कि!
मैं तुममें से किसी का भी नहीं
मैंने तुम्हें
प्रकृति का सुन्दर विहंगम रूप दिखाया
जो लताओं घटाओं
जीव जीवटताओं को
अपनी गोद में पालती है
और प्यार मुहब्बत का सन्देश देती है
लेकिन !
तुम उसके नियम को तोड़ते चलते गए
खुद के लिए  नफरत फैलाते गए
प्रकृति मेरा आनंद है
जिसका तुमने गाला घोंट मार दिया 
मैं दुःखी हूँ
तुम फिर
कैसे सुखी रह सकते हो।

@ बलबीर राणा "अडिग"