शुक्रवार, 30 मई 2014

बिना साहरे के बेल की दासतां



मैं बेल,  बिना सहारे के 
जमीं पर रेंगता मेरा जीवन
कोई लांघता,  कोई कुचलता
किसी की  सहानुभूति
एक ओर कर देती
बजूद अपना बचाने को 
सहारे के लिए हाथ बढाती रही।
सहचर्य की चाह में 
जमी पर सरकती गयी।
आया यौवन एक से दो, दो से चार
शाखाऐं मेरी बढती गयी। 
चरों ओर रेंग - रेंग कर
एक घेरा बना डाला।
वो घेरा ! एक जाल बन गया
घरोंदा मेरा, कीट पतंगों की पनाह,
भुजगों की आरामगाह
बनके रह गया।
निचे के जीवन को
मारती  गयी।
किसी को न उगने, न पनपने दिया
मैं हत्यारिन बनती गयी।
पत्ते मेरे सूखते रहे, गलते गए।
अभागे यौवन ने फूल उगाये
कुछ सन्तति के लिए लडते रहे,
कुछ दुनियां के दमन में
दम तोडते गए।
इस नारकीय जीवन में
फल मेरे सडते रहे
कीड़ों का निवाला बनते गए। 
और किसी के काम न आये
जीवन भर,
आशमान की ओर  देखती  रही
ऊंचाईयों को ताकती रही।
सुदृड सहारे की चाह में
जीवन काटती रही।
मेरे भी ये अरमानो थे
लताएँ मेरी,
ऊँची डाली पर लटकती
मस्ती करती और  
फल मेरे लटकते झूमते
राहगीर को ललचाते।
मैं अकड़ से कहती  
अधिकार उसी का मुझ पर,
जिसने जीवन संवारा मेरा
लेकिन ?
मेरे अरमान अरमान ही रहे।
अब बृद्धा अवस्था ........
पत्ते साथ छोड गये
बिना आवरण के,
नंगी लताओं के साथ
निडाल ........ असहाय।

रचना :- बलबीर राणा "अडिग"



गुरुवार, 29 मई 2014

फूल का पैगाम




बालों पे सजाओ गजरा बन जाऊं
धागे में गुंथो हार कहलाऊं
बगिया में रह चमन चहकाऊं
घर आँगन खुशुबू बिखराऊं
मन महकाना फर्ज मेरा
दिल बहकाना कर्म मेरा
पैगाम मेरा सुनते जाओ
अपने बजूद में मुझे रमाओ
खुशियों से जीवन गुलजार कर दूं
एक बार तो आजमाओ
सच्चायी प्रकृति जान फिर भी
कांटे एक दूजे को बोये जा रहे हो
कागज़ के मेरे बहुरुपये से
मन को समझाये जा रहे हो
अरे कभी उस राह पर मुझे बिखरा के तो देखो
जिस राह से तेरा बेरी मन गुजरता
फिर देखना
कुंठाओं से भरे दिल में तेरे ऐसा प्रेम जागेगा
अपने संग दूजे को भी दीप्त करेगा।
.
बलबीर राणा "अडिग" 

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सोमवार, 19 मई 2014

भोऽळक सवाल


ब्वेल फोन पर बोली 
बेटा नातिक खुद लगीं
अज्क्याल गर्मी छुटी मा
तों द्वि दिन  घोर ल्येदे
जरा मी भी हरीश देखुला
अपणा पोथी-पंछियोंक घ्यू दूध खळोला
ऐरां! तख बजारुं खाण-प्योंण च 
अजी!!
नि जाणा बल हमें उन पहाड़ों में
म्यार लड़के काळा ह्वे जायेंगे वहां
उनको समर कैंप में हिल स्टेशन जाणा बल
द्वि  हजार फीस दे रखी है 
अर!!
मी चुप.............
ब्वेतें बाणु बणे समझे भुझे,
ब्वे'त माणी,
अपणो खातिर माया मारी,
पर!!
मेरु ज्यू अपणा भोऽळक सवाल छोड़ी ??
इनी कैरी हम अपणी ये पीडी तें
कखी?
इत्गा दूर त् नि लि जाणा च ??
जखक बाटा, माया-ममता,
संस्कृति-संस्कार हर्चीक
वापस ओंण
मुश्किल क्या नामुमकिन ह्वे जावो,  
चलो?
मुछ्यालूऽ जगी पिछने आन्दु।

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बलबीर राणा अडिग