शनिवार, 9 मार्च 2024

विवेचना: जून 2023 की पुरोला घटना देखी और सीख



जून 2023 में उत्तरकाशी जिले के पुरोला में मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू नाबालिग लड़की को बहला फुसला और शादी का झांसा देकर भगा ले जाने की घटना सामने आई। स्थानीय लोगों की जागरुकता और सर्तकता ने नाबालिग को अपहरणकर्ताओं के चंगुल से छुड़ाकर युवकों को पुलिस के हवाला किया। ममला यहीं पर नहीं थमा, इस अपहरण बनाम लव जेहाद पर स्थानीय लोगों का गुस्सा सड़क पर फूटा, नाराज स्थानीय जनता गांव-गांव से ढोल और नगाड़ों के साथ अपने घरों से निकली और मोरी बैंड पर जाम लगाया। इसके साथ आंदोलित ग्रामीणों ने एसडीएम देवानंद शर्मा के माध्यम से राज्यपाल को ज्ञापन भेज कर मुस्लिम समुदाय के अपराधी किस्म के व्यवसायियों को तत्काल इलाके से हटाने की मांग की।  साथ ही पुरोला से मुस्लिम दुकानदारों को हटने का दबाव बनाया। नतीजन तीन दिन बाद 42 दुकानदार अपनी दुकानें छोड़कर भाग निकले। बसरते कुछ दिन बाद कुछ लोग वापिस अपनी दुकानों में आए और फिर यथावत अपना करोबार करने लगे।  
अपेक्षानुकूल घटना पर देश के अन्य हिस्सों से क्रिया प्रतिक्रियाऐं सामने आई। पुरोला की जनता के कदम को जहाँ हिन्दू समुदाया ने सराहा और स्वागतीय बताया वहीं कट्टर पंथीयों को चीरी मची और प्रतिकात्मक विरोध में मुल्ले मौलानाओं ने अपने चिरपरिचित भड़काऊ अंदाज में मुस्लिम समुदाय को जितना भड़काना था भड़काया। कुछ राजनैतिक पार्टीयों और बामपंथियों ने  घटना के मूल को इग्नोर करके अपने आचरण के अनुसार एक पक्ष का पक्ष लिया कि इनको सताया जा रहा है परेशान किया जा रहा है।  पूरे प्रकरण में स्थानीय लोगों द्वार प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने में पूर सहयोग किया और ऐसी कोई अप्रिय घटना सामने नहीं आई जिससे महोल ओर बिगड़े। मामला काफी दिन तक चला।
ये तो थी मामले की संक्षिप्त जानकारी। अब सवाल उठता है कि ऐसा आखिर क्यों और कब तक एक समुदाय को अपराध करने के बाद भी पीड़ित कहा जायेगा। गल्ती भी इन्हीं की और सहानुभूति भी इन्हीं से। क्यों भाई ? आज पूरे भारत में हो रहे अपराधों का ग्राफ देखा जाय तों सत्तर फीसदी छोटे से बड़े अपराध एक वर्ग विशेष से जुड़े मिलेंगे। लेकिन ऐसा लाजमी है कारण ! जब किसी व्यक्ति विशेष के कुकर्म एवं पतिता को उसका पंथ कानून नैतिक मानता हो फिर उसके लिए वह अपराध नहीं अराध्य का आदेश लगता। यह कैसे ? तो दिन मे पाँच बार की जमाज की शुरुवात में क्या दोहराया जाता है ? अल्लाह से कोई बड़ा नहीं है, जो अल्लाह को नहीं मानता वह काफिर है, अर्थात इस्लाम पंथियों के अलावा पूरा विश्व काफिर है और काफिर पर जैसा भी जितना भी जुल्म किया जाय सब जायज है काफिर को खत्म करना ही अल्लाह का हुक्म है। जिस बच्चे के दिमाग में बचपन से ऐसा भरा जाएगा वो कैसे मानवता मानेगा। क्रूरता की हद से भी उपर कोई क्रूरता है तो वो है इस्लाम पंथ। विश्व बन्धुत्व एवं सर्वे भवन्तु सुखिनः उनके लिए गाली समान ही है। 
जिनके पंथिक कानून में अपनी ही बेटी बहू माता बहन के लिए इतने अमानुशिक कुकृत्य, कानूनन जायज हों उनके लिए नारी तू नारायाणी एक अपशब्द है। अगर मैं और स्पष्ट कहूँ तो दुनियां में सबसे कामातुर पुरुष कोई है तो वह मुसलमान पुरुष है। अपनी काम वासना की पूर्ति के लिए जो अपनी बेटी समान बहू के साथ कुकृत्य कर उसे पवित्र करना मानता हो फिर उनकी पतिता पर कोई शब्द ही नहीं बनता। एक रोग हो तो बताएं, उपचार करें, पूरा शरीर ही रोगाणु है तो फिर उसे ताज्य करना ही हितकर होता है।
यहाँ पर पंथ का इस्तेमाल इस लिए किया जा रहा है कि दुनियां में धर्म एक ही है वो हो सनातन, बाकी सारे पंथ हैं जो एक व्यक्ति और एक व्यक्ति की किताब पर चलता है। सनातन कैसे धर्म है ? सनातन किस तरह विश्व बन्धुत्व एवं सर्वे भवन्तु सुखिनः को प्रतिपादित करता है इस पर फिर कभी बातचीत करेंगे। आज तक हमारे सनातन को, आर्य भारत को किस प्रकार दूषित किया गया और सनातन को भातर से मिटाने का प्रयास हुआ साराशं में मेरी निम्न कविता से समझा जा सकता है।

सति प्रथा कुरीति थी मैं मानता हूँ
घूँघट प्रथा बूरी थी मैं समझता हूँ
छोड़ दिया हमने जो गलत था, और 
छोड़ने की मज़बूरियों को भी पहचानता हूँ। 

पर! हलाला कैसे सही था नहीं बतलाया 
तीन तलाक क्यों ठीक था नहीं सुनाया 
बुर्खा हिबाज सब जायज थे एक पंथ के 
बहु विवाह कैसे तर्क संगत था नहीं समझाया।

कुछ नहीं था, गढ़ा गया था नरेटिव हमें भरमाने को 
सनातन को भारत भूमी से सदा मिटाने को 
कुछ कुछ सफल भी हुए हैं ये सनातन विरोधी 
हमारी पीढ़ी को अपनी जड़ों से काटने को।

कुर्सीयों पर सनातन विरोधी भ्रमाज्ञी थे
अंदर से अंग्रेज बाहर से हिंदुस्तानी थे
कोई कॉन्वेंट के नाम, मन को हरते रहे 
कुछ मदरसों में हिन्दू नाम का जहर भरते रहे।

इन्हीं के बीच थे कुछ तथाकथित उदारवादी
परोसा था गलत इतिहास बने थे खादीवादी 
गंगा जमुनी तहजीव का झुनझुना पकड़ाकर
इस्लाम की गोदी बैठ, थे स्वजनित समाज़वादी।

आततायियों को ये आसमान से महान बनाते रहे
सड़क गली चौबारे इनके नाम के सजाते रहे
लूटा था जिन्होंने, या लूट रहे थे जो भारत को
उन नाराधमों का महिमामंडन करके पुजाते रहे।

पर! जड़ सत्य है सूरज जग से कभी हटेगा नहीं 
स्थितिजन्य छंटेगा लेकिन मिटेगा नहीं
इसी तरह अपौरुषीय सनातन भी है मित्रो 
धरा में जीवन, जीवन में धरा तक मिटेगा नहीं।

अडिग आह्वान है मित्रो वही देश गुलाम होता है
जिनको न राष्ट्र धर्म संस्कृति पर गुमान होता है 
फिर गुलाम रहती उसकी साखें क्या जड़ें तक 
और भविष्य उसका औरों की अपसंस्कृति ढोता है।

आसुरी शक्तियों को फिर न उठने देना होगा
सर्वदा सनातन भारत को आगे बढ़ाना होगा
विराज गए अब राम हमारे फिर अपने आसन पर
सर्वे भवन्तुः सुखिनाः भगवे को सदा लहराना होगा।

भारत में फैली अर पाँव पसार रही अपसंस्कृति की बुनियाद के उपरोक्त कारणों के अलावा और कई कारण हैं जिन्हे चाहते ना चाहते अपनाते हम आज सही मानने लगे हैं। लेकिन आज मुख्य मुद्दा हमारे सामने ये है कि ! ईसाईयत एवं इस्लाम की अपसंस्कृति से भ्रमित सनातन समाज को फिर से कैसे आदर्श जीवन मुल्यों की तरफ लाने हेतु काम किया जाए। आज अपसंस्कृति की ओर बढ़ती नईं पीढ़ी को वापस अपनी जड़ों से कैसे जोडें के प्रश्न मुँहबाये खड़े हैं। जिन प्रश्नों पर अमल करके हमें फिर से आर्यवंशी भारत की स्थापना करनी है। प्रश्न सज्ञानार्थ -:
👉किस प्रकार भारत फिर से अपने सांस्कृतिक वैभव में आ सके ? 
👉किस प्रकार सामयिक तकनिकी एंव विकास के साथ कदम मिलाकर हम अपने धार्मिक और सांस्कृतिक नैतिक मुल्यों को बचा सकें।
👉किस प्रकार हम अपने सनातन मुल्यों का पालन करते हुए विश्व बन्धुत्व एवं सर्वे भवन्तु सुखिनः मानवता के शूत्र को अमल मे लाकर भारत को फिर विश्वगुरु बना सके  ? 
👉किस प्रकार हमारी पीढ़ी लिव इन रिलेशनशिप, ऑपन सेक्स जैसी अपसंस्कृति से बाहर निकलकर भगवान राम और माता सीता के दामपत्य आदर्शों को समझे ? 
👉दामपत्य अप्रीतम प्रेम की राह चलकर आदर्श एवं मर्यादित मानव समाज का निर्माता होता है को कैसे हम हर साल नएं पाटनर के साथ वेलेन्टाइन मनाने वालों को समझा सकें ?  
👉कैसे हम विवाह के सालभर बाद कोट के गलियारों में तलाक की अर्जी पकड़े युवक युवतियों को समझा सकें कि दामपत्य कुछ साल नहीं पूरे जन्म और जमान्तर के प्रेम बन्धन में बंधने वाला आदर्श नैतिक नियम है। 
👉कैसे हम पुरोला की जैसी नाबालिग बेटियों को बहकावे में आने से बचा सकते हैं। 
👉कैसे हम देश की बेटियों के शरीर को टुकड़ों में कटने व फ्रीज और अटैचियों में पैक होने से बचा सकें। 
👉मूल प्रश्न कि हम सनातनी कब भगवान श्रीकृष्ण के शस्त्र और शास्त्र के नियम को समझेंगे ? अठारह अध्याय की गीता के शूत्रों को कब जीवन में उतारेगें। 
👉सट्ये साट्यम समाचरेत को कब अमल में लाएंगे। 

नराधमों ने पूरी पीढ़ी को कायर बनाकर रख दिया। अरे भाई हमारा कोई देवता बिना शस्त्र के है क्या ? बिना शस्त्र के पृथवी से अकर्म नहीं मिटते। गंगा जमुनी तहजीब का कौन सा झुनझुना पकड़े बैठे हो ? तुम भाईचारे की लाठी पकड़ कर घर की खिड़कियों से झांकते रहो वो छत और खिड़कियों में पत्थर जमा करते रहेंगे। योगी मोदी सदैव नहीं रहेंगे हमें लाखों योगी मोदी तैयार करने हैं। मित्रों कायरता के जिस खोल के अन्दर आप आज खुद को सुरक्षित देख रहे हैं वही खोल कल आपके बंश और पीढ़ी के खात्में का हथियार होगा। ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ पृथवी पर मानव इतिहास बता रहा है।  
ना लिखित ना ही श्रुति, सामने देखी बात है। इतिहास है। सज्ञानार्थ :-
👉किस प्रकार किस धारणा पर देश का बंटवारा किया गया। 
👉किस प्रकार नशबंदी के जरिए हमारे बंशवृद्धावली को बन्धित किया गया। 
👉किस प्रकार आरक्षण का लोलीपाप देकर आपके हाथों से आपका कारोबार छीन लिया गया। 
👉कैसे फ्री देकर अकर्मण्यता को बढ़ाया जा रहा है, कर्म शक्ति को क्षीण किया जा रहा है।   
👉किस तरिके से आज देश की डेमोग्राफी को बदला जा रहा है। 
👉आपके तो सारे रिश्ते खत्म हो गए और भाईजान पूरा गाँव बसा चुका है। 
👉भगवान जिसको सिर देगा उसको सेर भी देगा लेकिन हम हैं कि दो से ज्यादा को पालने की हिम्मत ही नहीं रख पा रहे हैं क्योकि कानून ने बेड़ियां जो पहना दी।
👉किस प्रकार आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता का व्यापार चल रहा है।
👉कैसे बोलीवुड के माध्यम से हमारे भगवानों हमारी संस्कृति पर प्रहार किया गया और लव जेहाद को पनपाया गया। 
👉क्या कभी किसी अल्लाह किसी ईशु पर किसी फिल्म में अपश्ब्द या कटाक्ष करते देखा। नहीं क्योंकि फिल्म बनाने वाले को पता है सर कलम होगा।

कारण हजारों हैं साहब पर कारक एक भी नहीं इन्ही कारकों पर हमें सोचना होगा, कार्य योजना बनानी होगी और क्रियान्वयन करना होगा। 
पुरोला हल्द्ववानी एक झांकी है 
पूरी पिक्चर अभी बाकी है।
सनद रहे देश के अन्य राज्यों की तरह देवभूमि की डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, शहर तो हमारे हाथ से लगभग निकल गए लेकिन पवित्र पहाड़ों को बचाना होगा, आज पहाड़ो में सब्जी, रेहड़ी, फैरी, नाई, फीटर, बढ़ई-बुचड, जैसे तमाम रोजमर्रा के कामों से लेकर इलेक्ट्रीशियन, वाहन टेक्निशियन, कमप्यूटर मोबाईल सॉफ्टवियर टेक्निशियन, निर्माण तकनिकी से जुड़े राज मिस्त्री, कारपेन्टर, प्लम्बर, आदी महतवपूर्ण कमों पर भाईजानों का पूर्ण अधिकार हो गया। हमारे क्या कर रहे हैं देखें -: 
👉उनका मुँह देख रहे हैं। 
👉तास खेल रहे हैं दारु पी रहे हैं। सोशियल मिडिया के भ्रामक दौर मैं अ सोशियल हो रहे हैं। 
👉एक भाई या बाप की कमाई को पूर परिवार उड़ा रहा है। 
👉नाम मात्र की डिग्री ग्रेजुऐशन करके आरक्षण की बाट जोह रहे हैं, बेरोजगारी पर धरना दे रहे हैं।   
👉कुछ अकलवान शहरों या विदेश के होटलों में अपनी जवानी खपा रहे हैं 
👉कुछ मेहनती शहरो की छोटी नौकरी में बड़ा औबर टाईम करके शहरों मे सैटल होने के सपने में अपनी दिन रात एक कर रहे हैं।    
👉और बचे खुचे युवा राजनैतिक दलों की दलाली में अपनी कर्मशक्ति को क्षीण कर रहे हैं। 

आज हर पहाड़ी नगर और कस्बों में बड़ी से बड़ी संख्या भाईजान श्रमिकों की है। भाईचारे में आपने उनको जमीन भी दे दी है उनके घर परिवार क्या कुनवा बस चुके हैं । मस्जिदें और मदरसे बनने लग गए हैं। तो पुरोला, हल्द्वानी से भी बढ़ी घटना तो होंगी ही उसमें कोई सक नहीं। उनको काम करने में कोई शरम नहीं हिचक नहीं। आज कर्मकार कर्म शक्ति वाले पहाड़ी अर्कमण्यता की ओर बढ़ रहे हैं ये चिंता का विषय है।
कोई अमल करें या ना करें अडिग तो अडिग बात ही कहेगा क्योकि साँच को आँच नहीं वाली बात है। हमें अपने ये तमाम छोटे बड़े काम खुद करने होंगे। लघु उद्योग जेहाद से उत्तराखण्ड को बचाना होगा। कुछ स्टेप जो हम निजी तौर पर आपसी साझीदारी से उठा सकते हैं जिसमें किसी सरकार की कोई भूमिका की जरुरत नहीं है। सज्ञानार्थ :-
👉 बेरोजगार युवाओं को जागरुक करना और यथासंभव उनकी मदद करना। 
👉 कामगार युवाओं को अरिक्त प्रतोत्साहन देकर उसकी आर्थीकी बढ़ानी होगी, ताकि और युवा भी उस काम को करने के लिए प्रेरित हों।  
👉 जिन पर सार्मथ्य है वे अपना छोटा मोटा करोबार सुरु करें और अपने लोगों को काम दें। चाहे वह एक नाई की ही दुकान ही क्यों ना हो। इसमें नौकरीसुदा व्यक्ति हो सकता है। सौ गज देहरादून के इनवेस्ट से आपके अपने बाजार का एक खोके का इनवेस्ट पहाड़ को बचायेगा।
👉 अपने लोगों से ही काम करवायें चाहे दो पैंसे ज्यादा लग जाए। 
👉 किसी भी बाहरी आदमी और भाईजान को अपनी जमीन ना बेचें। 
👉 किसी भी कट्टरपंथी को सर्पोट ना करें, सर्पोट नहीं होगा तो एक दिन उसकी आर्थीकी कमजोर होगी और उसे बोरिया बिस्तर समेटना ही होगा।
👉 बेटीयों और बहुओं को जागरुक करें जो किसी के जाल में ना फँस सके। पता चलने पर मेरा तो क्या वाले नजरिये से बाहर आकर विरोध करें।
👉 उन लोगों का प्रचुर विरोध करें जो ऐसे तत्वों को सह दे रहे हैं। पद पैंसे रुतवे से ना डरें, आपके एक साकारात्मक स्टेप से आपके लोग आपका साथ देंगे।      

मित्रो करबद्ध निवेदन है कि ऐसा काम न करें या समर्थन ना करें जो आज बदलते और बढ़ते भारत की विकास यात्रा में वाधा डाले। सनातन धीरे धीरे अपने गंतव्य की ओर अग्रसर हो रहा है, एक हजार वर्ष से भी उपर के समय से क्षीण हुए सनातन को अपने मूल स्थान में आने में समय लगेगा। तरतीब और तरकीब से कदम उठाने होंगे ताकि भुजंगों का विष बेअसर हो सके। 

जय भारत जय सनातन 

आपका 
बलबीर सिंह राणा अडिग
मटई बैरासकुण्ड चमोली।

होनहार की औनार


जब भी बेटा छुट्टी में घर आता है, 

कुछ घर और कुछ वो बदल जाता है

उसको मैं कमजोर और बुढ्ढा दिखता हूँ,

मुझे वो पहले से समझदार नजर आता है 


उसकी माँ इसलिए भोली हो जाती सायद 

अब वो माँ के पास होने खाने की लगाता है

माँ समझ गई कि बेटे ने टहनी पकड़ ली

और वो खुद को चोटी तक समर्थ पाता है।


नहीं रहती हमें अब उससे कोई  शिकायत

वो हमारी कचर-पचर से बोर नहीं होता है

कभी सुना भी देते हम कुछ गुस्से में तो

वो हाँ से हाँ मिलाता या मंद मुस्करा देता है।


चेहरे पर झुर्रियाँ हमारी बढ़ रही हैं,

और कंधे वो अपने झुकता देखता है

पैंसे की चिंता मत करना मैं बोलता था कभी

अब वही बात घर से निकलते वो दोहराता है।


ऊँच-नीच भली-बुरी समझाने लग गया बेटा 

सायद घर की पूरी गठरी उठाना चाहता है

समय का चक्र अपनी जगह आता है अडिग

इसलिए एक दिन बेटा भी बाप बन जाता है।


औनार -शक्ल


©® बलबीर राणा 'अडिग' 

भू क़ानून मूल निवास



पर निकले या परेशानी में निकले

देखा देखी यहाँ के वहाँ निकले

बस रहे बाहर वाले  हमारे उबरे 

हम अपनी ही बबौती के गैर निकले।


भूमी हमारी भुमियाळ हमारा

फिर क्यों नहीं भू क़ानून हमारा 

मूल निवासी हो जाएंगे प्रवासी

गैर क्यों बनेगा मालिक हमारा । 


उत्तराखंड भू क़ानून मूल निवास

लागू करो या निकलो वनवास

अब ना कोरा आश्वाशन ना जुमलास 

तभी जीत पाओगे राज गद्दी विश्वाश।


@ बलबीर राणा 'अडिग'

तेरी यादें



इस तन्हाई में तेरी 

यादें तो हैं मेरे साथ 

वक्त-वेवक्त, सुख-दुःख

खट्टी मीठी सभी किस्म की यादें।


ठंड में गुन-गुनी धूप 

गर्मी में बांज की घनी छाया

बनी रहती हैं  यादें ।


रात-दिन, उठते-बैठते

खाते-पीते, सोते-जगते

बहती रहती हैं यादें 

कल-कल करती

सदा नीरा की तरह।


कुछ यादें तालाब की लहरों

की तरह किनारे आकर

थककर शांत हो जाती हैं

कुछ भागती गंगा की

लहरों की तरह

छलारें मारती

किनारे पटकती रहती हैं।


कुछ धार के सुरसुरिया बथों

की तरह सहलाती रहती हैं

कुछ बर्फ़ीली साड़ की तरह

काटती रहती हैं।


कुछ कुतक्याळी लगाती रहती हैं

कुछ रुसा भी जाती हैं

इन्हीं के सहारे गुजर रही हैं 

मेरी तन्हाई 

मैं थक जाता हूँ

पर 

थकती नहीं  तेरी यादें।


@ बलबीर राणा 'अडिग'

अडिग आह्वान



सति प्रथा कुरीति थी मैं मानता हूँ

घूँघट प्रथा बूरी थी मैं समझता हूँ

छोड़ दिया हमने जो गलत था, और 

छोड़ने की मज़बूरियों को भी पहचानता हूँ। 


पर! हलाला कैसे सही था नहीं बतलाया 

तीन तलाक क्यों ठीक था नहीं सुनाया 

बुर्खा हिबाज सब जायज थे एक पंथ के 

बहु विवाह कैसे तर्क संगत था नहीं समझाया।


कुछ नहीं था, गढ़ा था नरेटिव हमें भरमाने को 

सनातन को भारत भूमी से सदा मिटाने को 

कुछ सफल भी हुए हैं ये सनातन विरोधी 

हमारी पीढ़ी को अपनी जड़ों से काटने को।


कुर्सीयों पर सनातन विरोधी अज्ञानी थे

अंदर से अंग्रेज बाहर से हिंदुस्तानी थे

कोई कॉन्वेंट के नाम, मन को हरते रहे 

कुछ मदरसों में हिन्दू नाम का जहर भरते रहे।


इन्हीं के बीच थे कुछ तथाकथित उदारवादी

परोसा था गलत इतिहास बने थे खादीवादी 

गंगा जमुनी तहजीव का झुनझुना पकड़ाकर

इस्लाम की गोदी बैठ, थे स्वजनित समाज़वादी।


आततायियों को ये आसमान से महान बनाते रहे

सड़क गली चौबारे इनके नाम के सजाते रहे

लूटा था जिन्होंने, या लूट रहे थे जो भारत को

उन नाराधमों का महिमामंडन करके पुजाते रहे।


पर! जड़ सत्य है सूरज जग से कभी हटेगा नहीं 

स्थितिजन्य छंटेगा लेकिन मिटेगा नहीं

इसी तरह अपौरुषीय सनातन भी है मित्रो 

धरा में जीवन, जीवन में धरा तक मिटेगा नहीं।


अडिग आह्वान है मित्रो वही देश गुलाम होता है

जिनको न राष्ट्र धर्म संस्कृति पर गुमान होता है 

फिर गुलाम रहती उसकी साखें क्या जड़ें तक 

और भविष्य उसका औरों की अपसंस्कृति ढोता है।


आसुरी शक्तियों को फिर न उठने देना होगा

सर्वदा सनातन भारत को आगे बढ़ाना होगा

विराज गए हैं राम हमारे फिर अपने आसन

सर्वे भवन्तुः सुखिनाः भगवे को सदा लहराना होगा।



@ बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

मटई बैरासकुण्ड, चमोली

सच्च वाले किसी की नजर के हो गए



आबो हवा जिधऱ की हुई उधर के हो गए,

सीधी डगर वाले भी किधर से किधर के हो गए।


बोल-बचन कौल-करार पर कब रहे वे,

जुबान से पलटे और खबर के हो गए।


चिंता न कर हम हैं पराळ जो दे रहे थे, 

बारी आयी कि अगर-मगर के हो गए।


द्वीघर्यों का क्या वास्ता इज्जत आबरु से, 

आज एक घर के कल दूसरे घर के हो गए।


चीफळी गिच्ची वाले सबके हुए अडिग,

सच्च वाले किसी की नजर के हो गए।


@ बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

कर्म करते जाना रुकना नहीं




कर्म    करते   जाना    रुकना  नहीं, 

जमके  जीते   जाना  सोचना  नहीं।


पहले या बाद छोड़ना ही है ये जहाँ, 

मरने के डर से  जीना छोड़ना नहीं।


छूटेगा  जो यहाँ, वो  सतकर्म  होंगे,

इसलिए सतकर्मों  से विरक्तना नहीं।


हम तो कर्ता हैं कराने वाला राम है 

तो खुद को राम से दूर करना नहीं।


इच्छा  नहीं   इरादा  रखना  अडिग,

जीत  होगी,  भरोसा  खोना   नहीं।


@ बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

9 फ़रवरी 2024

चिन्तन





 मित्रो जीवन में जानकारी लेना और अमल में लाना दो विपरीत धाराओं का मिलकर प्रकाश रूपी सफलता प्राप्त होना जैसा है। लेकिन इसे सभी लोग प्राप्त नहीं कर सकते हैं कारण या तो जानकारी का ना होना या जानकारी होने के बाबजूद भी अमल में न लाना। ध्यान रखने वाली बात है कि या तो जानों या तो मानो, अगर हम जानते भी नहीं और मानते भी नहीं तो फिर जीवन का सामाजिकता के साथ समावेशी ढंग से आगे बढ़ना आसान नहीं होता।

वर्तमान युग सूचनाक्रांति और तकनिकी का युग है। तकनिकी से जीवन जितना आसान हुआ इसके विपरीत भी उतना ही सत्य है। कई जागरूक लोग जीवन से जुड़े तमाम जानकारियों को जुटाते हैं और कुछ लोग उसे औरों तक पहुंचाने में मदद करते है। इसमें धर्म संस्कृति इतिहास की सारी बातें शामिल हैं।

इसके साथ ये भी जनना जरुरी है कि वर्तमान में सोशियल मिडिया जहाँ एक तरफ भ्रामकता से भरा पड़ा है वहीं सत्य जानकारियों से भी पटा है, सच और झूठ पहचानना आम इंशान के लिए एक चुनौती है। सोशियल मिडिया आम जागरूकता के साथ झूठ फ्रॉड और भ्रमकता में भी कोर कसर नहीं छोड़ रहा है।

 दगड़्यो जीवन में महत्व ये नहीं रखता कि आप कितने जानकार हो, महत्व ये रखता कि आप कितना चरिथार्त करते हो। चरिथार्त 

के परिपेक्ष्य में हम सनातनियों की शिथिलता का सबसे बड़ा कारण, मुखमुल्याज होना, डर, मेरा तो क्या वाला नजरिया, और थोता व खोटा सैक्यूलिरिज्मवाद जो दशकों से हमारे रगों में घोला गया। 2014 से जब एक राष्ट्रवादी सरकार भारत में है, सनातन हित और वर्चस्व हेतु कई फैसले हुए हैं और आगे भी जारी है। सच कहूँ पाँच दशक पर पहुँचने वाले अपने जीवन काल में पहली बार ये आभास कर रहा हूँ कि हम भी कुछ हैं, हमारा भी कोई है।  लगभग विखरता टूटता सनातन एक बार फिर अपने युग में आता नजर आ रहा है और यह यात्रा अनवरत जारी रहे इसमें हम सभी सनातनियों को अपना गिलहरी योगदान देना जरुरी ही नहीं अपितु बहुत जरुरी है ।

मित्रो आपका ध्यान एक और विशेष बात पर आकर्षित करना चाहता हूँ कि देश आजादी के बाद एक समुदाय द्वारा अपने सभी जेहादों के साथ एक लघु उद्योग जेहाद की भी शुरुवात अंदर ही अंदर की गई और इसमें वे सौ फीसदी सफल भी हो चुके हैं। यह योजना अंदर ही अंदर अमल में लायी गई तथाकथित उदारवादियों के द्वारा एक तरफ हमारे कामगारों को दलित बंचित बोल आरक्षण के लॉलीपॉप में उलझाया गया दूसरी तरफ एक समुदाय ने सारे छोटे बड़े कामों पर कब्ज़ा कर लिया। अब हमें अपने ये रोजमर्रा की जरुरी सेवाओं के काम करने में हिचक और शर्म आने लगी है। किसने कहा नाई का काम ख़राब है, बड़ई का ख़राब है, बूचड़ का ख़राब है, कारपेंटर ख़राब है, पेंटर ख़राब है या मिस्त्री ख़राब है। क्या जब ये मुस्लिम कारीगर नहीं थे तो क्या हमारे ये रोजमर्रा के काम नहीं होते थे? भाई जब दुकान में जूते बेचने में शर्म नहीं आती तो बनाने में कैसी शर्म। लेकिन अपनी झूटी नाक लम्बी जो रखनी है और बेरोजगारी का रोना भी रोना है।

कर्मशक्ति हीनता का एक और पहलु अपने वोट बैंक के लिए सरकारों द्वारा मुफ्त योजनाओं का दिया जाना।  जब किसी व्यक्ति को सारी चीजें मुफ्त मिलेंगी तो वह काम काहे को करेगा भाई। सरकारों को चाहिए कि मुफ्त देने से अच्छा हाथों में काम देना रोजगार देना जरुरी है तभी जाकर भारत की कर्मशक्ति बढ़ेगी और फिर हम विश्व गुरु की राह आगे बढ़ेंगे। जापान चींन इतने कम समय में कैसे इतने उपर पहुंचे, उन्होंने काम देकर अपने देश के लोगों की कर्मशाक्ति बढ़ाई। 

 सभी चीजें सरकार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती, जीवन मेरा है तो सक्षम मुझे होना पड़ेगा।  स्किल डेप्लपमेंट के लिए सरकार मौका भी दे रही है पैंसा भी, पर करने वाला होना चाहिए। कर्मशक्ति को जागरूक करने की जरुरत है, तभी हम आत्मनिर्भर बन सकते हैं। 

जिसके पास रोजगार नौकरी नहीं है अपने छोटे मोटे लघु उद्योग शुरू करो और खुद का रोजगार बनाओ, जैसे मुस्लिम समुदाय के लोग कर रहे हैं। कोई काम ख़राब नहीं होता, न छोटा बड़ा। छोटे लेवल की शुरुवात एक दिन बडी होती है। 

अगली बात हमारे देवभूमी उत्तराखंड की डोमोग्राफी तेजी से बदल रही है, शहर तो हाथ से जाते नजर आ रहे हैं लेकिन हमें  पहाड़ों को बचाना होगा, दो पैसों के लालच में बाहरी व्यक्ति को जमीन नहीं बेचनी है। और जब तक सरकार मजबूत भू कानून पारित नहीं करती संघर्ष जारी रखना है और विशेष मुस्लिम समाज को तो बिल्कुल भी जमीन नहीं बेचनी है भाईजान अभी एक और कल पूरा कुनवा बसा लेता है, ऐसा हम अपने कई पहाड़ी कस्बों में देख रहे हैं। अब उनको वहाँ से भगाना नामुमकिन है,

 देव भूमी को लव लेंड जेहाद से बचाना आज सबसे बड़ी चुनौती है, अगर ये समुदाय अपनी हरकतों से बाज नहीं आता तो पुरोला जैसा संघर्ष जारी रखना होगा । 

यह लघु उद्योग जेहाद तभी ख़त्म होगा, जब हम अपने काम खुद शुरू करेंगे, सुद्दी खीसा उंद हाथ डाळी नि होंद…।

अब आप बोलेगे अडिग जी आप संप्रदायिकता फैला रहे हो, भाई फैला नहीं रहा हूँ आगाह कर रहा हूँ। हम केवल कहने मात्र से संप्रदायिक और वो करें तो????? 

दिल्ली हल्द्वानी मात्रा ट्रेलर है, पूरी पिचर 90 के दशक कश्मीर जैसी ही होगी।

सत्य है कि :-

 सिद्दो लखडू अर सिद्दो मनखी सबसे पैली कटयोन्दू सीधी लकड़ी और सीधा आदमी पहले काटता है।

पड़यूँ लखडू अर पड़यूँ आदिम जल्दी सड़दो  पड़ी लकड़ी और पड़ा आदमी जल्दी सड़ता है। 

आधुनिक युग के सुरुवाती दौर से आज तक नजर डाली जाए तो हम हिन्दुओं का नरम रवैया ही हमारी कमजोरी रहा है। रजवाड़े अपनी ढपली अपने राग के लिए आपस में कटते रहे और दुश्मन कमजोरी का फायदा उठा अपना विस्तार करता रहा है सनातन को डूबाता रहा। देश आजादी के बाद, दोगुले, जय चंदों ने अपने बारे के गारे पीसने के चक्कर में झूटे सैक्यूलर का चौला पहनकर पूरी नईं पिढ़ीको कायर और नराधम बनाया, वो हैं भारत के यूथ ढपली बजाकर देश द्रोही नारे लगा रहे हैं यूनिवर्सिटीयों में। ये ढपली वाले क्या राष्ट्र रक्षा करेंगे जो भारत टुकड़े के नारे लगा रहे हैं। अंग्रेज बीज ऐसा ही बो कर गए कि उनके जाने के बाद उनके वर्णसंकर यहाँ लगातार सनातन पर कुठारघात करते रहते हैं। सनातन के असली विरोधी अन्य पंथ के नहीं बल्कि हमारे ये तथाकथिक उदारवादी सैक्यूलर रहे हैं।


दगड़्यो पृथवी पर मानव सभ्यता के आभिरभाव से युद्ध चलते आए हैं, पौराणिक काल से आज तक इतिहास भरा पड़ा है। मानव समाजों में अपने वर्चस्व हेतु लड़ाईयाँ होती आई हैं और आज भी अनवरत जारी है। देवयुग में पाप, अनाचार, व्यभिचार, अत्याचार और अकर्म अधर्म विनाश हेतु भगवानों ने तक हथियार उठाकर असुर अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना की।  आज हर देश द्वारा आधुनिक तकनिकी के घातक हथियारों का विकास इसी वर्चस्व श्रेणी का एक हिस्सा है। इसी वर्चस्व हेतु जीव की एक प्रवृति अग्रेसिव होना लड़ना भी होती है। पारिस्थितिकी संतुलन कहो या पृथवी पर वर्चस्व लेकिन जानवरों में भी एक दुसरे को हानि पहुंचाने या ख़त्म करने की प्राकृतिक प्रवृति होती है। पादपों को शाकाहारी मारते हैं, शाकाहारी को मांसाहारी, और मनुष्य दोनों को।

कहने का तात्पर्य है कि अब जब ज्यों ज्यों सनातन को कमजोर करने वालों की सच्चाई सामने आ रही है हमें सचेत और जागरूक होना पड़ेगा कि आगे ऐसा ना हो जैसा पिछले शदियों और शदियों में हुआ। "मनसा वाचा कर्मणा" से अपने सनातन के लिए डटना होगा। भारत को फिर वही आर्योँ  वाला विश्व गुरु भारत बनाना है। मित्रो धरती पर वर्चस्व के लिए मुख्य दो रास्ते ही सामने होते हैं  या तो लड़कर जीतो या डरकर मरो।

अठाहरवीं शदी में गढ़वाल की गोरख्याणी को देखो जो लड़े वो या तो मरे या जम कर जिए,  लेकिन जो कायर जंगलों में भागे वहीँ भूखों मरे। 

मेरे उदाहरणो का मतलब बिना प्रयोजन लड़ना नहीं बल्कि अपने वर्चस्व एवं हकों के लिए आवाज़ उठाना, अपने धर्म संस्कृति के लिए अग्रेसिव होकर काम करना। अगर हम अपनी पीढ़ी को वेद पुराण गीता नहीं पढ़ाएंगे, अपनी सनातन मनीषा के लिए प्रेरित नहीं करेंगे तो कल कोई उन्हें बाईबल या कुरान पढ़ा देगा और ऐसा हो रहा है और हुआ है। भारत के तमाम आदिवासी ट्राईब लोग क्रीश्चयन बना दिए गए हैं, गरीब की बीबी सबकी भाभी होती है ध्यान रखना। जिनके बच्चों ने कान्वेंट में पढ़ा देखना वे कितने सनातनी हुए या अपनी धर्म संस्कृति के हुए।

मित्रो एक समृद्ध राष्ट्र हेतु शांति सबसे बड़ी उपलब्धी होती है। शांति राष्ट्र कामयाबी का पहला औजार होता है। लेकिन जब कभी परिस्थितियाँ आए तो झुकना नहीं रुकना नहीं। 

मित्रो इस बार हमें ध्यान देना होगा कि राष्ट्रवादी पार्टियों को ही चुनाव में समर्थ बनाना होगा। कुर्सी पर राष्ट्रवादी रहेंगे तो फैसला भी राष्ट्रवाद के हित के होंगे। हमें आगे कई और योगी मोदी तैयार करने हैं, ताकि सनातन बचा रहे हिन्दुत्व की उम्र और लम्बी हो। 

   ध्यान रहे वे भरे पड़े हैं उनका कॉन्सेप्ट क्लियर है जिस दिन सरकार गई वो अपने काम पर शुरू हो जाएंगे, इतिहास के पन्ने उनकी क्रूरता से भरे पड़े हैं।

ज्यादा दूर मत जाओ कुछ साल पहले UP में सपा की  सरकार के वक्त कैराना को ही देख लो आज भी वहाँ के हिन्दू अपनी बपौदी में नहीं बस पाए। यह विकास, रोजगार एक तरफ, पहले जीवन और आगामी पीढ़ी। 

बल 

बच्यूँ रैलो लाटो

खेंणी खालो माटो

यानी जीवन सुरक्षित रहेगा तो मेहनत करके खा लेंगे। 

दोस्तों अपनी बुद्धि, विवेक, चातुर्यपन, कर्म, और भुजाओं में दम रखो रोजगार पीछे आएगा, आज मुसलमान का लड़का क्यों नहीं रोता रोजगार के लिए, वो दमख़म के साथ सीख रहा है और ठोक बजा कर कमा रहा है। 

हमारा सु छिन बजार दुकान्यूँ मा  लन्यौर बणी घूमणा,  मोबाईल पर चिपके हैं, इन मोबाईल से नहीं होणी वाळी बाबू मावासी। कर्म करना पड़ेगा. हटगे घिसने पड़ेंगे। 

डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत याद रखो, जो ताकवर होगा वह इस धरती पर जियेगा, ताकत बुद्धिबल और भुजबल दोनो का होना जरुरी है। भगवान कृष्ण की गीता को जीवन में उतरना होगा, भगवान राम के आदर्शो व मर्यादाओं को चरिथार्त करना होगा। आचार्य चाणक्य की नीतियों पर चलना होगा।


जाय भारत, जय सियाराम

आपका

@ बलबीर राणा अडिग

बबाल वाले बबालों से निकाले गये

 


बबाल वाले बबालों से निकाले गये,

बिगैर जबाब सवालों से निकाले गये।


धर पकड़ तक आशा थी कुछ होने की 

पकड़े जाने पर कारागारों से निकाले गये।


उदघाटन में शामिल सभी कंगूरे छपा लिए गये,

नीव पर बैठे किताबों से निकाले गए।


जमाना खेलता रहा जब तक थी हवा 

हवा निकली कि कबाड़खानो से निकाले गए ।


बटुवे के बजन तक सुमिरन में था अडिग 

बटुवा खाली हुआ कि ख्वाबों से निकाले गए।


©® बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

ग्वाड़ मटई बैरासकुण्ड, चमोली

हमारा महादेव है



 लय भी है, प्रलय भी है

कला भी है, काल भी है

जटाधारी, बाघम्बरी 

डमरू बाजगी, त्रिशूल धारी

नील वर्ण, नील कंठ

पवित्र गंगाजल के स्रोत

विष समन कर्ता

भक्त वत्सल 

जो श्रेष्ठ श्रेयकर देवाधिदेव है 

वह हमारा महादेव है।


@ बलबीर राणा अडिग 

गजल

 



बाप का रखा जीवनभर पूरा नहीं होगा,

मंजिल बिगैर सफर पूरा नहीं होगा। 


कम नहीं किसी की अहमियत जीवन में,

लेकिन यकीनन माँ बिना घर पूरा नहीं होगा।


स्पंदन है सभी के दिलों में तभी तो जिन्दे हैं, 

पर! संवेदनाओं बिना जिगर पूरा नहीं होगा।


अगड़म सगड़म कुचाड़ना जरा कम करो ढोल में ?

पथ्य बिना औषधि का असर पूरा नहीं होगा।


इस अंग्रेजी फंग्रेजी फूकने से नहीं छुपोगे, 

उत्तराखंडी हैं तो बिना बल, ठेरा के अधर पूरा नहीं होगा।


पीठ में उठाने वालों को पीठ दिखाके अडिग।

सुख सुकून का मंसूबा मगर पूरा नहीं होगा।


8 मार्च 2024

©® बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

शुक्रवार, 1 मार्च 2024

गजल




सबकी अपनी-अपनी परेशानियाँ हैं ,
कुछ की हकीकत कुछ की जुबानियाँ हैं ।

इन उपत्यकाओं पर जो पगडंडियाँ देख रहे हो,
ये असंख्य बटोहियों की निशानियाँ हैं ।

हर मंजिल, तरक्की, ठाट-बाट की नीव पर,
किसी के हाथों के छाले और पैरों की बिवाईयाँ हैं।

पहाड़ के सीने पर जो ये मोहक गाँव खेत दिख रहे हैं,
यह हमारे पुरुखों की जीवंत कहानियाँ हैं।

शीत घाम बरखा सब प्रकृति की परीक्षाएं है,
डरना नहीं शिशिर के बाद बसंत की रवानियाँ हैं।

ये सफेदी, झुर्रियाँ, बलय जो देख रहा अडिग
ये किसी के लिए खपी जवानी की गवाहियाँ हैं।


©® बलबीर सिंह राणा 'अडिग'