शनिवार, 24 अगस्त 2019

लिप्सा के शूल मुझे नहीं चुभते



हर ईंट जतन से संजोयी
कण कण सीमेंट का घोला
अट्टालिकाएं खड़ी कर भी
स्व जीवन में ढेला

यह कैसा मर्म कर्मो का
जीवन संदीप्त पा नहीं सकता
नीली छतरी के नीचे कभी
छत खुद की डाल नहीं सकता

मुठ्ठी भर मजदूरी से
उदर आग बुझ जाती
चूं चूं करते चूजों देख
तपिस विपन्नता की बड़ जाती

चिकना पथ बनाते बनाते
खुरदरी देह दुखने लगी है
पथ के कंकर नगें पावों को
फूल जैसे लगने लगी है

हाँ खुदनशीब हूँ
लिप्सा के शूल मुझे नही चुभते
टाट के इस बिछावन में
फूल सकून के हम चुनते।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

13 टिप्‍पणियां:

मन की वीणा ने कहा…

यथार्थ वाली हृदय स्पर्शी लेखन ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को कृष्णाजन्माष्टमी के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं!!


ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 24/08/2019 की बुलेटिन, " कृष्णाजन्माष्टमी के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

अनीता सैनी ने कहा…

हृदय स्पर्शी रचना
सादर

बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' ने कहा…

सभी बुद्धिजनो का हार्दिक आभार

बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' ने कहा…

आप विद्धवत जनो की टिप्पणी मेरी कलम लिए टॉनिक का काम करती है सभी का तहे दिल आभार

संजय भास्‍कर ने कहा…

हर शब्द अपनी दास्ताँ बयां कर रहा है हृदय स्पर्शी बधाई स्वीकारें

बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' ने कहा…

हार्दिक अभिननदं भास्कर जी

Pammi singh'tripti' ने कहा…


जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना 28 अगस्त 2019 के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

शुभा ने कहा…

वाह!! सुंदर सृजन ।

रेणु ने कहा…

आदरणीय बलबीर जी , सार्थक और मार्मिकता से रचना , उन श्रमजीवियों के नाम -- जिन्होंने बहुमंजिला इमारते और हजारों किलोमीटर रास्तों के निर्माण में अपना सर्वस्व लुटा दिया , पर खुद के लिए पीढ़ियों से आजीवन एक छत का जुगाड़ ना कर सके |

बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' ने कहा…

Hardik aabahr Aadrneeya Shuba ji, Renu ji