Garhwali लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Garhwali लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 19 मई 2014

भोऽळक सवाल


ब्वेल फोन पर बोली 
बेटा नातिक खुद लगीं
अज्क्याल गर्मी छुटी मा
तों द्वि दिन  घोर ल्येदे
जरा मी भी हरीश देखुला
अपणा पोथी-पंछियोंक घ्यू दूध खळोला
ऐरां! तख बजारुं खाण-प्योंण च 
अजी!!
नि जाणा बल हमें उन पहाड़ों में
म्यार लड़के काळा ह्वे जायेंगे वहां
उनको समर कैंप में हिल स्टेशन जाणा बल
द्वि  हजार फीस दे रखी है 
अर!!
मी चुप.............
ब्वेतें बाणु बणे समझे भुझे,
ब्वे'त माणी,
अपणो खातिर माया मारी,
पर!!
मेरु ज्यू अपणा भोऽळक सवाल छोड़ी ??
इनी कैरी हम अपणी ये पीडी तें
कखी?
इत्गा दूर त् नि लि जाणा च ??
जखक बाटा, माया-ममता,
संस्कृति-संस्कार हर्चीक
वापस ओंण
मुश्किल क्या नामुमकिन ह्वे जावो,  
चलो?
मुछ्यालूऽ जगी पिछने आन्दु।

© सर्वाधिकार सुरक्षित
बलबीर राणा “अडिग”

शनिवार, 17 मई 2014

कूड़ी जग्वाल


खोळ बटिन भैर क्या चल्गे  
लठियाळा अपणेस नि रेगे
पैली कभी-कभार,
तू धार-काँठों बटिन
तीजे जन जून दिखे भी जांदू छै,
अब निजाण,
कख हर्चिन
तु क्या हर्चे सबी हर्चेणा च, 
दुन्या आज उन्दारे लंगी 
उकाल क्वी नि आणु,
संसारे सदानी रीती रे
उग्दा सूरज तेन सब प्रणाम करदा
डूब्दा थें क्वी नि करदू,
यूँ पाड आज डूबणा च,
उड़्दा सबुं देखी
बैठी कैन नि देखी
तुम उडिग्यां  
मी कूड़ी  जग्वालम बैठीं
बल!  
अलंगी जालू-पलंगी जालू
ऐलू जड़े पऽर।    

जून २००३ डैरी पन्ना बटिन 
रचना – बलबीर राणा “अडिग”
© सर्वाधिकार सुरक्षित
  
 

डाळे माया


यूँ अंखियों तें कु समझालू
खुलण त
औंशुन टबरान्दा
लगण त
स्वपनिल स्वेणा देख्दा
मनऽकी बोला ना?
कबि तिरवाल कबि ढ़िस्वाल
कबि उकाल कबि उन्दार
अर दिलऽक !
एऽक कप्त्याट्, कब्ळाट्,
होऽर घबग्याट् ।
यु पराणी
माया बिगेर रे नि सकदी
मथि वाळा
लोभ दिखायीं मोत लुकयीं 
लोभ मायाक सिक्का द्वी पहलु
बिगेर दौं-किल्वाडा बंधियों
मन-पराण, ज्यू-जागा
सबी बंध्याँ
यु अगासमात्री लग्लू दिनप्रिती
म्यार चौं तरफां घेरण लग्युं,
खैरी औन्दी,
हैंसी-हैंसिक जलणम
रुवे-रुवेक हैंसणम्
होर पीड़ाक छैलाऽम्
ये सुख्याँ होंठड़ियों पर
मुल-मूल्याट!
अरे! डाळा तू किले छे
ये बुडापम मायाक पिछ्वाडी पडि्यों
नया बीज ये बण नि जमी त्
कखी ना कखी त जमोण लग्याँ
सुधि छन वोंतें रुवोणु
जोन पिछवाडी मुड़ी नि देखण,
अवाज पच्छ्याणी त
वर्तमान छे भितर बटिन भट्याणु।

१५ मई २०१४
© सर्वाधिकार सुरक्षित
रचना – बलबीर राणा “अडिग”