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बुधवार, 11 सितंबर 2024

गजल

 

अपना कहने भर से अपनापन नहीं मिलता,

यार कहने वाले सब में याराना नहीं मिलता।


करते हैं सब ठोक बजा कर्म इस कर्मभूमि में,

लेकिन किये का सिला सबको नहीं मिलता।


हैरानी होगी परिणाम अनुकूल न निकलने पर, 

परेशान होने से भी तो आराम नहीं मिलता। 


राहों में बहुत मिलेंगे जो मन को भाएंगे।

केवल मन भाने से भाव नहीं मिलता। 


हीरे तो भतेरे निकलते हैं खदानों में हर रोज, 

लेकिन चमकने का नशीब सबको नहीं मिलता।


कुछ बातें काबू से बाहर की भी होती अडिग, 

जाने दे बेकाबूओं को ठौर नहीं मिलता।


@ बलबीर राणा 'अडिग'

शनिवार, 9 मार्च 2024

सच्च वाले किसी की नजर के हो गए



आबो हवा जिधऱ की हुई उधर के हो गए,

सीधी डगर वाले भी किधर से किधर के हो गए।


बोल-बचन कौल-करार पर कब रहे वे,

जुबान से पलटे और खबर के हो गए।


चिंता न कर हम हैं पराळ जो दे रहे थे, 

बारी आयी कि अगर-मगर के हो गए।


द्वीघर्यों का क्या वास्ता इज्जत आबरु से, 

आज एक घर के कल दूसरे घर के हो गए।


चीफळी गिच्ची वाले सबके हुए अडिग,

सच्च वाले किसी की नजर के हो गए।


@ बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

बबाल वाले बबालों से निकाले गये

 


बबाल वाले बबालों से निकाले गये,

बिगैर जबाब सवालों से निकाले गये।


धर पकड़ तक आशा थी कुछ होने की 

पकड़े जाने पर कारागारों से निकाले गये।


उदघाटन में शामिल सभी कंगूरे छपा लिए गये,

नीव पर बैठे किताबों से निकाले गए।


जमाना खेलता रहा जब तक थी हवा 

हवा निकली कि कबाड़खानो से निकाले गए ।


बटुवे के बजन तक सुमिरन में था अडिग 

बटुवा खाली हुआ कि ख्वाबों से निकाले गए।


©® बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

ग्वाड़ मटई बैरासकुण्ड, चमोली

गजल

 



बाप का रखा जीवनभर पूरा नहीं होगा,

मंजिल बिगैर सफर पूरा नहीं होगा। 


कम नहीं किसी की अहमियत जीवन में,

लेकिन यकीनन माँ बिना घर पूरा नहीं होगा।


स्पंदन है सभी के दिलों में तभी तो जिन्दे हैं, 

पर! संवेदनाओं बिना जिगर पूरा नहीं होगा।


अगड़म सगड़म कुचाड़ना जरा कम करो ढोल में ?

पथ्य बिना औषधि का असर पूरा नहीं होगा।


इस अंग्रेजी फंग्रेजी फूकने से नहीं छुपोगे, 

उत्तराखंडी हैं तो बिना बल, ठेरा के अधर पूरा नहीं होगा।


पीठ में उठाने वालों को पीठ दिखाके अडिग।

सुख सुकून का मंसूबा मगर पूरा नहीं होगा।


8 मार्च 2024

©® बलबीर सिंह राणा 'अडिग'

मंगलवार, 2 मई 2023

गजल


यूँ खामखाँ सूदों किसी को टोका न जाए,

करने दो, जो कर रहा है रोका न जाए।

 

हवा कब रुख बदल दे कहना है मुश्किल

औरों की पुरवाई पर फैसला लिया न जाए।

 

छुवीं ऐसी न लगे कि चिंगारी बडांग बने,

फिर पूरे गाँव को जद से बचाया न जाए।

 

वजह के लिए उलझना हो तो उलझो,

बेवजह फंसने के लिए उलझा न जाए।

 

अंदर ही पकाओ खिचड़ी कच्ची-पकी जो भी  है,

घर का रस्वाड़ा चौराहे पर चढ़ाया न जाए।

 

सीख रहे हो तो किनारे पर ही उतरो  

सीखने के लिए गहराई में कूदा न जाए। 

 

सुसल से सागर भी पार हो जाता है अडिग

कुसल का हल किसी को सुझाया न जाए।

 

गढ़वाली शब्दों का अर्थ

 

छुवीं – बातचीत

बडांग - बनाग्नि

रस्वाड़ा- रसोई

सुसल - अच्छी तरकीब ढंग

कुसल - खराब तरकीब

 

@ बलबीर राणा अडिग

रविवार, 3 जुलाई 2022

गजल


 


मोहकता तो एक  बहाना है,

अंगजा  को धरती सजाना है।

 

जितने  भी  रंग  ऋतुऐं  बदले,

उन्हीं में उसका आना जाना है।

 

आभा जो कुसुम बन निखरी,

उसको  नहीं  कुम्हलाना  है। 

 

और  प्रारब्ध पुष्प का बाकी,

फल बनके  बीज  बनाना है।

 

प्रेम से गाड़े जाने वाले बीज को,

धरा चीर अंकुर  बन  आना  है ।

 

ये  तो प्रकृति  रीति  है  अडिग

अंकुर का वृक्ष बन बूढ़ा जाना है।

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’


शनिवार, 31 जुलाई 2021

गजल : साँसों के टेंडर

 

अचानक गाँवों में झिंगुर उड़़ने लगे हैं,
सायद कुछ दिन बाद चुनाव आने लगे हैं।
 
कल तक एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था
आज पुरवा पछुवा एक साथ बहने लगे हैं।
 
पाँच वर्ष तक दर्शन दुर्लभ थे जिन देवों के,
वे औचक दर्शनार्थ घरों मे भटकने लगे हैं।
 
फ्री से पहले ही कर्म शक्ति नेस्तानबूद है,
और फ्री से रहा-सहा जमीजोद होने लगे हैं।
 
पिंजरे में मांस दे दहाड़ बंद कर-करके,
जंगल के शेर शिकार करना भूलने लगे हैं।
 
बल, कुछ मत करो धरो, हम तुम्हें पालेंगे,
याचक बना उग्रता पर उतारने लगे हैं।
 
वोट के लिए समझ नहीं साँसें चाहिए अडिग,   
इस लिए फिर साँसों के टेंडर पड़ने लगे हैं।
 
 
रचना : बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’