जीवन उत्सव अचानक नहीं आया
बल्कि आहिस्ता / सौजि-सौजी
पहाड़ की पगडंडियों पर
फिलबटे खाते,
शहरों की गलियों में इंच-इंच सरकते
उकाळ-उंदार भागते, हाँफते
समय के खुरदरे हाथों में जकड़
कुचक्रों से फिसलकर मिला।
ख्वाहिशों की भीड़ से तूने बचाया
जीने की ज़रूरतों को मैंने निभाया
एक ने बटोरा
दूसरे ने संभाला
ना भौतिकता की खुशबू में बहके
ना दीनता की सीलन से बिचके
बस चलते रहे
प्रेम-डगों से जिंदगी की राह।
मन और ज्यू,
सदैव एक-दूजे पर तटस्थ
जैसे हमारे पंचुनी डांडे पर
धूप का आख़िरी टुकड़ा
चिपका रहता गोधुली के अंत तक।
प्रेम की समझ इतनी ही आ सकी
आगे कितनी आएगी, कह नहीं सकता
बस,
चलती जिंदगी में जब
अतीत का एक समवेत चित्र
छोटा-सा संस्मरण बन सामने आता,
तो समग्रता की अतलता का बोध कराता है।
@ बलबीर राणा 'अडिग'

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