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रविवार, 17 अगस्त 2014

कृष्ण पूर्णांश




कृष्ण पूर्णांश
उन्मुक्त जीवन
तृष्णा विहीन
स्वच्छंद
जहाँ चाह वहां राह
सम्पूर्ण सन्दर्भ से गर्वित
सम्पूर्ण कलाओं का कलाकार
सम्पूर्ण अवतार
भोगी - योगी
प्रेम करुणामयी
अहिंसक चित
पर
हिंसा के दनावल उतरता तत्पर
एक हाथ माया की मुरली
दुसरे हाथ सुदर्शन
दो विपरीत धाराओं में उर्जा नियोजन
विपरीत क्रियाओं का समायोजन
इस लिए
कृष्ण अंश नहीं
पूर्णांश
सम्पूर्ण अवतार ....


© सर्वाधिकार सुरक्षित
रचना :- बलबीर राणा “अडिग”
 

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

यहीं है मोक्ष धाम


घडी दो भज लो हरी का नाम,

दुःख हर लेंगे मेरे राम, 2

पल हर पल हो जाओ अंतरध्यान, 2

सब कष्ठ हर लेंगे मेरे राम ,



अपने पराये के भेद ने, दुर्ग मनुष्य का ढहाया है,   

खुद के बोये काँटों में जीवन, शूलों में हमने गुजारा है,

अभी भी वक्त है, ले ले संभलने का नाम,

तेरे दुःख हरेंगे मेरे राम,

घडी दो .........................



उम्र भर हाय तोबा  में ही, जीवन का मोल हम भूल गए,

अहंकार की मंजिलें सजा, सजा के खुद को तोलना भूल गए,

पता न चलेगा, कब ढल जाए जीवन की शाम,

सब दुःख हर लेंगे मेरे राम

घडी दो .........................



बुरे कर्म के बुरे समय में, कोई न कहेगा तुझे अपना,

धरती होकर क्यों देखता है, आशामान का झूटा सपना,

सत कर्म से सदोगति का, यहीं है मोक्ष धाम...

तेरे दुःख हरेंगे मेरे राम

घडी दो .........................

जै राम, श्रीराम जय जय राम

हरी नाम श्रीराम जय जय राम

घडी दो भज लो हरी का नाम

दुःख हर लेंगे मेरे राम

पल हर पल हो जाओ अंतरध्यान

सारे कष्ठ हर लेंगे मेरे राम

जै राम, श्रीराम जय जय राम ............



बलबीर राणा “अडिग”

© सर्वाध सुरक्षित














    

     


सोमवार, 30 सितंबर 2013

अडिग शब्द मेरे तुझे पुकारे





बम बम बम भोले भंडारी, गिरिजा पति त्रिपुरारी
जुबां में तेरा नाम सदा हो, अनुकम्पा तेरी त्रिशूल धारी

भाल चन्द्रमाँ जो तेरे विराजे, शीतलता की प्रेम छांव फैलाए,
जटा से बहती नित गंगा की धारा, सींच धरती, फूल खिलाये

घोर हलाहल विष कंठ में थामे, जग वृष्ठी तूने संभाली,
हाथ त्रिसूल धरि दुष्ट संहारे, मनुष्य सदाचार की रक्षा करायी


बाम अंग माँ शक्ति जगदम्बे, श्री मंगल गणेश संग आसन लगाये,
त्रिनेत्र जग रक्षा को खोले, इच्छित वर दे भक्त भय निर्मुक्त कराये

नंग वदन भस्म रमायी, बागम्बर छाल वस्त्र अपनाई,
गले नाग और जटाजूट बन, शत शत नमन अजब भेष धारी

तेरे परताप का बखान जितना करूँ, शब्द कहीं पार न पाये,  
किन्चक प्रार्थना स्वीकार प्रभु, अडिग शब्द मेरे तुझे पुकारे

© सर्वाध सुरक्षित
.....२० अगस्त २०१३
स्तुति-: बलबीर राणा “अडिग”