रविवार, 16 मार्च 2014

होली आयी




रंग-बिरंगी होली आयी,
प्यार-मुहब्बत का पैगाम लायी,
रंग दो तन मन एक दूजे का,  
भर लो अपनी प्रेम पिचकारी

कितना अनोखा त्यौहार अपना,
कितना सुन्दर विधान अपना,
सजा दो आँगन सतरंगो से अपना,
भर दो थाल गुलाला से अपना

बुझा दो मन से नफरत की चिंगारी,
जला दो दिल में लो प्रेम की प्यारी,
अपने-पराये का भेद मिटा दो,
धर्म-जाती की दीवारें ढहा दो

इतना रंगों एक दूजे को,
पहचान न एक दूजे की रहे,
एक मय बन जाए हम सब,
जिगर के तार यूँही जुड़े रहें

फूहड़ न बना देना इस प्रेम पर्व को,
मर्यादा इसकी बचा के रखना,
जला न देना आधुनिकता की ज्वाला से इसे,
सुन्दरता इसकी बचा के रखना

महारंगो के इस महोत्सव को,
सुखी पलों की धरोहर बना के रखना,
जब भी जीवन में एक दूजे से मिले,
दिल से फिर प्रेम पिचकारी फूटे

बलबीर राणा “अडिग”
© सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 25 जनवरी 2014

कषिश

तुमसे मिलने की कशिष कशिष ही रह गयी
तन्हायी की तम्नाये अधूरी छूट गयी
कब भीगेगा प्रेम फुहारों से ये आँगन
पूरी उम्र घटाओं के इन्तजार में कट गयी
बदलियो तुम्हें रोज दिल के करीब से जाते देख मन मचल जाता है,
जैसे छूने को हाथ बढाता, वैसे भ्रम टूट जाता है,
पर्वत से मिले बिना तुम, दूर आसमान में उड़ जाती हो,
एक बूँद तो बर्षा जाते निश्ठूरो, इस प्यासे चातक को क्यों हर रोज तरसा जाती हो।
सूरज तुम रोज सुबह आकर दिल के अंधियारे को रोशन कर जाते हो,
कि अब रास्ता उसके घर का ढूंढ ही लूंगा आस मन में जगा जाते हो,
भटकता भटकता जब उस नूर के करीब पहुँचने वाला होता,
लेकिन शाम होते ही आप भी, सामने वाली पहाड़ी से टाटा कर जाते हो।
दुनिया के प्रेम को शीतल छांव से सवांरने वाली चन्दा,
कब तक बिरान रहेगा ये आशियाना मेरा उसको

तन्हायी संग

1.
दुनियां तन्हाई से भागती है,
मैं अक्सर बुलाता हूँ,
उसके आगोस से छिपकर
जीवन को करीब से देख पाता हूँ,
भीड़ भरे संसार से परे
सृश्ठी से मन की बात कह पाता हूँ।

क्या मैं तेरे जैसा विशाल आँगन सजा पाऊंगा,
जल स्थल नभ का अनुपम सौर मंडल बसा पाऊंगा?
सृश्ठी कहती तुझमे सच्चायी जानने का साहस है?
मेरी हर रचना जीवन का आभास है,
इसी तरह रोज
कल्प की कल्पना को साकार पाता हूँ,
मैं अक्सर तन्हाई को बुलाता हूँ।


2. 
भोर दूर हिमगिरी की विह्न्गमता से विह्व्लित मन पूछ बैठता,
क्या कभी मेरा धीर भी तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
या संसार के कष्टों से विचलित होकर ईमान मेरा भर-भरा कर विखंडित हो जाएगा।
हिमगिरी बोला!!
ये सवाल देश रक्षक सैनिक से क्यों नहीं पूछता,
जो मेरे संग बारह महीने तथस्ट रहता,
तभी भयंकर गर्जना के साथ
एक विशाल गिरी खंड टूटता,
मेरा जबाब मुझे मिल जाता
जीवन की क्रुरता जान जाता
जब इतना विशाल पर्वत अपने अस्तित्व को नहीं बचा पाता,
तो मेरी बिसात क्या है,
इसी तरह प्रकृति सत्य को करीब लाता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।

चलते चलते बाग़ के गुलाब से सवाल करता,
तू इन काँटों संग कैसे जीता,
गूलाब का जबाब कुछ ख़ास होता
जिसमे जीवन की खुसी का राज होता
अनचाहे में भी प्रेम से पेस किया जाता हूँ
टूटे रिश्तों और दिलों को जोड़ जाता हूँ,
इसी लिये काँटों संग भी मुस्कराता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को जीता हूँ।


3. 
शनै: शनै: तन्हायों की शाम ढलती
मेरी तन्द्रा तठस्त हो जाती,

तारों से पूछता
क्या मैं भी तुम्हारे जैसा जीवन के खुले आसमान में चमक पाउँगा?
भौतिकता की इस चाँदनी में कहीं रोशनी खो तो नहीं जाऊंगा?
तभी एक तारा टूट जाता है
भीड़ भरे तारा मंडल से अँधेरे में गुम हो जाता है,
रात तारों के टूटने गम में गमगीन रहता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।

जीवन के इस आसमान में टूटते तारों का मर्ज कौन समझता?
जो टिमटिमा रहा अपने दर्प में मुस्कराता रहता,
वो भी तो यहाँ टिमटिमाने आया था
काली रात को रोशनी देने आया था
लेकिन जीवन के सत्य वो अभागा तारा कहाँ जान पाया,
जीवन का सफ़र आधी रात तक ही तय कर पाया,
जिजीविषा की कुंठाओं को इन टूटते तारों संग विदा करता हूँ,
दुनियां तन्हायी को भगाती है, मैं अक्सर को बुलाता हूँ,
उसके आगोस में छिपकर जीवन को करीब से देखता हूँ।


4.
हिमालय की गोद में बैठकर ,
मन मुग्द होकर पूछ बैठा
क्या कभी मेरा धीर तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
ईमान मेरा तेरे जैसे अडिग रह पायेगा,
हिमगिरि बोला
इस प्रश्न का उत्तर मेरे संग बारह मास तठ्स्त सैनिक के पास है
विषम परिस्थिति पर भी जिसका राज है
तभी हिमगिरी का एक खंड भरभरा विखंडित हो जाता है
वह अडिग सैनिक रिपु बाण छाती सह शांत हो जाता है।
क्षण भर में वह अडिगता क्षोभ का घूँट जाती है ।
और मै अपने सवालों का जबाब नहीं ढूंढ पाता हूँ
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
 

तन्हायी की खामोसी शांत नहीं बैठ पाती
जीवन के प्रति जुजुप्त्सा बढती जाती,
सृश्ठी की इन रचनाओं के बीच
मेरी रचना की मंजिल दूर नजर आती,
इसी तरह सत्य पथ के गंतव्य पर,
तन्हायी संग तन्मय चलता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
 

 5.
शील समुद्र की शालीनता देख
आदतन पूछ बैठा
क्या कभी मेरे दिल की चंचलता
तेरे जैसे अचल हो पायेगी
अपने उदर में लाखों जीवों का, संसार बसा पायेगी,
तभी ज्वार भाटा का जलजला किनारों को तोड़ अपने गर्भ में ले जाता,
किनारों के बचे जीवन के क्रंदन सुन फिर व्यथित हो जाता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।

सृष्ठि की इस दोधारी तलवार के पैनेपन को
मेरी तन्हायी जब तक परख पाती
तभी एक आवाज कानो से टकरायी,
मत भटक धरा के ओर-छोर
तेरे सवालों का जबाब
मेरी उत्तम रचना मानव मस्तिस्क ही है,
दृष्टि बदलेगा तो मैं सृष्ठि बदल जाऊँगी,
जीवन का सच तुझे समझा पाऊँगी।
फिर एक बार अंतर मन में झांकता हूँ
खुद पर ही खुद को हंसता देखता हूँ
मै अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।


6.


उस बिरान पथ पर लिखता
हर रोज सपनो की बातें,
क्या इससे सुन्दर अहसास दे पायेंगी?
हमारी मिलन की रातें,

तुम क्या जानोगे? तन्हायी के अहसास को
जुगलबंदी में रहने वाले तोता-मेना,
प्रेम की लो से देदिप्यमान रहता,
हर पल दिल का कोना-कोना,

कितना भी गरज-बरस जाओ मेघो तुम
अब यह चित विचलित नहीं होगा,
अडिग प्रेम किरणों की आभा को
कोई जलजला नहीं मिटा पायेगा,

बिरानी के इन घरोंदों में
मीठे पीड़ा का साम्राज्य बसता,
इस लिए रोज मंद दर्द की स्याही से  
एक पन्ना सपनो का लिखता,

7.राह 



उन तन्हा राहों में हम सफ़र नहीं मिला जिधर भी गया 
जिन्दगी के रस्तों को राहगीर की  तरह छोड़ता गया।

दुनियां को क्या देखता वह अपने को संवारती रही
मेरा सपनो का महल शीशे कि तरह टूटता गया।

उलझनों की कड़ियाँ  बिखरी पड़ी  थी उन राहों में 
सुलझाने की कोशिस में खुद ही उलझता गया।

चमन की बहारों से गुजरने को अब जी नहीं चाहता
यौवन में तन्हायी की राह पकड़ी थी चलता गया।

ना जाने कब होगा गंतब्य पूरा इस बीरान रस्ते का
चलते चलते जीवन का चौथाई पखवाड़ा गुजर गया।

 क्रमश:
बलबीर राणा "अडिग"

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

गढ़रत्न, गढ़पुरुष



वों का गीतों मा समयुं उत्तराखंड
वों की अभिवक्ति निर्विकार पहाडियों जीवन
हर शब्द मा उत्तराखंडे संस्कृति, संस्कार
सुर मा पहाड़े वेदना
ताल मा पीड़ा
पीड़ा बेटी- ब्वारियों की
पीड़ा ब्वे-बाबा की
ददा-दादीयों की रौंस
धै पहाड़ पहाड़ियों की   
धै भैजी-भूलों की
धै कुटुम, गौं, ख्वालों की
हे हिमालय पुत्र
अडिग तेरु सन्देश
अडिग उत्तराखंडी संस्कृति कु प्रहरी
तेरी धै सूणी
भिभ्डाट मची जांन्दू राज सत्ता मा
कुशासने कुर्शी हिल्दी
कुणा लुकी जांदा चोर-बिराला
कु बाटू नि देखी तेरी अंखियों न
कु भोंण नि पुरियायी तेरा कंठ न
उत्तराखंड की स्वाणी मुखडी
तेरा ज्यू की किताब मा दिखेंदी
तेरी नजर
कख नि जांदा
तेरु पराण
कख नि होन्दू  
रोंत्यला डांडियों मा
गंगा जमुना का निर्मल पाणी मा
बिपुल घर-कूड़ी, गौं-गुठियार मा
घुमणु रैन्दु वा भोंण
ते भोंण से फूल खिल्दा बांजा ज्यू मा
काब्लाट ह्वे जान्दु बुडडया पराण मा,
रूठी ब्वे की ममता नाचण बैठ जांदी
हे गढ़रत्न, गढ़पुरुष उत्तराखंडी शिरमोर
त्वेतें कोटि कोटि प्रणाम, प्रणाम,

२.
सबुं की अन्वार त्वे मां
सरु उत्तराखण्ड त्वे मा
सुखीयों कु सुख त्वे मां
दुखीयों कु दुख त्वे मां
डाडियों की रौनक त्वे मा
कांठीयों की चमक त्वे मां
पलायन की पीडा त्वे मां
बेरोजगार की संवेदना त्वे मां
गौं कु दर्द त्वे मां 
दाना सयोणु की लाचारी त्वे मा
ब्वे की ममता मां
पिता कु दुलार मां
ध्याणी की पीडा मां
भैजीयेां  कु प्यार मां
ज्वान खुदेड ब्वारी माया मां
फौजी भुला की ज्वानी मा
मायादारों की माया मां
नयुं ब्यौ कु उलार मां
बुडिडयों की रस्यांण मां
जख देख तख तुम
उत्तराखण्डियों दिल मा तुम
मन मां तुम
हे गढ रत्न
जतगा बोला उतगा कम
अब शब्द नी बलबीर भैजी  मा
इत्गा शाल बटि तेरी जगेयीं यु जोत
जै का उज्याला मां
उत्तराखण्ड की सस्कृति चमकणी चा
जुग - जुग जियां जुगराज रय्यां


आपकू -: भुला
बलबीर राणा “अडिग”