मंगलवार, 2 जून 2015

माँ कहाँ है बचपन


अरे माँ तु ही तो कहती थी
अले मेरे लsला
ज्यादा उथल पुथल न कल
बहार आने के बाद
खूब नाचना
सलालत करना
हुदंगल मचाना
किलकारियां मारना
कान्हा जैसा होगा तू जरूर
लेकिन!!!
जब आई बारी किल्किलाने की
तो... तो !
किताबों का बोझ
कंप्यूटर इंटरनेट
दुनियां का इन्साइक्लोपिडिया
और ना जाने कितने
बोझ तले
मेरी किलकारियों को दब गयी
धरती में आते ही
डाक्टर, इंजिनियर
और भी
पैंसों की मशीन बनाने की जुगत
होड़ अहम् की
दम्भ की
वाह रे दुनियां
दुनियां वालो
तुम्हारे लालच ने
बचपन आने नहीं दिया
बता माँ
कहाँ है बचपन?

रचना:- बलबीर राणा "अडिग"
© सर्वाधिकार सुरक्षित

मंगलवार, 19 मई 2015

विकास का पथिक

पथिक आप दौड़ रहे हैं
संग मेरी आशाएं भी पीछा कर रहीं हैं
आशाएं अपेक्षा को बल दे रही
सपना उन्नत भारत का देख रही
योगी राह में थक ना जाना
मेरी अपेक्षा को उपेक्षित ना होने देना
तुझे मंजिल पर पहुंचना होगा
मुख विरोधियों का बंद करना होगा।
सौभाग्य भारत का अब नहीं सोयेगा
अब ना दुःख की बाट कोई जोयेगा।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

सोमवार, 18 मई 2015

विकास का पथिक


आप दौड़ रहे हैं
संग मेरी आशाएं भी पीछा कर रहीं हैं
आशाएं अपेक्षा को बल दे रही
सपना उन्नत भारत का देख रही
योगी राह में थक ना जाना
मेरी अपेक्षा को उपेक्षित ना होने देना
तुझे मंजिल पर पहुंचना होगा
मुख विरोधियों का बंद करना होगा।
सौभाग्य भारत का अब नहीं सोयेगा
अब ना दुःख की बाट कोई नहीं जोयेगा।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

रविवार, 10 मई 2015

माँ मेरी भावांजलि


माँ
तेरे चुम्बन का अहसास
थपकियों का प्यार
गोदी का सुख
माथे पर काले टीके की
लक्षमण रेखा
टीस उस डंडे की चोट की
जो कुसंगति की राह से अभी भी रोके हुए है
सब कुछ तो है
तेरा मेरे साथ
केवल तेरी काया ही नहीं है
उबरे (किचन) मैं
शीलन भरी लकड़यों के साथ
जूझती तेरी फूक
और आँख के आँशु ही नहीं है
तेरा जीवन के मध्य में जाना
मेरा दुर्भाग्य था
आज तेरी सगोडि
फ़ूलों से लकदक है
सारे फूल तेरा अभिषेक करते हैं
इसी तरह आशीष की
छत्र छाया रखना ।

सगोड़ी=बाटिका

@ बलबीर राणा 'अडिग'
फोटो साभार गूगल

रविवार, 26 अप्रैल 2015

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मनुष्य निर्माण नहीं मशीनों का निर्माण


वर्तमान शिक्षा व्यवस्था मैकाले की शिक्षा व्यवस्था, जिसमें मनुष्य निर्माण नहीं मशीनों का निर्माण हो रहा है इसी शिक्षा व्यवस्था कि देन है कु व्यवस्थाएं और भ्रष्ट समाज, समाज कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि वह कर्मचारी, अधिकारी और नेता समाज का हिस्सा ही तो है जो केवल उपरी आय पर गिद्द निगाह जमाये बैठा है, और भौतिक सुख को ही जीवन का उद्देश्य मान चुका है I आज भरकम और व्यवसायीकरण भारतीय शिक्षा व्यवस्था के तले आम आदमी/ गार्जियन रौंदा जा रहा हैI हाल ये है कि जो माता पिता जान-समझ भी रहे हैं कि गलत हो रहा है लेकिन मूक होकर नियति मान पिसते जा रहे हैं क्योंकि बच्चे का भविष्य का सवाल है मशीन ही सही कल दो रोटी तो खा लेगा और बच्चे को मशीन बनाने कि कवायद पर जोरों से लगे हैंI क्वालिटी नहीं क्वांटीटी का विकास हो रहा है, ऊपर से सरकारी मानक प्रसेंटेज वाला थ्री इडियट का चतुर्लिंगम I

काश अगर लोकतंत्र में बोट के अलावा कोई और बिकल्प होता तो अच्छा थाI बोट बैंक और कुर्सी ने आम आदमी को सबकुछ फ्री देकर नपुंसक बना दिया भगवान् कृष्ण के कर्मफल का सिद्धांत फ़ैल हो गया समझो I अमुख पार्टी को बोट दो कुर्सी पर बिठाओ और बैठे बिठाए फ्री में पाओ I सचमुच में होना तो ये चाहिए था कि जनता का विकास करना है तो उनके बौधिक विकास के लिए उनके हाथ में काम  देना था फ्री का पैंसा नहीं I एक और महत्वपूर्ण तथ्य जो आज भारत की कर्मशीलता को क्षीण करता जा रहा है वो है आरक्षण! पता नहीं किस विद्वान ने इस आरक्षण वाली थ्योरी को चालु किया अगर वास्तविक में निन्म्बर्ग का उथान करना है तो उनको सार्वभौमिकता से काबिल बनाया जाय ताकि खुद की क़ाबलियत से वो आदमी वो सब कुछ अर्जन कर सके जिसका वो हकदार है  यह आरक्षण निति समाज के धुर्विकारण करने का फंडा है I सुना है अब पद्दोनती में भी आरक्षण होने लग गया है या  मांग हो रही है, बेक़ाबलियत और अनुभवहीन व्यक्ति तंत्र का संचालक बन बैठेगा तो भारत निर्माण ऐसे ही तो होगा जो पिछले ६७ वर्षों से होता आया है I इमानदार काबिल अधिकारी और कर्मचारी हजारों पोस्टिंग और मानसिक यातनाओं से झुजता रहता हैI

आज भारत के निति निर्धारकों को जापान जैसे देश से शिक्षा लेने कि जरुरत है जहाँ आदमी मशीनों का निर्माण करता है मशीन आदमी का नहीं और मैकाले की क्वांटीटी शिक्षा व्यवस्था को छोड़ स्वामी विवेक नन्द के कर्मयोग शिक्षा को अपनाना होगा तभी गाँधी जी के सपनो का भारत बनेगा, क्या कोई कुर्सी पर बैठा बुधिजीवी मुझे बता पायेगा कि उस शिल्पकार, कलाकार और कर्मकार जो निजी लघु उद्योग से खुद के साथ दूसरे की भी आजीविका बना है उसे क्यों नहीं किसी मैनेजमेंट या अन्य डिग्रियों से नवाजा जाता है? क्यों नहीं सरकार उसे अतरिक्त तनखा देती है? उस सफल किसान को क्यों नहीं डिग्री दी जाती जो अपनी मेहनत और तकनिकी से पैदावार कर देश की उदर ज्वाला शांत करता है ? इस शिक्षा व्यवस्था ने आज किसानी जैसे परमार्थी कर्म को भी संशय में डाल दिया और हताश किसान राजनीती पार्टियों द्वारा पिपली लायिब का नथा बनने पर मजबूर हो रहा है I असली भारत निर्माण के लिए निति नियंताओं को ऐसे हजारों क्यों पर मंथन, मनन और क्रियानवयन करना होगा  तभी जाकर एक स्वाबलंबी भारत और भारतीय का पुन: निर्माण हो सकेगा I

 
लेखक: बलबीर राणा ‘अडिग’
© सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

गुणों का बाजार

गुणों का बाजार
-----------------
सुना था
गुण और ईमान
एक दूसरे के पूरक होते है
ईमान बिकता नहीं
परन्तु
गुण बिकने लगे हैं
करोड़ों की बोली लगी है
अब !
मैं गरीब
गुण खरीदूं कैसे खरीदूं
गुण भी
अमीरों के हो गए।
@ बलबीर राणा 'अडिग'

मुठ्ठी भर सुख


बस?  मुठ्ठी भर सुख
और ! बक्सा भर दुःख
उठा लाया , फिर क्यों बोझ ढोने को रोता है
धतूरा जो तु बोता है।

समेटा है संभाल
मुँह चुरा न भाग
अमानत तेरी, मुझे क्यों उठाने को कहता है
घडी- घडी प्रार्थना करता है।

रचना:- बलबीर राणा 'अडिग'