घुमक्कड़ी यानि यात्राएँ हमें अनुभव, आत्म-विकास, भौगोलिक व पर्यावरणीय समझ के साथ दूसरे समाज, लोगों के रहन-सहन व सामाजिकता का ज्ञान देती है, साथ-साथ हमें स्वयं के मानसिक व शाररिक बल का बोध कराती है कि हम अनकम्फर्ट ज़ोन को कितना आत्मसात कर सकते हैं। क्योंकि घर से बाहर हर काम अनकम्फर्ट ही होता है, विशेष कर जब हम दूर की यात्रा या किसी एडवेंचर टूर पर होते हैं । घुमक्कड़ी की इस कड़ी में एक संस्मरण, एक विशेष समाधि के विषयगत रख रहा हूँ।
वर्ष 2019 में मैती मुहिम प्रेरणता, पर्यावरण विद पदमश्री कल्याण सिंह रावत ‘मैती’, जी से एक भेंट के दौरान प्रकृति व पर्यावरण वर्ता के दौरान इस समाधि के बारे में सुना था कि वन विभाग ने इस समाधि की स्थापना के सुअवसर पर उन्हें भी बुलाया था एवं 5 जून पर्यावरण दिवस पर इस स्थल पर भव्य अयोजन हुआ था। मैती जी ने कहा कि भुला जब कभी भी उस रस्ते जाना हो जरूर आप उस समाधि का दीदार किजयेगा। खैर उस समय जरूर हाँ की थी लेकिन बितते समय के साथ स्मरण में बात आई गई हो गई थी।
13 दिसम्बर 24 को नेटवार, मौरी ब्लॉक उत्तरकाशी से मेरी यात्रा वाया हनोल, मिनस होते हुए डाकपत्थर, देहरादून तक बतौर दुपहिया वाहन से थी, मौरी से हनोल के मध्य चीड़ के जंगल के बीच लगभग 300 मीटर तक रोड़ एकदम सीधी पड़ी, सीधी व एकांत रोड़ के चलते यकीनन वाहन की स्पीड 60 के आस-पास रही होगी, टौंस नदी की किनारे इस समतल सड़क के मध्य भागते हुए बायें तरफ लगे एक साइन बोर्ड पर निगाह पड़ी स्पीड में इतना ही पड़ पाया एशिया चीड़ महावृक्ष समाधि। 100 मीटर आगे पहुँचा ही था कि भैजी मैती जी की बात याद आ गई महावृक्ष की समाधि ? तुरन्त ब्रेक मारा गाड़ी रोकी और वापस पीछे मुड़ा और पहुँच गया इस अद्भुत एशिया चीड़ महावृक्ष समाधि स्थल पर।
अब मैं हनोल की तरफ से मौरी की तरफ था तो बोर्ड मेरे दाहिने था, जिस पर महावृक्ष समाधि 50 मीटर और दाहिनी दिशा को ऐरो का निशान लगा था। सड़क के साथ बायीं तरफ एक गेट बना है जिसके बायें पील्लर पर देवदार महावृक्ष व्यास 260 सेमी. बालचा क्र. स. 3 और दाहिने पिल्लर पर अंगु महावृक्ष व्यास 105 सेमी. वोक्तार गाड़ क्र. स. 1 लिखा था। आगे बड़ा तो सामने एक लोहे से निर्मित हट यानि स्मारक, जिसके चारों तरफ तार की जाली छत टिन की, बंद जाली वाला दरवाजा और दरवाजे केे ठीक सामने व मध्य में सिमेन्ट के चबुतरे पर चीड़ के तीन से चार फिट के चार गिंडके (कटे अवशेष) दरवाजे से चबुतरे के दाहिने और बायें दोनो तरफ चार से पाँच फिट के तीन-तीन गिंडके, बायें तरफ बोर्ड पर महावृक्ष का इतिहास जो नीचे की तरफ अब स्पष्ट रूप से पढ़ने में नहीं आता है।
श्री मैती जी द्वारा बाताई बात का स्मरण व बोर्ड के डेटा पढ़ने के बाद इस महान वृक्ष के प्रति श्रद्धा भाव उमड़ना वाजिब था कि पूरे एशिया महाद्वीप में कितने असंख्य चीड़ के वृक्ष होंगे और उन वृक्षों का पोषण भी उस भूमि की जैविकता व जलवायु के तहत ही होगा लेकिन तमाम समानताओं के बीच यह वृक्ष कैसे इतना विशाल बना होगा इसमें कुछ तो देवीय गुण होंगे जिससे इस वृक्ष को एशिया के सबसे वृहद वृक्ष, महावृक्ष की उपाधि मिली। भले आज यह वृक्ष भौतिक अस्तित्व नहीं है फिर भी उसकी विशेषता के चलते स्मारक अस्तित्व में पूजनीय है। यकीनन वन विभाग के वे सभी सेवक व अधिकारियों की श्रद्धा भी स्तुत्य हैं जिन्होने इस महावृक्ष के तनों को समाधि के रूप में संरक्षित कर इस वृक्ष को चिरजीवी बनाया।
द्यातव्य हो कि जौनसार-बावर से सटे बंगाण क्षेत्र के टौंस नदी वन प्रभाग के देवता रेंज ठडियार पट्टी की सीमा हनोल से लगी हुई है। हनोल से पांच किलोमीटर आगे देवता रेंज के खूनीगाड़ के नजदीक भासला बीट में एशिया महाद्वीप के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष की यह समाधि है। वन विभाग की तरफ से हर साल एक से सात जुलाई तक प्रदेशभर में आयोजित वन महोत्सव के अंतर्गत इस क्षेत्र में पौधरोपण किया जाता है।
इस समाधि स्थल पर वन विभाग द्वारा अंकित बोर्ड पर एशिया चीड़ महावृृक्ष का परिचय कुछ इस प्रकार दिया है:-
रेंज: देवता रेंज
मार्ग: पुरोला त्यूनी मोटर मार्ग
दूरी: पुरोला से 46 किमी, उत्तरकाशी से 160 किमी और त्यूनी से 20 किमी
नदी: टौंस नदी के किनारे
वृक्षारोपण: निर्मल कानन वृक्षारोपण वर्ष 1979
नपत: ऊँचाई 60.65 मीटर, गोलाई 2.70 मीटर
पुरस्कार: भारत सरकार पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 1997 में चीड़ महावृक्ष की उपाधि
आयु: 220 वर्ष
गिरने की तिथि: 8 मई 2007 में तूफान के कारण टूट कर गिरना,
गिरने का कारण: वृक्ष कवक गैनोडर्मा एपलेनेटम के प्रकोप से जड़ से उपर साड़े ती फुट तक खोखला हो गया था।
इससे पहले वृक्ष का उपचार भारतीय वन अनुसंधान केन्द्र देहरादून के पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एएन शुक्ला के नेतृत्व में किया गया था लेकिन पृथवी की हर एक कृति की अपनी आयु होती है और वह तयसुदा समय से इस जगत से विदा लेता है। इसलिए उपचार के बाद भी यह वृक्ष बच नहीं पाया।
महावृक्ष के साथ जुड़ी किवदंती :- इस वृक्ष से एक दिलचस्प किवदंती भी जुड़ी है जिसे बोर्ड पर भी लिखा गया है जो अब क्षतिग्रस्त होने के कारण सपष्ट पढ़ने में नही आता है, किवदंती में लिखा है कि सन 1964-65 में रुपिन-सुपिन वन क्षेत्र के तहत वन गुर्जरों का एक दल यहां डेरा डालने आया, जो कि अभी भी सतत रहता। उस दौरान तत्कालीन वन प्रभारी (डीएफओ) भी क्षेत्र भ्रमण पर थे। गुर्जरों ने इस भूमि को उन्हें लीज पर देने का आग्रह किया लेकिन वन प्रभारी ने गुर्जरों से शर्त रखी कि अगर तुम में से कोई इस वृक्ष पर चड़ जाएगा तो यह भूमि उन्हे लीज पर दी जाएगी।
बताया जाता है कि गुर्जरों की एक साहसी महिला ने वन प्रभारी की चुनौती स्वीकार की और महावृक्ष पर चढ़ गई, वह साहसी महिला चढ़ तो गई लेकिन नीचे उतरते समय फिसलने से नीचे गिर गई और ज्यादा चोट के कारण उसकी मृत्यु हो गई। इस महिला की समाधि भी इसी महावृक्ष के समीप बताई जाती है जो मुझे देखने पर नहीं मिली हो सकता है उस समाधि को इतना व्यवस्थित ना किया गया हो। इस किवदंती के संबन्ध में स्मारक स्थापना के समय श्री मुहम्मद आलम पुत्र श्री अल्लादीन से पूछा गया जिसमें उन्हाने इस बात की पुष्टि की। यह मुहम्मद आलम उस गुर्जर समूह के वंशज या परिजन हैं या और कोई, बोर्ड पर लिखा मिटा हुआ है, जिसे वन विभाग द्वारा मरम्मत कर सही करने की गुजारिस है ताकि ऐतिहासिक तथ्य पीढ़ियों तक सही पहुँचे।
जै सा उपरोक्त उधृत है कि इस माहावृक्ष समाधि स्थल के गेट के पिल्लरों पर दो अन्य महावृक्षों के नाम उल्लेखित हैं, देवदार महावृक्ष व्यास 260 रेमी बालचा रेंज एवं अंगु महावृक्ष व्यास 105 सेमी वोक्तार गाड़। ये वृक्ष रहे तो अन्य वन रेंज से हों लेकिन वन विभाग ने इन दोनो महावृक्षों की समाधि भी यहां चबूतरे के के रूप में स्थापित की हुई है, वन विभाग की यह पहल व श्रद्धा आम जन मानस को पर्यावरण संरक्षण व प्रकृति से आत्मीय संबन्ध जोड़ने के लिए प्रेरित करती है।
द्यातव्य रहे कि गुणी जनों की संगत का फल हमेशा हितकारी होता है, पदमश्री कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ जी के सानिध्य में इस महावृक्ष की कहानी का पता नहीं चलता तो उस दिन मैं भी उसी 60 की स्पीड में चलता बनता और यह ऐतिहासिक धरोहर जमीन में होने के बावजूद मेरे लिए सदैव के लिए अनविज्ञ रहती साथ ही मैं इस ऐतिहासिक स्मारक का संस्मरण आप सुधी पाठकों तक नहीं पहुँचा पाता।
@बलबीर राणा 'अडिग'







