अडिग शब्दों का पहरा

धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।

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सोमवार, 15 सितंबर 2014

अडिग शब्दों का पहरा: मैं हिन्दी हूँ

अडिग शब्दों का पहरा: मैं हिन्दी हूँ
प्रस्तुतकर्ता बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' पर 9:47 am
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बलबीर सिंह राणा 'अडिग '
धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है, आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा, इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे। लेखन :- राष्ट्र भाषा हिन्दी और मातृभाषा गढ़वाली में पद्य व गद्य की सभी विधायें। प्रकाशित पुष्तकें :- हिन्दी : - सरहद से अनहद, कविता संग्रह। भावांजली, शब्दों के ओट से, अंजुरी और शब्दों के पथिक, साझा काव्य संग्रह। गढ़वाली :- खुदेड़ डंडयाळी-कविता संग्रह। प्रकाशाधीन :- एक ढ़वाली, एक हिन्दी कहानी संग्रह व एक संस्मरण । आगे भारत क्षितिज पर डायरी के पन्नो के साथ की यात्रा जारी है ।
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