शनिवार, 16 मार्च 2019

असंभव कहना नहीं सीखा


भारत भू कण कण नाप
दिग्विजय इतिहास लिखा
पौरुष अरुण शिखा मुझे
माँ भारती का भाल दिखा

चलता हूँ उस किरण पीछे
जो तिमिर में राह दिखाती
राष्ट्ररक्षार्थ धर्मयज्ञ में
रक्षति रक्षत: मंत्र जपती

मन मोह नहीं खोज पाया
चक्षु यौवन न पा सके
उर उठते किसलय भाव
कंठ ऊपर गमन न कर सके।

कर्म भुमि में लक्ष्य मिला
त्याग समर्पण और दृढ़ता
फिर क्या था चलता रहा
असंभव कहना नहीं सीखा।

जय बद्रीविशाल
Dedicated to
Maj Amit Dimri , SC

@ Balbir Rana 'Adig'

2 टिप्‍पणियां:

Kamini Sinha ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना... ,सादर नमन

बलबीर सिंह राणा 'अडिग ' ने कहा…

हार्दिक आभार आदरणीया कामिनी जी