शनिवार, 11 अगस्त 2012

मिलन घडी


मिलन घडी

मिलन घडी की ज्यों निकट आती
बिरह बेदना और बढ जाती

मन चंचल ब्याकुल
और ब्याकुल
दिल की धडकन तेज
थाह ना ले
सरपट निगाह घडी पर
अभी तो पूरा दिन बाकी
सुबह से ांय
दिन से रात का
गुजरने का इन्तजार
लम्हंे लम्बे हो जाते
कलेन्डर देखता
अभी तो महिना बाकी
मिलन की तडफन
और तडफाती
यादों का सेलाब
उमडताए घुमडता
बेग मारता
आॅखों में तस्बीर उभरती
हॅसती हुई स्वागत करती
आगोा में भरने को
बाहें खुल जाती
यका यक तन्द्रा टुटती
ठगा रह जाता
घडी मिलन की ज्यों निकट आती
बिरह बेदना और बढ जाती
10 अगस्त 2012

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

हमारे विकाश पुरुष







हमारे विकाश पुरुष
 देव भूमि का नाम बदल कर
 बिजली  भूमि   रखना  चाहते  हो  A
बसे  बसाये  गाँवघर उजाड़,
क्यों विस्थापन करना चाहते हो A
अपनी पौराणिक   धरोहरों पर ,
क्यों इस  तरह डाका  डालते  हो A
वजूद  मिटाने  चले  देव  भूमि  का ,
और  कितनी  त्रासदी चाहते हो A
विकाश के नाम  की  बिनाश  लीला
कब तक मचाते  जाओगे  A
प्रकृति  की चीज  छेड़  कर  
और कितने  नगर  बहाओगे A

एक  यूनिट  बिजली  दे नहीं सकते ,
कैसे  विकाश के दीप जलाओगे A
पहाड़ का पानी बहार बेचकर
कितना राजकोष बनाओगे A
भूल गए उन बलिदानों को ,
उत्तराखंड जिन्होंने बनाया है A
आज तक न्याय दे नहीं सके , 
मरहमपट्टी कब तक लगोगे A
जनता को बरगलाना,  सुर्ख़ियों में रहना,
ऐसे विकाश पुरुष कहलाते हो A
वोट मांगने के सिवाय इलाके में ,
दुबारा नजर नहीं आते हो A
कुटीर उद्योग लगा नहीं सकते ,
डामों से क्यों डुबाते हो A
स्वरोजगार दे नहीं सकती,
क्यों पलायन का रोना रोते हो A
मूलभूत सुविधाएँ   सुधर नहीं   सकती,
क्या योजना बनाते हो A
योजनाओं के पैंसे हजम करके ,
लम्बी डकार मार जाते हो A
कोन सी लोटरी लग जाती है,
पांच साल में अरबपति बन जाते हो A

रचना -: बलबीर राणा "भैजी"
०९ अगस्त २०१२

बुधवार, 8 अगस्त 2012

माँ भारती का रक्षक




माँ भारती का रक्षक


अडिग हूँ अडिग ही रहूँगा
ये विश्वाश दिलाता हूँ
माँ भारती का रक्षक हूँ
फर्ज  निभाता जाऊंगा

दंश कितने झेलने भी पड़े
खुसी - खुसी झेल जाऊंगा
रास्ता क्यों ना कंटक भरा हो
हंसी - खुसी चला जाऊंगा
उफ़ न निकले जुबां से मेरे
ये कसम   कहता हूँ
अडिग हूँ अडिग ही रहूँगा
ये विश्वाश दिलाता हूँ
माँ भारती का रक्षक हूँ
फर्ज  निभाता जाऊंगा

ठिठुरता रह जाऊंगा
शीत भरी  लहरों को ऐसे ही
सीने पर सह जाऊंगा
जो भी रोड़ा राह में आये
ठोकर उसे मार जाऊंगा
अडिग हूँ अडिग ही रहूँगा
ये विश्वाश दिलाता हूँ
माँ भारती का रक्षक हूँ
फर्ज  निभाता जाऊंगा

 तिरंगे  पर तिरछी  नजर रखने वालो
आँख में तीर चलता  जाऊंगा
हुंकार अगर भरी दुश्मनी की तो
सांसे बंद कर जाऊंगा
मेरी धरती पे कदम बढ़ा के देखो
पग वहीँ तोड़ जाऊंगा
अडिग हूँ अडिग ही रहूँगा
ये विश्वाश दिलाता हूँ
माँ भारती का रक्षक हूँ
फर्ज  निभाता जाऊंगा

हवा, पानी, समुद्र कहीं भी
अडिग खड़ा दिख जाऊंगा
माँ भारती के रक्षा के खातिर
जान पे अपनी खेल जाऊंगा
कसम गीता की खायी में
हर हाल में निभाता जाऊंगा
अडिग हूँ अडिग ही रहूँगा
ये विश्वाश दिलाता हूँ
माँ भारती का रक्षक हूँ
फर्ज  निभाता जाऊंगा

कश्मीर से कन्याकुमारी तक
चक्कर  लगता जाऊंगा
असाम से कछ भुज तक
निगाह  दौड़ता जाऊंगा
जहाँ भी दुश्मन पर मारे
पर वहीँ कुत्तर जाऊंगा
अडिग हूँ अडिग ही रहूँगा
ये विश्वाश दिलाता हूँ
माँ भारती का रक्षक हूँ
फर्ज  निभाता जाऊंगा


रचना -: बलबीर राणा "भैजी"
०९ अगस्त २०१२



मंगलवार, 7 अगस्त 2012

झूट का आवरण




झूट का आवरण
क्या रह गया बाकि
सब तो  तिलिस्मी दे कर आई हो
न  रखी लाज किसी  की
सब निर्लज कर आई हो
इस  तरह  फिर से  दस्तक  
मेरे दर पर देनी  आई हो
में भूल गया था उन लम्हों  को
फिर क्यों  आग में घी डालने आई हो
अरे मेने क्या बिगाड़ा था तेरा
जो इनता बेगैरत किया मुझे
न किया मान किसी का मैंने
ना रखा सम्मान 
न रखा  ख्याल ऊँचे
न किया निचे का  भेद
सबको जाल में फँसाती आई हो 
किसी को न छोड़ा
सबको बनाती आई हो
फिर आज वही रेत की राह
मुझे दिखाने आई हो
थक गया में इन राहों पर
चलते चलते
अब और नहीं चला जाता
अब कुछ सुकून से रहने  दो
आज तक काट रहा था
अब जीने दो
नहीं पहना जाता तेरा ये आवरण
अब खुला ही  रहने दो 
तू झूटी  है फरेबी है
फरेबी ही रहेगी
कब तक रखेगी  परदे में
एक दिन बेपर्दा  होना ही है
आज नहीं कल
किवाड़ खुलने ही हैं
जा भाग चल दुबारा न आना
तेरे  आवरण से
सच्चे जीवन का तन नहीं ढकता
…………….रचना बलबीर रना "भैजी"






सोमवार, 6 अगस्त 2012

निर्दयी मेघ


 
उत्तराखंड में भीषण मेघ वर्षा का मंजर देखकर मन उद्वेलित होता है, प्रकृति के इस क्रूर व्यवहार से अब किसको दोष दिया जाय नियति  या......................?   
निर्दयी मेघ 
निर्दयी मेघ
ये क्या कर गया 
आना था धरती  को  सींचने
विभित्सिका छोड़ गया 
हाहाकार  मचा गया

निर्दोष जीवन पर
दोष लगाकर चल गया
 इतना भी  रुष्ठ  क्यों
क्या अपराध था हमारा
आया था शीतल करने
बेदना में जला गया
सब कुछ लील गया !!!!
भयावय मंजर छोड़ गया
कहाँ जायंगे वो परिंदे
जिसके घोंसले तू उजाड़ गया
किसी को तड़पता छोड़ गया ,
किसी की ममता तोड़ गया
किसी का   सुहाग  छिन  के   ले    गया ,
मांग  सुनी कर गया............
ओह!!!!!
क्यों इतना दंश दे गया ....
वर्षों की मेहनत चट कर गया
क्यों  इतना वेग में आया? .
राह  में सबको उड़ा गया
भरा पूरा घरोंदI मेरा
उजाड़ के तुने क्या पाया  ...
कितने पराभव से  बनाया था मैंने
पल में  ढहा गया ,,,
तेरी गर्जना से  धरती कंप गयी  
बज्र बाण शीने को चीर  गए,
कहीं बनी खाईयां…….
कहीं अनायाश रगड़
अब यहाँ  क्या बच गया
जिसे तू सींचेगा
निर्दयी मेघ
ये क्या कर गया
……….. रचना -: बलबीर राणा  "भैजी"

रविवार, 5 अगस्त 2012

किशोरवय  जीवन का वह  समयांतराल है  जिसे सही मार्गदर्शक  और एक  मजबूत   सहारे की जरुरत होती  है इसी किशोरवय में ही कल   के सुनहरे   भविष्य की सुद्रिड नीव रखी जा सकती है, और इसी नीव पर एक आदर्श और सम्पूर्ण जीवन रुपी भवन खड़ा होता है समय पर  सहारा रुपी पथप्रदर्शक न मिला तो बिना सहारे की जैसी बेल जमीं पर लिपट लिपट के अपना बजूद खोजती रहेगी  और लताएँ भ्रमित होकर चरों दिशाओं में हाथ बढाती रहेंगी


वटवृक्ष: स्त्री- देह का सच

वटवृक्ष: स्त्री- देह का सच
प्रज्ञा पांडेय जी इस कटु सत्य के लिए इससे ज्यादा सब्द नहीं  हो सकते  आभार स्वीकार करना इस सुन्‍दर लेखन के लिये