शनिवार, 8 सितंबर 2012

यौवन तुझे ललकार


यौवन तुझे आज फिर ललकार!!
तेरा जीना बेकार!!

फैला है अनियमिता का अन्धकार
लूट खसोट का व्यापार
खुली आँखो के धृतराष्टों के अंधे युग में
कब तक जीते रहोगे?

घातक देशद्रोही
बने सरकारी मेहमान
कानून इन हत्यारों को सजा देने में है नाकाम
इस करूणमयी कानून व्यवस्था को
कब तक व्यवस्थित मानते रहोगे?

अर्थव्यवस्था की खस्ता हालात
रोजमर्रा चीजों की आशमान छूती लागत
सर्वोच कुर्सी पे बैठे अर्थशास्त्री के असहाय तर्कों से
कब तक सन्तुष्ट रहोगे?

सत्तर रूपये किलो दाल का
सत्तर फीसदी घरों में लाले हैं।
दप्तर कार्यालयों में रिश्तखोरों के न्यारे वारे हैं।
इनके ही काम के लिए इनको
कब तक रिश्वत देते रहोगे?

भ्रष्टाचार के दंश से तडप रहा देश
जनप्रतिनिधीयों के दो रूपी दो भेष
भ्रष्टाचार के नासूर को
और कब तक सहते रहोगे?

विकाश के वायदे मात्र वोट तक
कार्य संपादन सीमित घोषणाओं तक
सत्ता के लोलुप शकुनियों के पासों में 
जीवन की बाजी कब तक हारते रहोगे?

गर्दि में ना डालो अपने पुरूषार्थ को 
जुल्मों का हाहाकार मचा चहुं ओर
खून का दरिया उफान पर
बज्रपात मानवता के मन्दिर में
कब तक सहते रहोगे?

हर दिन चीर हरण हो रहा द्रोपतियों का
दुशासनों की भरमार
महफूज नहीं रही नारी
कब तक मूक किंकर्तव्यविमूढ़ पांडव बने रहोगे?

भाई भाई को लडाया जा रहा
देश की धर्मनिरपेक्षता को
भेदभाव में बिखराया जा रहा
पहले ही इतना बिखर चुके
और कितना बिखराये जाआगे?

अखबार टेलिविजन में रसूखी खबरों की भरमार है।
पूरा सूचनातन्त्र बना चाटुकार है।
भूक गरीबी इनको दिखती नहीं
सुर्खियों मे रसूखदारों के जलसों के जलवे
अधनंगी बालाओं के ठुमके
देख कर कब तक मदमस्त होते रहोगे?

दहशतगर्दों का आक्रमण देश के चारों ओर
बारूद के ढेरों से भरा ओर छोर
साजिसों से भडकायी जा रही सामप्रदायिकता की ज्वाला
इन साजिसों से कब चेतोगे?

अब ना कोई कृष्ण आयेगा।
ना कोई गीता ज्ञान सुनायेगा।
राज काज ताजपोषी में भाई बन्धु का मोह
स्वयं तोडना होगा।

आज ना कोई सुभाष पुकारेगा।
ना टेगोर गांधी आयेगा।
ना कोई अहिंसा का पाठ पढायेगा।
लोक तन्त्र में हो रही हिंसा को
अहिंसक बनाने को
युवा तुझे आगे आना होगा




किसी ना किसी को
भगत सिंह बनना होगा।
रगं दे बसन्ती गाना होगा।
पडोसी नही!!
अपने ही घर में मातम मनवाना होगा।
चोरों से देश को बचाना होगा।

जाग यौवन जाग
दर दर ना भाग
कब तक सोता रहेगा?
कब तक भटकता रहेगा?
यौवन तुझे ललकार है
नही तो तेरा जीना बेकार है!!!! जीना बेकार है!!!!

बलबीर राणा "भैजी
08 सितम्बर 2012

बुधवार, 5 सितंबर 2012

चिंतन : शिक्षा का स्वरूप आज और 25 वर्ष पहले



25 वर्ष अतीत में मेरी स्कूल गुरू आश्रम हुआ करती थी। अच्छी तरह याद है मुझे हमारे गुरूजन निस्वार्थ भाव से हरसम्भव अपने विद्यार्थीयों को ज्ञानार्जन कराते थे, और विद्यार्थी तन, मन धन से गुरू सेवा करते थे। हमारी अतरिक्त पाठ शाला आमतौर पर रात्रि में लगती थी जिसे हम बसेरा का नाम देते थे हम बोरिया बिस्तर के साथ स्कूल में ही रहा करते थे विषेशकर पांचवीं और आठवीं बोर्ड परिक्षा के विद्यार्थी इस आश्रम के हिस्से हुआ करते थे। अच्छी तरह याद हैं वे बसेरा की रातें जब मध्यरात्रि में पढते पढते हमें नींद के झोंके में हेाते तब हमारे गुरूजी हमें भारतीय दर्शन की कहानियां सुनाये करते थे कितना र्निविकार कर्म था वह जब शिक्षक सच्चे रूप से अपने गुरूधर्म का निरवहन करते थे। लेकिन वर्तमान आते आते यह धर्म व्यवसायिक और केवल कर्मो की इतिश्री रह गया है। आज ना ही विद्यार्थी और अविभावक का शिक्षक के प्रति विश्वास और श्रधा है, ना ही शिक्षक का अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा है। आज शिक्षा का भवन धन की लोलुपता पर खडा है जिससे  विद्यार्थी को किताबी ज्ञान तो मिल जाता परन्तु आत्मज्ञान नहीं मिल पाता जिस आत्मज्ञान पर सच्चे जीवन का सृजन होता है फलस्वरूप सत्ता के लोलुपी मनुष्य का निर्माण होता जो भ्रष्टाचार का संवाहक बन जाता है। शिक्षा का यह स्वरूप कहीं ना कहीं वर्तमान सामाजिक विभत्सिकाओ के लिए जिम्मेवार ठहराया जा सकता है।
बलबीर राणा "भैजी
5 सितम्बर 2012
  

गुरू ज्ञान की मशाल




शिक्षक दिवश पर गुरुजनों  के चरणो में अपने मन की भवनाओं को सर्मपित करता हूँ उन्हीं के ज्ञानदीप के प्रकाश से इस संसार को सही मायनो में देख पाया हूँ। 


गुरू सत्य है सुन्दर है सर्वोपरि है
अलौकिक विद्या का भण्डार है

गुरू संकट मोचन है
आज्ञान रूपी दानव का संहारक है

गुरू गागर में सागर है
जिसमें भरा सम्पूर्ण ब्रह्मांड का ज्ञान है

गुरू ज्योतिपुंज से
जीवन प्रकाशामान है

गुरू स्नेहल नीर से
ऊसर बुद्धि सिंचित है

गुरू अमृतवाणी से
जग प्रेम अमर है

गुरू स्वच्छ जल श्रोत से
ज्ञान पिपाषा तृप्त है

गुरू मार्गदर्शन से
जीवन सनमार्ग पर अग्रसर है

गुरू ज्ञानदीप से
भविष्या दैदीप्यमान है

गुरू ब्रह्मास्त्र से 
अज्ञानता का समूल नाश है

गुरू ज्ञान की अविरल धारा 
जीवन प्रयन्त चलायमान है

गुरू तेरे ज्ञान की मशाल
मन में सदैव प्रज्वलित रहे

गुरू तेरे र्निविकार उपकार को कैसे भूलूं
तु ही जीवन का खेवन हार है।

बलबीर राणा "भैजी
5 सितम्बर 2012



सोमवार, 3 सितंबर 2012

व्यवहार में दोरूखी प्रवृत्ति



दुनियां तेरे रंग भी अजीब हैं
आचरण की नियमावली में
दोहरे संस्करण, दोहरे मानदंड अपनाती है।

अपने लिए कुछ और,
दूसरों से कुछ और व्यवहार चाहती है।

लाडला अपना गलती करे नॉटी कहके पूचकारे जाये
पडोसी का महा बिगडा कहलाये।

परिक्षा में फेल होने पर,
दूसीरों का लडका आवारा और नाकाबिल कहलाता है
अपना किमत मारा होता है।

लडकी जब दूसरे लडकों से बतियाये, घूमे
अपनी खुले विचारों की (फेक) कहे जाती
वही पडोसी की हो, चाल चलन पर अंगुली उठायी जाती।

काम बिगडे दूसीरों का
अजी !!!!!. हमारी कौन सुनता........ छत्तीस मीन मेख निकलते,
जब यही अपने पर बन आये..... ग्रह खराब के बहाने लगते।

जब बच्चा नौकरी अपना पाये,
किस्से कामयाबी के घर घर बताये जाते।
दूसरों के मिलेने पर,
सब सेटिंग और जुगाड का चक्कर होता है।

अपनी सफलता का श्रेय, अपनी काबलियत है ।
वहीं विफलता पर, वाह्य करकों के कारण गिनाये जाते।

यहां तक घर आये मेहमान से क्या लाये हैं की अपेक्षा होती।
वहीं अपने आप जाने पर कुछ तो देंगे ही की चाहत होती।
मनुष्य तेरी इस दोरूखी प्रवृत्ति क्या कहें ?

बलबीर राणा "भैजी
०३ सितम्बर २०१२ 


रविवार, 2 सितंबर 2012

अडिग शब्दों का पहरा: लालसा

अडिग शब्दों का पहरा: लालसा: लालसा जीवन की आश तु ही जगाती खुल जाते मन के कपाट ओर-पोर जुड जाते दिल के तार तन सावधान ऑखों में चमक कान अडिग खडे वाणी...

शनिवार, 1 सितंबर 2012

लालसा


लालसा
जीवन की आश तु ही जगाती
खुल जाते
मन के कपाट
ओर-पोर जुड जाते दिल के तार
तन सावधान
ऑखों में चमक
कान अडिग खडे
वाणी मृदु से भी मृदु
भुजा पकडने को आतुर
पगों की गति बढ जाती
इन्द्रियां अपने गन्तव्यों में सजग
कुछ छूट ना जाये
मौका चूक ना जाये 
तेरे बिना
जीवन की कर्म क्रियायें
निरीह निष्क्रीय
तेरा सुमार्ग सफलता को
कुमार्ग बिफलता को
आज तक मैं भ्रमित
कहां से आगमन तेरा
किधर को निगमन
तु आगे मैं पिछे
कुछ हाथ में आ जाता
कुछ छूट जाता
नाता तोड ना देना
साथ छोड ना देना
जीवन कि ज्योति जगाते रहना
……………………बलबीर राणा "भैजी
1 सितम्बर 2012