सोमवार, 17 सितंबर 2012

रूद्र रूप

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रूद्र तेरे रूप ने कल के
हंसते खेलते जीवन को
आज !!!!!
शोकसंतप्त बिरानी में बदल दिया।
गिददों का अकाट्य जमवाडा
हाहाकार मचाता
क्रुर………… क्रन्दन
अपराधी बनी बिद्याता
निठली मूक खडी है
अश्रु भरे चेहरों को
आक्रोषित नजरों से घूर रही है
प्रकृति तेरे धुर्त अकर्मण्य कर्म ने
चहकते चमन,
महकते आंगन को
रिसता रगड बना बना दिया
जहाँ अब जीवन के अवशेष
मिटटी गारों के साथ पुल-पुल करते बह रहे
रात झींगुरों का सुर,
दुखी दिलों को चीर रहा
अरे !
यह सन्ताप !!!!
र्निदोशों को क्यों दे गया?
प्रकृति तेरे रूद्र रूप से
भ्रष्टाचार रथ के सारथी आने वाले हैं
त्रासदी भरे मातम में अपना रथ चलाने वाले है
तेरे कर्म पर राज रोटी सेंकने वाले हैं
कुछ राहत के छीटें मार ………. मानवता की इतिश्री करने वाले हैं
दुखीयों के नाम खुद का घर भरने वाले हैं
तु ही बता
किस रूद्र रूप का सामना करें ?
तेरे या खुद के ......
(रगड = भुस्खलन के बाद की जमीन, पुल-पुल = आहिस्ता खसकती जमीन, गारे = छोटे कंकड पत्थर)
बलबीर राणा "भैजी"
१६ सितम्बर २०१२ 



गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हिन्दी की दशा या दुर्दषा

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राष्ट्रभाषा अपनी क्षीणतर हो चली
हिन्दी का हिंग्लिस बन खिंचडी बन चली
अपनो के ही ठोकर से
अपने ही घर में पराई बनके रह गयी
आज विदेशी भाषा अपने ही घर में घुस
मालिकाना हक जता रही
उसके प्यार में सब उसे सलाम बजा रहे
यस नो वेलकम सी यू कहकर
शिक्षित सभ्य होने की मातमपुर्षी बघार रहे
अंग्रेजी बोलने वाला कुलीन शिक्षित है
ना बोलने वाला गंवार अनपड
राष्ट्रनेता हिन्दुस्तान के
राष्ट्रभाषा के नाम पर ऊँचा भाषण
ऊँची योजना बनाते
नाक रखने के लिए कभी कभार
रोमन में लिखी भाषण कुंडली
हिन्दी में पढ लेते
नयीं पीडी हिन्दी बोल तो लेते
पढ लिख नही सकते
नयीं पीडी के आदर्श बने
खिलाडी चलचित्र सीतारे
हिंग्लिस की गिटपिट से
हिन्दी की रूप सज्जा करते फिरते
अब वो दिन दूर नहीं
संस्कृत की तरह हिन्दी भी
पूरी तरह उपेक्षित होने वाली है
ज्ञान विज्ञान के भण्डार ग्रन्थ
पुस्तकालयों के में
चिस्कटों के शूल से जीवन की आखरी शांसे गिनने वाले हैं
ग्रन्थो का विदेशी अनुवाद
अपभ्रंषक होकर और ही अर्थ समझाने वाले हैं
हिन्दी की दशा या दुर्दषा के लिए
कौन जिम्मेवारी लें
तुम्हें क्या पडी रहती साहित्यकारो
हिन्दी की दुर्दषा पर लिखते रहते
राष्ट्रभाषा ठेकेदारों की तरह तुम भी
हिन्दी दिवस पर वार्षिक कर्म कांड कर लो
पितृ पक्ष के श्राद्ध की औपचाकिता निभा लो

बलबीर राणा "भैजी
१३ सितम्बर २०१२ 

बुधवार, 12 सितंबर 2012

प्रीत का उपकार



प्रीत का कैसे उपकार करूँ
प्रेम से बंधा प्रेमाहार दूँ
शुभ बोलो की शुभकामनायें
शब्दों से गुंथे शब्दाहार से
श्रिंगार करूँ
अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति
कैसे व्यक्त करूँ
नीरस जीवन को सदाबहार कीया तुने
बंजर दिल में फूल खिलाये

इन्ही फूलों से तेरा आंगन सजाऊँ
नौबहारों से सुसजित
जीवन खुशियों से सरोबार हो
यही कामना बार बार करूँ

बलबीर राणा "भैजी"
११ सितम्बर  २०१२