शनिवार, 28 सितंबर 2013

नाद




स्वतंत्र भारत में जीने का अर्थ दे दो
भारत का आम आदमी हूँ मेरा हक़ दे दो
मुझे मुक्ति चाहिए मुक्ति दे दो,
दोगुले नेताओं से
प्रपंची कटाक्ष से
दो धारी राजनीति से
भ्रष्टाचार रुपी दानव से
घूसखोर अधिकारी से
दो मुंहें व्यवहार से
धार्मिक भटकाव से
सांप्रदायिक टकराव से
स्वतंत्र भारत में जीने का अर्थ चाहिए
मै अपने ही देश में असुरक्षित हूँ सुरक्षा चाहिए
बोली में राष्ट्र भाषा की
सड़क पर नारी की
संस्कृति में संस्कारों की
भूके गरीब के लिए रोटी की
प्रकृति में पर्यावरण की
विश्व की बृहद संसद क्या गांधी के सपनो का भारत दे सकोगे ?
या कुरसी पर बैठ अनाचरण की चरमता पार करोगे ?

२ अगस्त २०१३
© सर्वाध सुरक्षित
... बलबीर राणा “अडिग”

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

बिषधर मित्र नहीं हो सकता



















प्रवृति धोखे फरेब की हो
हिम्मत नहीं सामने से मुकाबले  की हो  
वार पीठ पर ही करेगा, ये हम क्यों भूल जाते  
फिर भी दोस्ती की पींगे बढाने चले जाते

नापकों की प्रकृति बदलने का चलन नहीं चलने वाला 
दूध पिलाने से भी, जहर फेंकने का स्वभाव  नहीं बदलने वाला  
डंक मार कर बिल में घुस जाना बंद नहीं हो सकता,
बिषधर मित्र नहीं हो सकता.

कब तक शहीदों की चिता सजाते रहेंगे, 
सटे साटयम का शूत्र कब समझेंगे, 
बीर जाबांजो को भी पंगु बना दिया,
इस पंगु नेतृत्वा से कब निजात पायेंगे.


......... २८ सितम्बर २०१३

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

अडिग प्रहरियों कु रैबार



यूँ डांडी काठियों मा भटकण ब्वे,
गाढ़ गद्नियों मा हिटण ब्वे,
नि लगदु ज्यू पराण यख ब्वे,
ये बोर्डर की जिंदगी ब्वे

ये शांत दीखण वली सीमा रेखा मा,  
जीवन सदानी अशांत रैयी ब्वे,
संताप बिलाप मंखियत कु,
मनखी वार-पार का तपण रैनी ब्वे

पीड़ा यूँ अडिग प्रहरियों की,
कैन जाणणे की कोशिस नि करी ब्वे,
कने होन्दी खाणी कमाणी यूँ की,
कनकै, कैतें समझाणी ब्वे

बारहा मेनो की बारहा ऋतू,
यों कभी नि देखी ब्वे,
शाल भर ह्युंद ही रैयी,
या रैयी वर्षभर जेठ और चोमाश ब्वे

संबेदनाओं का द्वि बोल,
संकट घडी पर लोग बोली जांदा ब्वे,
सदाहत पर सियासत इन करदन,
जन यूँ का हम क्वी नि लग्दन ब्वे  
...... बलबीर राणा "अडिग" 

सोमवार, 23 सितंबर 2013

जीवन की सच्चाई "मुश्कान"



फूलों से पूछा, मुश्कान कैसे पायी,
सुसजीली देह तुमने कैसी सजाई
मोह लेते मन निष्ठुर का भी तुम
प्रेम की यह कला, तुममे कैसे आयी??

फूल बोले, लाख दर्दों और झंजावातों को झेलकर,
जीवन ज्योति, हम अपनी जगाते हैं,
प्रकृति के थपेड़े खाकर भी मुश्काराते हैं,
दो दिन की, ही सही, जिंदगी हमारी,
फिर भी लाखो दिलों को जीत जाते हैं.

तुम इन्शानो ने धरती क्या, नभ भी जीत लिया,
स्वस्वार्थ के बसीभूत, सबको को अपने बश में किया,
लेकिन जीवन की सच्चाई, तुम जान न सके,
इसलिए मुश्कान तुम पा न सके....

   


फूलों से पूछा, मुश्कान कैसे पायी,
सुसजीली देह तुमने कैसी सजाई
मोह लेते मन निष्ठुर का भी तुम
प्रेम की यह कला, तुममे कैसे आयी??

फूल बोले, लाख दर्दों और झंजावातों को झेलकर,
जीवन ज्योति, हम अपनी जगाते हैं,
प्रकृति के थपेड़े खाकर भी मुश्काराते हैं,
दो दिन की, ही सही, जिंदगी हमारी,
फिर भी लाखो दिलों को जीत जाते हैं.

तुम इन्शानो ने धरती क्या, नभ भी जीत लिया,
स्वस्वार्थ के बसीभूत, सबको को अपने बश में किया,
लेकिन जीवन की सच्चाई, तुम जान न सके,
इसलिए मुश्कान तुम पा न सके....
   

रचना -: बलबीर राणा " अडिग"