सोमवार, 30 सितंबर 2013

ममता



!!!

ममता

कैसी जडवत जकडन तेरी

जीवन पर,

मानव् तो मानव,

दानव भी तेरी मुठ्ठी में,

प्राणी धरा के

तेरे अलर्गन में बसीभूत,

साम्राज्य तेरा,

भूलोक क्या पातळ लोक तक,

ममता तेरी नियति…….

प्रेम में तपिश,

दया में करुणा, 

विछोह में बिरह,

यादों के समन्दर में

तेरी पतवार जिगर को खेती,

आश मिलन की जगाती,

धन्य ममता तेरा प्रताप,

तू नहीं होती

रेगिस्तान होता जीवन…..

 © सर्वाध सुरक्षित  .........बलबीर राणा “अडिग”

२२ जुलाई २०१३




शनिवार, 28 सितंबर 2013

मैं अभस्त हूँ



मैं अभस्त  हूँ ...........
कंटक भरी राहों में चलने का,
आमावास्य की रात में चमक देखने का,
रंगभरी हरी-भरी वादियों में,
विरह गीत गाने का,
मैं अभस्त  हूँ .........
तपती रेत में, नंगे पाँव चलने का,
बारह महीने शिशिर ऋतु में,
ठिठुरने का,
आंशुओं को, पलकों में रोकने का,
प्रेम का सरोवर जीवन में होकर भी,
प्यासा रहने का,
फिर भी!
तृप्त है  मन,
जिजीविषा की इन  कटंकी राहों पर,
लेकिन प्रिय?
तूने क्यों उठाया बीड़ा,
मेरे संग इस राह में सहचर्य निभाने का,
क्या ये मेरी प्रीत का कर्ज है,
या..............
जिगर पर प्रेम का मर्ज है,
चलो जो भी हो,
तेरे सानिंध्य ने मेरी अभस्त अडिगता,
को और अडिग बना दिया       
 ...........५ अगस्त २०१३
© सर्वाध सुरक्षित
बलबीर राणा “अडिग” 

गोपियों का सन्ताप



मन कवलित और क्षोभ सन्ताप,
विरह बेदना का करुण  बिलाप
प्रमाग्नि से ज्वलित तन,
यादों के दग्द दग्दित आज मन

जब जीवन के उषा काल में प्रेम का भोर था,
उमंग से यौवन का, थमता नहीं शोर था
उन यवनिकाओं के चंचल कलरव से,
गुंजित बृंदाबन का ओर- छोर था

कान्हा बांसुरी बजाते, रांस रचाते,
गोपियाँ क्या खग-मृग भी, मुग्द हो जाते
अथाह प्रेमवायु संग झूमती सबकी काया,
हर घडी, पल गुजरता त्योहारों वाला

अब क्षितिज पर प्रीत किरणों का अवसान है,
सूना पड़ा बृंदाबन वियोग व्यथा का गान है    
क्यों छोड़ गए मुरलीधर प्रेम चिंगारी तुम,
गुमसुम अग्नि जलन से जल रही हम

© सर्वाध सुरक्षित
.... बलबीर राणा “अडिग”