धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
शुक्रवार, 20 मई 2016
अडिग सन्देश
बुधवार, 23 मार्च 2016
कबिता में होली
बाशंती बयार चली चलो बहार निकलें
फागुन में बहार आयी चलो होली खेलें।
आओ उग्र तमस तम का दहन कर आएं
फिर सिरे से प्रेम की एक अलख जगाएं।
रंग दें अबीर गुलाल से एक दूजे का तन मन सारा
न रहे पहचान मेरी न रहे तेरा कोई कारा।
आओ ढ़ोल मृदंग की थाप पर ताल मिलाएं
एक गीत एक सुर बाँध गिले शिकवे भुलाएँ।
सत्य का सन्देश होली
प्रेम की बेल होली।
ख़ुशी का पैगाम होली
सुख का अंजाम होली।
एकता की डोर होली
उमंग भरी भोर होली।
सदैव होलीमय संसार रहे
सबके जीवन बहार रहे।
रचना:- बलबीर राणा अडिग
शनिवार, 13 फ़रवरी 2016
क्यों माटी की महक भाती नहीं
क्यों अब माटी की महक भाती नहीं
या भीड़ भरी गलन के बीच आती नहीं।
उस मिट्टी से निकली रवि रश्मि की आभा
क्यों अब भीनी ताप से भावविभोर करती नहीं।
सुहानी उषा की मंद-मंद बहती वयार
क्यों अब खुशनुमा लगती नहीं।
पल्लवियों बीच आँख मिचौली रवि किरणो की
क्यों अब आँखों को चौन्धयाती नहीं।
बन-घन बिरह बिलाप हिलांस की
क्यों अब जिगर को विह्वल करती नहीं।
चपल घसियारियों की खनक कानन में
क्यों अब दिल को रिझाती नहीं।
तोरण द्वार हर रोज सजे है मुड़ के देख देवसारी
उठा उतकण्ठा देहरी पग रखने की मत कर लाचारी।
ख़ुशियों की बगिया अभी भी खिली है माटी में
हर पाती में गिरी तुहिन कण मोती बनती माटी में
निसंकोच उड़ आ चढ़ती बदलियों संग मोती बनने को
बिना स्वाति नक्षत्र के मुँह खोल बैठी सीपीयां माटी में।
हिलांस = सुरीली कंठ वाली पहाड़ी पक्षी
घसियारियों = घास काटती जाती मृणालयों का दल
देवसारी = परदेसी रहने वाला
रचना :- बलबीर राणा 'अडिग'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
रविवार, 31 जनवरी 2016
लिख गीत नव चेतना का
रविवार, 17 जनवरी 2016
सैनिक की ख्वायिस
बैरी चाहे कितना भी बलशाली हो
तोपें चाहे उसकी कितनी भी हावी हो
बिजली की कड़क हो या बौछार हो
रेगिस्तान की आग बरसाती दुपहरी के अंगार हो
भारत पुत्र हूँ हर हाल से निपट के आऊंगा
तिरँगा लहरा के आऊंगा या तिरंगे में लिपट के आऊँगा।
बादल गरजे या सैलाब बहे
ये अडिग हिमालय पुत्र हिलेगा नहीं
हेड सूट करेगा, लक्ष्य से चुकेगा नहीं
कसम जो को खायी थी गीता पर हाथ रख कर
उस कसम को हर हाल में निभाता जाऊंगा
तिरंगा .............
दुश्मन के पग तेरी धरती पर नहीं रखने दूंगा
कोख सूनी हो सकती पर बदनाम न होने दूंगा
अपने भाई के लिए निशान मातृभक्ति का छोड़ जाऊंगा
जो आँख भारत विशाला पर उठेगी उसे फोड़ के आऊंगा
तिरंगा लहरा के आऊंगा या तिरंगा लिपट के आऊंगा।
चिता की आग में रोटी सेकने वालों की कमी नहीं
लेकिन मन मेरा भरमेगा नहीं है
कदम लड़खड़ा सकते पर रुकेंगे नहीं
क्योंकि राजगुरु विस्मिल का एक सुरी जय हिन्द मेरे कानो गूंजता है
नाम नमक निशान पर मिटना मेरा सैनिक धर्म मुझे सिखाता है।
आखरी सांस तक माटी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करना नहीं छोड़ूंगा
तिरंगा लहरा के आऊँगा या तिरंगे पर लिपट के आऊँगा।
© सर्वाधिकार सुरक्षित ।
प्रस्तुत रचना सच्चे सैनिक भावना पर मन के उदगार है काश भगवान् इस कर्तव्य पथ पर हमेशा चलने का अवसर दे
सैनिक उद्गीथ
शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
नयीं प्रभा नयी स्फूर्ति
फिर उग आया सूरज नयां बन तेरे लिए।
आँगन जगमगाने आयी नयीं रोशनी लिए,
नव उमंग से फिर लाल हुआ व्योम तेरे लिए।
नयें गीतों की नयीं तान, मोहनी गुंजन लिए
स्वागत में बैठी नव सुमन कली सिर्फ तेरे लिए।
नूतन वर्ष इन्तजार में खड़ा संग श्रम के लिए
नयीं सुगंध संग ताज़ी पुरवायी बह रही तेरे लिए।
सतकर्म समर्पण करें, एक नयें भारत के लिए
सुगम, शुभम-शुभ अडिग आह्वान तेरे लिए।


