शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

दिवाली


आशाएं टिमटिमाती रहे

अपेक्षाएं झिलमिलाती रहे  

दिप्यमान हो कर्म आभा आपकी

सफलता सदा फलातीत रहे।  


अपनो का प्यार पास हो 

जीवन पथ उज्जास हो  

खुशियों की फुलझड़ियाँ फूटे

यह दिपावली आपकी खास हो। 


@ बलबीर राणा अडिग

04 नवम्बर 2021

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

वीर वे



काष्ठ कर्मों से वीर विचलित नहीं होते,

लाख झंझावतों में वे धीरज नहीं खोते,

विघ्न वाधाओं को मिशन मूड़ रखकर,

शौर्य गंतव्य पर सदैव गतिमान रहते ।

 

शूल भरी राहों से तनिक ना घबराते,  

पग छालों में भी आह नहीं निकालते,

संकट में शोंणित और वेगवान रहता, 

अपनी विजय पर कभी नहीं इतराते ।

 

इस जग में वो कौन सी बाधा है,

जिसको वीरों ने नहीं साधा है,

बिपत्ति मूल को मिटाने का उनमें, 

मनसा वाचा कर्मणा से मादा है।

 

खड़े गिरी के पाँव उखड़ जाते हैं,

शूरों के कदम जहाँ बड़ जाते हैं,

प्रस्तर भी पानी बन जाता है तब,

जब वे आन बान शान से ठान जाते हैं ।


 

@ बलबीर राणा अडिग 

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

जिंदगी का सफर



 जिंदगी के सफर को 

आहिस्ता ही सही 

पूरा करने का जज्बा रखो

तेज रफ्तार वाले अक्सर 

ठोकर खाके गिर जाते हैं। 

@  बलबीर राणा 'अडिग' 

बुधवार, 8 सितंबर 2021

गजल : आत्महत्या



मत इतना भरने दो कि खुद फूट पड़ों,

एक मासूम सी चोट से ही टूट पड़ो।

 

भाई इतना खुदगर्ज तो नहीं है जीवन,

जो छोटी, अदनी सी बात पर रुठ पड़ो।

 

समस्या धर्ती की है निदान भी यहीं है,

जाने बिना ऐसे मत अनंत में कूद पड़ों।

 

जलजला संभालने वाले भतेरे हैं इर्द गिर्द,

मत खुद को असहाय समझ छूट पड़ो।

 

क्या गुजरेगी उन पर जिन्होने पाला,

उनकी आशाओं को यूँ ना सूट करो ।

 

तेरे जाने से जग खाली नहीं होने वाला,

पल्ला झाड मत अपनत्व को फूक चलो ।

 

आत्महत्या मुक्ति का मार्ग नहीं अडिग,

आत्मा की हद तक जीवन कूट चलो।

 

कूट - संर्घष से जीना

 

रचना : बलबीर राणा अडिग


 

शनिवार, 31 जुलाई 2021

गजल : साँसों के टेंडर

 

अचानक गाँवों में झिंगुर उड़़ने लगे हैं,
सायद कुछ दिन बाद चुनाव आने लगे हैं।
 
कल तक एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था
आज पुरवा पछुवा एक साथ बहने लगे हैं।
 
पाँच वर्ष तक दर्शन दुर्लभ थे जिन देवों के,
वे औचक दर्शनार्थ घरों मे भटकने लगे हैं।
 
फ्री से पहले ही कर्म शक्ति नेस्तानबूद है,
और फ्री से रहा-सहा जमीजोद होने लगे हैं।
 
पिंजरे में मांस दे दहाड़ बंद कर-करके,
जंगल के शेर शिकार करना भूलने लगे हैं।
 
बल, कुछ मत करो धरो, हम तुम्हें पालेंगे,
याचक बना उग्रता पर उतारने लगे हैं।
 
वोट के लिए समझ नहीं साँसें चाहिए अडिग,   
इस लिए फिर साँसों के टेंडर पड़ने लगे हैं।
 
 
रचना : बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’

रविवार, 25 जुलाई 2021

पहली गुरु

 


 


नहीं आती थी उसे
गिनती पहाड़ा
पर !
उसने जिन्दगी के हिसाब किताब में
कभी गलती नहीं की ।
 
दिलों को जोड़ना,
बैरीपन घटाना,
दुनियां की रीति नीति का भागफल
और रिस्तों का गुणांक
वह भली भांति जानती थी। 
 
आता था उसे
संसार का रेखागणित ज्यामिति,
उसके त्रिकोणमिती में कोण
हमेशा समकोण रहते थे।
 
मनुष्यता का परिमेय अपरिमेय
कंठस्त था उसको,
गिरस्थी वाणिज्य की तो वो 
मजी हुई वाणिज्यकार थी। 
 
भले
अ, ब, स उसे काला अक्षर 
भैंस बराबर क्यों ना रहा हो 
पर ! उसने
ना कभी गलत गढ़ा,
ना गलत पढ़ा, ना ही पढ़ाया ।
 
उसके शब्दों में
अशुद्धि नहीं होती थी
ना ही व्याकरण में त्रुटि,
क्योंकि भाषा उसके 
पय से निकलती थी ।
उसके
नेह के गीत कविता
होने खाने के छन्द
व्यवहार के मुक्तक
जीवन पथ पर
दिशा र्निदेशित करती हैं।
 
जिन्दगी के हर मोड़ पर
सहारा बनती है
उसकी सुनाई कथा कहानियां।
 
ठोकरों से बचाती हैं
वे एकांकी नाटक
जिसमें वो स्वयं किरदारा रही हो
या मंचन उसके करीब मंचित हुआ हो।   
 
मनसा वाचा कर्मणा से
अडिग रहने का बल देती हैं
पुरखों की जीवनियां, यात्रा वृतान्त
जिसे वह काला टीका लगाते वक्त
मुझे बताया करती थी।
 
कंडाली से चतौड़*
और
मुठ्ठियों से कूटते
अच्छी तरह समझाई थी उसने मुझे
हमारी रीति-रिवाज, देव-धर्म, 
संस्कृति-संस्कार, भलाई बुराई । 
 
उसके अर्थ व्यर्थ नहीं होते थे
समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र
सभी जीवन शास्त्रों की जानकार थी 
मेरी पहली गुरु, शिक्षिका
मेरी माँ लीला देवी राणा।
 
*
कंडाली - बिच्छू घास
चतौड़ -  सेकना / पीटना
 
गुरु पूर्णिमा पर अपनी पहली गुरु माता और सभी गुरुओं को सर्मपित।
 
रचना : बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’


 

शनिवार, 26 जून 2021

गजल



मेरे मुल्क के लोग आहिस्ता बदलने लगे हैं
जब से वे घर छोड़ मकानों में रहने लगे हैं। 

घर, धाम था, देवस्थान था जहाँ प्रीत बसती थी
मकानों में रुतवा रुस्तम दर्प ठहरने लगे हैं। 

थालियों से कोर लेनदेन का अप्रमेय नेह था घर में
मकानो की मेजों पर कोर एकला अकेले होने लगे हैं। 

घर में गरीबी चिंथड़ों में फुदकती थी, लाज पर
मकानो में अमीरी के लिबास कम होने लगे हैं।

हर्ष विसाद मिल बैठ बाँटता था परिवार घर में 
अब पृथक कमरों में रिश्ते तन्हा सिकुड़ने लगे हैं। 

दूर धार घरों से धै धवाड़ी अपनापन भटयाती थी वहाँ
यहाँ सटे मकान के बंद दरवाजे फुसफुसाने लगे हैं। 

घरों की दीवारों पर देवता मैले ही मुश्कराते दिखते थे
मकानों की कोठरी में चमकते हुए भी मौन रहने लगे हैं ।

जब घर था तब डर था, मान, मर्यादा थी अडिग
अब मकानों में बर्ताव बेलगाम बेधड़क होने लगे हैं।

धै धवाड़ी - आवाज देना
भटयाती - जोर जोर से बोलना
 
@ बलबीर राणा ‘अडिग’