आशाएं टिमटिमाती रहे
अपेक्षाएं झिलमिलाती रहे
दिप्यमान हो कर्म आभा आपकी
सफलता सदा फलातीत रहे।
अपनो का प्यार पास हो
जीवन पथ उज्जास हो
खुशियों की फुलझड़ियाँ फूटे
यह दिपावली आपकी खास हो।
@ बलबीर राणा अडिग
04 नवम्बर 2021
धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
आशाएं टिमटिमाती रहे
अपेक्षाएं झिलमिलाती रहे
दिप्यमान हो कर्म आभा आपकी
सफलता सदा फलातीत रहे।
अपनो का प्यार पास हो
जीवन पथ उज्जास हो
खुशियों की फुलझड़ियाँ फूटे
यह दिपावली आपकी खास हो।
@ बलबीर राणा अडिग
04 नवम्बर 2021
काष्ठ कर्मों से वीर विचलित नहीं होते,
लाख झंझावतों में वे धीरज नहीं खोते,
विघ्न वाधाओं को मिशन मूड़ रखकर,
शौर्य गंतव्य पर सदैव गतिमान रहते ।
शूल भरी राहों से तनिक ना घबराते,
पग छालों में भी आह नहीं निकालते,
संकट में शोंणित और वेगवान रहता,
अपनी विजय पर कभी नहीं इतराते ।
इस जग में वो कौन सी बाधा है,
जिसको वीरों ने नहीं साधा है,
बिपत्ति मूल को मिटाने का उनमें,
मनसा वाचा कर्मणा से मादा है।
खड़े गिरी के पाँव उखड़ जाते हैं,
शूरों के कदम जहाँ बड़ जाते हैं,
प्रस्तर भी पानी बन जाता है तब,
जब वे आन बान शान से ठान जाते हैं ।
जिंदगी के सफर को
आहिस्ता ही सही
पूरा करने का जज्बा रखो
तेज रफ्तार वाले अक्सर
ठोकर खाके गिर जाते हैं।
मत
इतना भरने दो कि खुद फूट पड़ों,
एक
मासूम सी चोट से ही टूट पड़ो।
भाई
इतना खुदगर्ज तो नहीं है जीवन,
जो
छोटी, अदनी सी बात पर रुठ पड़ो।
समस्या
धर्ती की है निदान भी यहीं है,
जाने
बिना ऐसे मत अनंत में कूद पड़ों।
जलजला
संभालने वाले भतेरे हैं इर्द गिर्द,
मत
खुद को असहाय समझ छूट पड़ो।
क्या
गुजरेगी उन पर जिन्होने पाला,
उनकी
आशाओं को यूँ ना सूट करो ।
तेरे
जाने से जग खाली नहीं होने वाला,
पल्ला
झाड मत अपनत्व को फूक चलो ।
आत्महत्या
मुक्ति का मार्ग नहीं अडिग,
आत्मा
की हद तक जीवन कूट चलो।
कूट
- संर्घष से जीना
रचना
: बलबीर राणा अडिग
नहीं
आती थी उसे
गिनती
पहाड़ा
पर
!
उसने
जिन्दगी के हिसाब किताब में
कभी
गलती नहीं की ।
बैरीपन
घटाना,
दुनियां
की रीति नीति का भागफल
और
रिस्तों का गुणांक
वह
भली भांति जानती थी।
संसार
का रेखागणित ज्यामिति,
उसके
त्रिकोणमिती में कोण
हमेशा
समकोण रहते थे।
कंठस्त
था उसको,
गिरस्थी
वाणिज्य की तो वो
मजी
हुई वाणिज्यकार थी।
अ,
ब, स उसे काला अक्षर
भैंस
बराबर क्यों ना रहा हो
पर
! उसने
ना
कभी गलत गढ़ा,
ना
गलत पढ़ा, ना ही पढ़ाया ।
अशुद्धि
नहीं होती थी
ना
ही व्याकरण में त्रुटि,
क्योंकि
भाषा उसके
पय
से निकलती थी ।
उसके
नेह
के गीत कविता
होने
खाने के छन्द
व्यवहार
के मुक्तक
जीवन
पथ पर
दिशा
र्निदेशित करती हैं।
सहारा
बनती है
उसकी
सुनाई कथा कहानियां।
ठोकरों
से बचाती हैं
वे
एकांकी नाटक
जिसमें
वो स्वयं किरदारा रही हो
या
मंचन उसके करीब मंचित हुआ हो।
मनसा
वाचा कर्मणा से
अडिग
रहने का बल देती हैं
पुरखों
की जीवनियां, यात्रा वृतान्त
जिसे
वह काला टीका लगाते वक्त
मुझे
बताया करती थी।
और
मुठ्ठियों
से कूटते
अच्छी
तरह समझाई थी उसने मुझे
हमारी
रीति-रिवाज, देव-धर्म,
संस्कृति-संस्कार,
भलाई बुराई ।
समाजशास्त्र,
धर्मशास्त्र
सभी
जीवन शास्त्रों की जानकार थी
मेरी
पहली गुरु, शिक्षिका
मेरी
माँ लीला देवी राणा।
*
कंडाली - बिच्छू घास
चतौड़ - सेकना / पीटना