गुरुवार, 23 अगस्त 2012

भावनात्मक अत्याचार


आज  हमारा मेडिकल क्षेत्र लगातार ऊचाइयां छूता जा रहा है जहॉ मेडिकल साइंन्स की आधूनिकता ने आज असाध्य से असाध्य रोगों को साध्य बना दिया वहीं इस क्षेत्र में आम जन पर हो रहे  भावनात्मक अत्याचारों को झुटलाया  नहीं जा सकता। इसे प्रत्यक्ष , अप्रत्यक्ष रूप से सभी महसूस कर सकते  है। माफ करना जो लोग  इस प्रोफिशन  से हैं जुडे है वे इस बात  को अन्यत्र लें क्यों की मामला भावनाओं का है वो तो प्रकट  होंगी ही !!! फिर सभी एक ही श्रेणी में भी तो नहीं आते  ??

कहां जाऊं ?
किसके पास जाऊं?
चरों तरफ होडिंग टंगी,
बडे बडे इस्तिहार छपे,
डिग्रियों से भरा बोर्ड,
पहले आओ , पहले इलाज पाओ,
बिना चीर फाड के ऑप्रेशन कराओ,
डिस्काउन्ट पाओ लिमिटेड टाइम,
लाइन लगाने से निजात लगाओ,
घर बैठे फोन सेे अप्वाइटमेंट पाओ,
पर्ची कटाओ और मोटा परामर्श शुल्क जमा कराओ,
बिलम्ब मत करो ?
जल्दी ये टेस्ट कराओ, पूरी इन्वेस्टिगेशन  होगी,
अच्चा पैंसा लगाओ,
बेहतर इलाज़ कराओ
जैसे भी हो सहाब......  भला कर दो
पैंसे का बन्दोवस्त कर दूगां,
यार - रिश्तेदार  से मांगूंगा,
कहीं से कर्जा निकालूगा, जड जमीन बेच दूंगा,
फीस पूीर करूंगा,
मर्ज छोटा ही क्यो ना हो !! 
सारे टेस्ट और इन्वेस्टीगेशन  कराऊॅगा
दिन -दिन, हप्ते, महीने चक्कर कटता रहूँगा
बाद में रैफर हो जाऊंगा  
कुछ ना कहूँगा  
क्यों कहूँगा क्यों कहूॅगा ?
जिन्दगी का सवाल जो है!!!!
भगवान से कहूॅगा कुछ अनर्थ हो जायेगा।
क्या करें ?....डॉक्टर सहाब,.भगवान का रूप होंते है ।
क्योकि भगवान, भावनाओं को ज्यादा समझते हैं ।
अत्याचारी !!  नहीं नहीं !!!
भगवान !!! और अत्याचार ? 
भगवान अत्याचार नहीं  करते 
अत्यचार का नाश करते है ।
थोडा.... थोडा..... भावनाओ का करते हैं.........अत्याचार 
भावनाओं का अत्याचार !!!!!! इतना चलेगा
भावनाओ क्या है आती जाती रहती हैं।
मरने से तो ठीक है।
........... बलबीर राणा "भैजी"
२३ अगस्त २०१२ 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

५२ अक्षरों की मैं, बिखरी माला




अ  से ज्ञ तक
५२  अक्षरों की मैं, बिखरी माला
एक दूजे का ना रूप मेरा
न स्वरूप।

अकेला ३६   व्यंजनों   में भी स्वादहीन,
१६ स्वरों के भी बेसुरा।

अप्रेम में ३६   का आंकडा,
प्रेम में ६३  का योग।

नेकमें के पदार्पण से अनेकहो जाऊं,
एकमें के बधन से एकतामें रहूँ 

गतकी से गीतमैं गाऊं,
मतकी से मीतबन जाऊं।

ना जाने कितने युग्मों के
सद विचार एभावनाओं और अनुभुतियों से 
जीवन को सजाता आया।

इसका बिपरीत भी उतना ही सत्य।

मुझे जजने वालो
आज तुम्हें क्या हो रहा,

क्यों ? “परमें को मिला कर परायेबनते,
 “बरीके साथ ऐ" जोड कर बैरीबनते।

शक्तमें गुंथों शक्तिबन जाऊं,
एकतासे ताके बिखरने से एकही रह जाऊं।

 सन्देश  मेरा सुनते जाओ,
एकतासे ताना हटाओ। 

अनेकता में एकता के 
अपने शुत्र में  फिर बंधते जाओ।

बलबीर राणा "भैजी" 
२१ अगस्त १०१२ 


सोमवार, 20 अगस्त 2012

बेल की दासतां



किशोरवय  जीवन का वह  समयांतराल है , जिसे सही मार्गदर्शक  और एक  मजबूत   सहारे की जरुरत होती  है । इसी किशोरवय में रखी गयी भविष्य की नीव आदर्श और सम्पूर्ण जीवन रुपी भवन को खड़ा करता है, अगर समय पर सहारा / पथप्रदर्शक न मिला तो जीवन की दासतां बिना सहारे की बेल के जैसे बन के  रह जाती है । इसी मर्म का पंक्तिबद्ध संघर्ष कुछ इस प्रकार उधृत करने की कोशिश।  

मैं बेल,  बिना सहारे के 
जमीं पर रेंगता मेरा जीवन
कोई लांघता,  कोई कुचलता
किसी की  सहानुभूति
एक ओर कर देती
बजूद अपना बचाने को 
सहारे के लिए हाथ बढाती रही।
सहचर्य की चाह में 
जमी पर सरकती गयी।
आया यौवन एक से दो, दो से चार
शाखाऐं मेरी बढती गयी। 
चरों ओर रेंग - रेंग कर
एक घेरा बना डाला।
वो घेरा ! एक जाल बन गया
घरोंदा मेरा, कीट पतंगों की पनाह,
भुजगों की आरामगाह
बनके रह गया।
निचे के जीवन को
मारती  गयी।
किसी को न उगने, न पनपने दिया
मैं हत्यारिन बनती गयी।
पत्ते मेरे सूखते रहे, गलते गए।
अभागे यौवन ने फूल उगाये
कुछ सन्तति के लिए लडते रहे,
कुछ दुनियां के दमन में
दम तोडते गए।
इस नारकीय जीवन में
फल मेरे सडते रहे
कीड़ों का निवाला बनते गए। 
और किसी के काम न आये
जीवन भर,
आशमान की ओर  देखती  रही
ऊंचाईयों को ताकती रही।
सुदृड सहारे की चाह में
जीवन काटती रही।
मेरे भी ये अरमानो थे
लताएँ मेरी,
ऊँची डाली पर लटकती
मस्ती करती और  
फल मेरे लटकते झूमते
राहगीर को ललचाते।
मैं अकड़ से कहती  
अधिकार उसी का मुझ पर,
जिसने जीवन संवारा मेरा
लेकिन ?
मेरे अरमान अरमान ही रहे।
अब बृद्धा अवस्था ........
पत्ते साथ छोड गये
बिना आवरण के,
नंगी लताओं के साथ
निडाल ........ असहाय।

रचना :- बलबीर राणा "भैजि"



बेल की दासतां



किशोरवय  जीवन का वह  समयांतराल है , जिसे सही मार्गदर्शक  और एक  मजबूत   सहारे की जरुरत होती  है । इसी किशोरवय में रखी गयी भविष्य की नीव आदर्श और सम्पूर्ण जीवन रुपी भवन को खड़ा करता है, अगर समय पर सहारा / पथप्रदर्शक न मिला तो जीवन की दासतां बिना सहारे की बेल के जैसे बन के  रह जाती है । इसी मर्म का पंक्तिबद्ध संघर्ष कुछ इस प्रकार उधृत करने की कोशिश।  

मैं बेल,  बिना सहारे के 
जमीं पर रेंगता मेरा जीवन
कोई लांघता,  कोई कुचलता
किसी की  सहानुभूति
एक ओर कर देती
बजूद अपना बचाने को 
सहारे के लिए हाथ बढाती रही।
सहचर्य की चाह में 
जमी पर सरकती गयी।
आया यौवन एक से दो, दो से चार
शाखाऐं मेरी बढती गयी। 
चरों ओर रेंग - रेंग कर
एक घेरा बना डाला।
वो घेरा ! एक जाल बन गया
घरोंदा मेरा, कीट पतंगों की पनाह,
भुजगों की आरामगाह
बनके रह गया।
निचे के जीवन को
मारती  गयी।
किसी को न उगने, न पनपने दिया
मैं हत्यारिन बनती गयी।
पत्ते मेरे सूखते रहे, गलते गए।
अभागे यौवन ने फूल उगाये
कुछ सन्तति के लिए लडते रहे,
कुछ दुनियां के दमन में
दम तोडते गए।
इस नारकीय जीवन में
फल मेरे सडते रहे
कीड़ों का निवाला बनते गए। 
और किसी के काम न आये
जीवन भर,
आशमान की ओर  देखती  रही
ऊंचाईयों को ताकती रही।
सुदृड सहारे की चाह में
जीवन काटती रही।
मेरे भी ये अरमानो थे
लताएँ मेरी,
ऊँची डाली पर लटकती
मस्ती करती और  
फल मेरे लटकते झूमते
राहगीर को ललचाते।
मैं अकड़ से कहती  
अधिकार उसी का मुझ पर,
जिसने जीवन संवारा मेरा
लेकिन ?
मेरे अरमान अरमान ही रहे।
अब बृद्धा अवस्था ........
पत्ते साथ छोड गये
बिना आवरण के,
नंगी लताओं के साथ
निडाल ........ असहाय।

रचना :- बलबीर राणा "भैजि"