गुरुवार, 28 नवंबर 2019

विनय गीत



मन से अर्पण दिल से समर्पण
एक ही सीरत सूरत का दर्पण
ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन

समझ की पटरी सामर्थ्य की गाड़ी
चलेंगे संग संग, न अगाड़ी पिछाड़ी
हंसते गाते पथ पूरा करेंगे
प्रेम गंतव्य पर चला करेंगे
तज देंगे उस दुनियां को
जहाँ होता हो भावनाओं का मर्दन

ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन

जब चुभे जो कंटक तेरे पग में
तब दर्द उभरे मेरे पगों  में
कारा चुभे जब आँखों में मेरी
अश्क बहे तब नैनों से तेरी
प्रीत रश्मि से अंतस उजियारा हो
हो तपिस उच्छवासों का समर्थन

ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन


लिखेंगे परिणय का हर एक पन्ना
अधूरी न रहे कामायनी तमन्ना
सींचेंगे गृहस्थ की, कुसुम क्यारी
बनकर मैं घन, तु पावस न्यारी
जीवन गोधूलि बेला तक
प्रेम वन्धन की संभाल संवर्धन

ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन ।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

शनिवार, 16 नवंबर 2019

--||---एक अंतर्द्वंद---||--


ओ चिन्मय प्रकृति
अपने बहकावे में ले ले
ताकि अकेले दौड़ता रहूँ
कभी खुद से ही आगे
कभी खुद से ही पीछे
स्वयं से प्रथम और अंतिम
अकेला जीतूँगा
अकेले से ही हारूँगा
ना कोई प्रतिस्पर्धा
नहीं किसी का प्रतिरोध
प्रतिभागी, प्रतियोगी होने का
भय संशय कुछ नहीं
जय विजय का द्वंद नहीं
चेतना में एक नाद निकले
अनहद गरजै और
जीवन तेरे चिन्मय के साथ
चिरकाल वासी हो जाय
लेकिन क्या मेरे अंतर्द्वंद यह
सम्भव है?

@ बलबीर राणा 'अड़िग'


मंगलवार, 12 नवंबर 2019

रक्षा का ध्रुव प्रमाण




जय के लिए जीवन देते हैं
विजय के लिए देते हैं प्राण
प्राण को प्रण सम्मुख रखने वाले
राष्ट्र रक्षा के हैं ध्रुव प्रमाण
धन्य है, वह माता जिसने जने पूत महान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

मृत्यु का कोई भय नहीं है
खपने का संशय नहीं है
बुझने का डर नहीं सताता
अगर मगर मन में नहीं आता
चिराग ये वेखौप जलते हैं
बर्फ पावश हो या तूफान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

न कभी माया ने रिझाया
न कभी ममता ने डिगाया
बहने न दिया अश्कों से पानी
बिकल न होने दी तरुण जवानी
कर्मवेदी पर निर्भीक अड़िग ये
निःसंकोच निकलते हथेली रखके जान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

कराल कष्टों को साध्य वे करते
भू विविधता को वाध्य वे करते
त्याग तप सब विवश हो जाते
वियोग वैराग्य नतमस्तक हो जाते
क्षोभ ग्लानि जिनके निकट न फटके
मांगा है मिट्टी से, मृन्तुंजय वरदान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

कृतज्ञ हैं उस मनोबल का
शस्त्र से सशक्त आत्मबल का
होके जिजीविषा के हजार विकार
कभी न किया कर्तव्यपथ का प्रतिकार
अर्पण समर्पण को, नमन है वीरो
तुम्ही ही हो हर कठिन कष्टों का निधान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

रविवार, 3 नवंबर 2019

असली मोगली



कार्टून का मोगली नहीं
असली जीवन का मोगली है
गाँवों का बचपन
चेहरों पर हंसी ही नहीं
अंदर से भी ठहाका है
निर्भीक अभयारण्य
प्रकृति वैभव में
कूदते हैं फांदते है
छलांगे लगाते है
क्योंकि ये अभी
विकास की जद में
नहीं आये
जद में आते ही
बन जाएंगे ये भी
बस्तों के नीचे दबे
रिमोट से उछलने
वाले बेबी।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

आकुल गीत


जब वीरानी की आकुलता  
लगाती है धाद मुझे
कुछ सपने बुनके कुछ अपनेपन से 
कर लेती हूँ याद तुम्हें 

ये कच्चे रस्ते पगडंडियां
अब खुद ही दूरीयां नाप रही
खड़ी चढ़ाई ढलती उतराई 
अब खुद ही खुद में हाँप रही 

कैसी गति से गति मिलाकर
सबने जाने की ठानी है
एकाकीपन से बुढ़ा गयी ये
युगों की तरुण जवानी है

मुखर मौन के सुख से है या
विषम परिस्थिति का विषाद मुझे 
देवथानों की दशा दिशा देख
आ जाती है याद मुझे

देख योगनियों की कलित कलायें 
अगम पथों पर, तुरंग मर्त्य यहाँ
विटप सघन से लड़ती वनितायें 
और, जूझते जरठों का सामर्थ्य यहाँ

नहीं दिखेगी बंन्द कमरों से
घुमड़ती घटायें चौमास की
ईंटों के सघन से कैसे दिखेंगी
चपल छटाएं मधुमास की 

यह ममता का मर्म है या  
प्रेम का अवसाद मुझे
इस चमन का सूनापन देख 
कर लेती हूँ याद तुम्हें

बांध गठरी निःसंकोच चले आना
माँ माटी की सुगंध लेने को
एक अपनापन ही बचा के रखा है
और कुछ नहीं है देने को 

खातिरदारी को कोई नहीं है
सब अपने रस्ते निकल लिए
सैलानी बनकर मत आना लाड़ा
समय नहीं किसी को किसी के लिए

तुम्हारे जलड़े इस कोख से जन्मे
कोख प्रीत का प्रमाद मुझे
उन जलड़ों के कारुण्य कलरव से
आ जाती है याद मुझे

उतराई में इतनी समृद्धि दिखी 
या सामर्थ्य को सुगम लगा
शहरों ने क्या कृश किया जो
फिर चढ़ना इतना दुर्गम लगा 

देखा है इस मिट्टी में मैंने
मिट जाने वाला नेह यहाँ
कराल कष्ठों के तपन में हँसती
दमकती कंचन देह यहाँ

मरु बांझ नहीं संततिवती हूँ
है जननी का अहसास मुझे
भरे वक्षों से छलकता पय 
दिलाता ममत्व की याद मुझे

कब तक विरह अट्टहास करेगी
इस अक्षुण अभिलाषा पर
क्यों संयम को संशय हो रहा है
तनमय तंद्रा आशा पर

क्या गुनाह किया जगदीश्वर ने 
मेरी उपत्यकाओं की रचना कर 
समझ से परे क्यों मतिमान मनुज
क्यों दुत्कार रहे हैं भर्त्सना कर

कल्पों से कितने आये और गए
नहीं तुमसे फरियाद मुझे 
अपनी नहीं तुम्हारी पीड़ा से
आ जाती है याद मुझे। 

धाद = आवाज लगाना
जलड़े = जड़ें 
लाड़ा = लाडला

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2019

प्रकृति वैभव


नीला अम्बर आँचल ओढ़े
प्रकृति का यह मंजुल रूप
रात्री चंदा की शीतल छाया
दिवा दिवाकर गुनगुनी धूप

जड़ जंगल  पादपों  का  वैभव
जीवनदायनी सदानिरायें निर्मल
तन हरीतिमा  चिंकुर  प्राणवायु
पय पल्लवित जीव अति दुर्लभ

आँगन सतरंगी कुसुम वाटिकायें
गोद  पशु  विहगों   का  विहार
लहलहाती अनाज की  बालियां
क्षुधा    मिटाता   समग्र   संसार

तेरे इस अनुपम वैभव में भी
दुःखी हो अगर कोई इन्शान
कर्महीन मतिहीन  ही  होगा
जो न समझा   तेरा  विधान ।

@ बलबीर राणा 'अड़िग',

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

सकून



उस बस्ती बस्ती में
सकून को हँसते देखा
जहाँ कच्चे ठिकानों में
पक्के ठौर थे
बेचैनी के अट्टाहास ने
सहमा दिया वहां
जहाँ  रात
चमचमाती झालरों में नाच रही थी। 

@ बलबीर राणा 'अडिग'