बुधवार, 8 दिसंबर 2021

श्रद्धा की पाती




राष्ट्र का सरताज गया है

उत्तराखंड का लाल गया है

गम बहुत है जाने का पर !

प्रेणा का साज नहीं गया है। 


शोक में गमगीन जरूर हैं

कुछ असहाय जरूर हैं 

झुकने नहीं देंगे भारत पताका

आपके सारथी हम मगरूर हैं। 


नमन है वीर तेरे प्रारब्ध को

नमन है तेरी कर्म पाती को

लाखों जो वीर खड़े किए तूने

प्रज्वलित रखेंगे भारत माटी को।


@ बलबीर राणा ‘अडिग’


गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

यादों की तह

छोड़ आया हूँ 
कुछ पहले  ब्रह्मपुत्र का तीर
1.
वैशाख में सजता है
ब्रह्मपुत्र का तीर,
मेखला चादर में कसी बिहू निर्तकांऐं 
थिरकती हैं ढोल की थाप पर
रंगमत हो जाती मौसमी गीत पर
प्रियतम का प्रणय निवेदन
नर्तकी का शर्माना,  बलखाना
ना-नुकर कर छिटक जान, 
प्रियतम का कपौ फूल से
जूड़े को सजाना, 
बिहू बाला का मोहित होना
परिणय को स्वीकारना 
प्रियतम को अंक लगाना 
अमलतास के फूलों का
स्वागत में झड़ना
ढोल की थाप का सहम जाना
दोनो ओर की पहाड़ियों का
आलिंगन के लिए मचलना
कितना आत्मीय 
जिजीविषा से जीवन ऊपर। 
और 
बह्मपुत्र की विशाल  जलधारा ? 
लज्जित हो जाती है 
कि 
कभी मेरा भी  अपने प्रियतम 
अहोम से ऐसा ही परिणय मिलन था।  
2.
सुहानी संध्या
नजर के आखरी छोर तक
ब्रह्मपुत्र का फैलाव
मांझी भूपेन दा के गीतों को
गुनगुनाते हुए पतवार चलता,
देश से आये यायावरों को वह सारंग ब्रह्मपुत्र का दिग दर्शन कराता
शहर की बिजलियों की झालर
ब्रह्मपुत्र की जलधारा में 
टिमटिमाती बतियाती
और
नाव आहिस्ता किनारे ओर सरकती। 
3.
कहर बन जाता है सावन
डूब जाता बह्मपुत्र का रंगमत तीर
सहम जाता है जीवन
लील जाता है बांस की झोपड़ियों को
जिनमें सजती हैं बिहू बालाएं। 
मांझी की पतवार किनारे में भयभीत रहती। 
ब्रह्मपुत्र के इस विकराल का
जीवन ध्वस्त करना
जीवन का फिर संभलना संवरना
तीरों को गुलजार होना
सदियों से सतत जारी है। 
@ बलबीर राणा 'अड़िग'

शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

दिवाली


आशाएं टिमटिमाती रहे

अपेक्षाएं झिलमिलाती रहे  

दिप्यमान हो कर्म आभा आपकी

सफलता सदा फलातीत रहे।  


अपनो का प्यार पास हो 

जीवन पथ उज्जास हो  

खुशियों की फुलझड़ियाँ फूटे

यह दिपावली आपकी खास हो। 


@ बलबीर राणा अडिग

04 नवम्बर 2021

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

वीर वे



काष्ठ कर्मों से वीर विचलित नहीं होते,

लाख झंझावतों में वे धीरज नहीं खोते,

विघ्न वाधाओं को मिशन मूड़ रखकर,

शौर्य गंतव्य पर सदैव गतिमान रहते ।

 

शूल भरी राहों से तनिक ना घबराते,  

पग छालों में भी आह नहीं निकालते,

संकट में शोंणित और वेगवान रहता, 

अपनी विजय पर कभी नहीं इतराते ।

 

इस जग में वो कौन सी बाधा है,

जिसको वीरों ने नहीं साधा है,

बिपत्ति मूल को मिटाने का उनमें, 

मनसा वाचा कर्मणा से मादा है।

 

खड़े गिरी के पाँव उखड़ जाते हैं,

शूरों के कदम जहाँ बड़ जाते हैं,

प्रस्तर भी पानी बन जाता है तब,

जब वे आन बान शान से ठान जाते हैं ।


 

@ बलबीर राणा अडिग 

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

जिंदगी का सफर



 जिंदगी के सफर को 

आहिस्ता ही सही 

पूरा करने का जज्बा रखो

तेज रफ्तार वाले अक्सर 

ठोकर खाके गिर जाते हैं। 

@  बलबीर राणा 'अडिग' 

बुधवार, 8 सितंबर 2021

गजल : आत्महत्या



मत इतना भरने दो कि खुद फूट पड़ों,

एक मासूम सी चोट से ही टूट पड़ो।

 

भाई इतना खुदगर्ज तो नहीं है जीवन,

जो छोटी, अदनी सी बात पर रुठ पड़ो।

 

समस्या धर्ती की है निदान भी यहीं है,

जाने बिना ऐसे मत अनंत में कूद पड़ों।

 

जलजला संभालने वाले भतेरे हैं इर्द गिर्द,

मत खुद को असहाय समझ छूट पड़ो।

 

क्या गुजरेगी उन पर जिन्होने पाला,

उनकी आशाओं को यूँ ना सूट करो ।

 

तेरे जाने से जग खाली नहीं होने वाला,

पल्ला झाड मत अपनत्व को फूक चलो ।

 

आत्महत्या मुक्ति का मार्ग नहीं अडिग,

आत्मा की हद तक जीवन कूट चलो।

 

कूट - संर्घष से जीना

 

रचना : बलबीर राणा अडिग


 

शनिवार, 31 जुलाई 2021

गजल : साँसों के टेंडर

 

अचानक गाँवों में झिंगुर उड़़ने लगे हैं,
सायद कुछ दिन बाद चुनाव आने लगे हैं।
 
कल तक एक पत्ता तक नहीं हिल रहा था
आज पुरवा पछुवा एक साथ बहने लगे हैं।
 
पाँच वर्ष तक दर्शन दुर्लभ थे जिन देवों के,
वे औचक दर्शनार्थ घरों मे भटकने लगे हैं।
 
फ्री से पहले ही कर्म शक्ति नेस्तानबूद है,
और फ्री से रहा-सहा जमीजोद होने लगे हैं।
 
पिंजरे में मांस दे दहाड़ बंद कर-करके,
जंगल के शेर शिकार करना भूलने लगे हैं।
 
बल, कुछ मत करो धरो, हम तुम्हें पालेंगे,
याचक बना उग्रता पर उतारने लगे हैं।
 
वोट के लिए समझ नहीं साँसें चाहिए अडिग,   
इस लिए फिर साँसों के टेंडर पड़ने लगे हैं।
 
 
रचना : बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’