शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

महासू देवता

 


नियति को फलित और बदनियति को दण्डित करते हैं महासू महाराज


महासू महाराज मात्र धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि अनुशासित जीवन जीने की परम्परा है, महाराज एक बड़े क्षेत्र वासिंदों की आत्मचेतना की तह तक विराजमान हैं एवं आस्था, विश्वास व सद जीवन प्रेणा के सर्वेसर्वा हैं। उत्तराखण्ड के जौनसार बावर, बंगाण, रवांई, जौनपुर व हिमाचल में सिरमौर, सोलन, शिमला बिशैहर तक महासू महाराज की पूजा होती है। महासू देवता दो प्रदेशों के मध्य लोक विश्वास, सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक एकता के प्रतीक के साथ क्षेत्र के अधिष्ठाता, रक्षक और न्यायकर्ता के रूप ख्यात-प्रख्यात हैं।  परम लोक विश्वास है कि महाराज का न्याय सद निष्ठा नियति के लिए पूर्ण फलित और कुनिष्ठा बद नियति के लिए यकीनन दंडित-खण्डित करने वाला वाला होता है।  
महाराज के देवस्थानों की यात्रा व जनश्रुतियों से साकार होने के बाद पूर्ण निष्ठा के साथ महासू देव परम्परा को विस्तार व बिंदुवार लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ फिर भी कहीं त्रुटि रह गई होगी तो भगवान महासू से क्षमा प्रार्थी हूँ और पाठकों से सुधार की अपेक्षा करता हूँ।
चार भाई महासू:-
बोठा, बासिक, पवासी और चालदा चार भाई महासू महाराज। महासू न्याय के देवता के नाम से प्रसिद्ध हैं जिनका प्रतिष्ठान उत्तराखंड व हिमाचल दो राज्यों के सीमांत क्षेत्र जौनसार बावर के हनोल व आसपास स्थिति है। महासू दोनों राज्यों के लोक संस्कृति का साझा देवालय है। महासू शब्द की उत्पत्ति महाशिव से मानी जाती है यानि भगवान शिव इस क्षेत्र में महासू के रूप में विराजमान हैं। हनोल में बोठा महाराज, हनोल से आगे नजदीक टौंस नदी पार ठडियार गांव में पवासी महाराज, हनोल से पहले मैन्द्रथ में बासिक महाराज रहते हैं व चालदा महाराज पूरे अधिकार क्षेत्र में चल देवता के रूप में जन रक्षा के लिए भ्रमण करते हैं, चालदा महाराज का भ्रमण ब्यौरा आगे दिया गया है।   
देहरादून जनपद के जौनसार‑बावर क्षेत्र में टौंस नदी के किनारे समुद्रतल से लगभग 1250 मीटर की ऊँचाई पर बसे हनोल गाँव में महासू महाराज का प्राचीन मंदिर स्थित है। देहरादून से महासू देवता के मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन सड़क मार्ग हैं। पहला 188 किमी लंबा मार्ग देहरादून, विकासनगर, चकराता व त्यूणी होते हुए हनोल तक जाता है। दूसरा 175 किमी देहरादून, मसूरी, नैनबाग, पुरोला व मोरी होते हुए हनोल पहुंचता है। जबकि, तीसरा मार्ग 178 किमी  देहरादून से विकासनगर, छिबरो डेम, क्वाणू, मिनस, हटाल व त्यूणी होते हुए हनोल तक है। 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :-
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के अभिलेखों के अनुसार हनोल महासू मंदिर नौवीं-दसवीं शताब्दी के आसपास निर्मित प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है इसी कालखण्ड के आस-पास उत्तराखंड के सभी ऐतिहासिक मंदिर निर्मित माने जाते हैं। महासू मंदिर देहरादून सर्किल की संरक्षित स्मारक सूची में भी शामिल है। महासू महाराज का कनेक्शन राष्ट्रपति भवन से भी जुड़ा है, राष्ट्रपति भवन से मंदिर में पार्सल आता था, जिसमें नमक की तरह दिखने वाली धूप बत्ती होती थी और पार्सल पर दिल्ली का पता होता था। महासू मन्दिर को न्यायालय के रूप में भी माना जाता है।  
मंदिर वास्तुशिल्प और कलात्मकता :-
मंदिर शुद्ध पत्थरों से निर्मित नागर शैली शिखर युक्त गर्भगृह (मूलप्रसाद) बना है, जिसके आगे मंडप और मुखमंडप कालान्तर में जोड़े गए लगते हैं, और मंदिर का जो स्वरूप आज है वह विभिन्न कालखंडों में हुए परिवर्तनों का प्रतीक हैै। हनोल, ठडियार व मैन्द्रथ तीन भाई महासू महाराज (बोठा, पवासी और बासिक) के मंदिरों की वास्तुशिल्प व कलात्मकता कालखण्डों से इस क्षेत्र की प्रस्तर व काष्ठकला का परिचय कराती है। 
मंदिरों के वेजोड़ निर्माण में पत्थर व लकड़ी का विलक्षण समन्वय देखा जा सकता है। शिखर युक्त गर्भगृह के चारों ओर व अग्रभाग में लकड़ी की सुन्दर भव्य संरचनायें बनी हैं। मंदिर की ढालदार छत पठाल/स्लेट से आच्छादित है, उसके ऊपर दो‑स्तरीय शंक्वाकार छत्री और सर्वाधिक शीर्ष पर सुडौल कलश स्थापित किया गया है। छत व कंगूरों से लटकते धातु व लकड़ी के घुँघरू-घंटियों की कलात्मकता मन को मोहती हैं। मंदिर गर्भगृह के आगे भंडार‑कक्ष, मंडप और सभा‑मंडप अलग‑अलग छतों वाले हैं, जिनके स्तंभों, द्वार भित्तों पर वेजोड़ काष्ठ शिल्पकला से देव‑प्रतिमाएँ, यक्ष‑यक्षिणियाँ, महासू देवता द्वारा दानव वध युद्ध के चित्र, पशु‑आकृतियाँ, पौराणिक दृश्य व सम्पूर्ण लोक‑जीवन को उकेरा गया है। 
गर्भगृह में महासू महाराजों व देवलाड़ी माता की मूर्तियाँ, कांस्य व चांदी जड़ित धातु मुख़ारे (मुखाकृतियों) के रूप में विराजमान हैं। किंवदंतियां मंदिर निर्माण को हूण वंशीय शिल्पी राजा मिहिरकुल हूण और ‘हूण’ स्थापत्य परंपरा से भी जोड़ती हैं, जिससे यह स्थल मध्यकालीन उत्तर भारत के राजनीतिक व सांस्कृतिक सौहार्द का भी साक्षी माना जाता है।
पूजा विधान :-
  गर्भगृह (मूलप्रसाद) में प्रवेश केवल नियुक्त परंपरागत क्षेत्रीय ब्राह्मण पुजारी ही कर सकते हैं, जिनमें डोभाल, जोशी और नोटियाल आदि जाति के ब्राह्मण हैं एवं पुजारी की सेवा के लिए थानी नियुक्त होते हैं, थानी में चौहान इत्यादी राजपूत जातियां के पुरुष होते हैं। वैसे यह नियुक्ति स्प्ताह दो सप्ताह के लिए ग्रामवार, उपलब्धता व सार्मथ्य के अनुसार बारी से होती है लेकिन कोई पुजारी या थानी ज्यादा समय के लिए भक्ति करना चाहता है तो कर सकता है। जिस समयावधि में पुजारी महासू महाराज की पूजा के लिए नियुक्त रहता है उस अवधि में पंडित जी के लिए कठिन तप विधान बना है, इस समयावधि में पुजारी रोज अनुष्ठान में रहता है, उस दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य व बाह्य‑सम्पर्क से विरत रहता है, पुजारी का आजीवन शाकाहारी होना जरूरी है। पुजारी का किसी भी व्यक्ति के हाथ का खाना व छूना पूर्ण वर्जित होता है यहां तक कि बाहर से आये भक्तों का टीका प्रसाद थानी करता है। पुजारी रोज अपने हाथ से भोग बनाता है महाराज को भोग लगाता है और खुद पाता है, इस कार्य में भोग पूर्व की  तैयारी थानी जी करते है। भंडार‑कक्ष भी ब्राह्मणों के अधीन होता है। वर्तमान में मन्दिर समिति के बन जाने से मन्दिर की सफाई व वाह्य एडमिनिस्ट्रेटिव व्यवस्था समिति देखती है और मन्दिर का चढ़ावा इत्यादी का संचय व विनिमय भी समिति के अधीन होता है। बाहर का सामान्य भक्त मंदिर के आँगन, मंडप तथा बाह्य परिक्रमा‑पथ में खड़े होकर पूजा, धूप‑दीप, नारियल, धान‑अन्न, पशु‑बलि (अब निषिद्ध), और नृत्य‑गान से अराधना करते हैं। 
पौराणिक कथा और लोक‑मान्यता :-
पौराणिक कथा और लोक‑मान्यता के अनुसार महासू महाराज की उत्पत्ति हूण भट्ट नामक तपस्वी ब्राह्मण से जुड़ा है। हूण के नाम से ही वर्तमान हनोल गाँव का नाम हनोल पड़ा पहले यह जगह चकरपुर के नाम से जानी जाती थी। मान्यता ये भी है कि पांडव लाक्षागृह से निकलकर यहाँ आए थे। 
  कथा के अनुसार यह क्षेत्र किल्मीर (किरमीर) नामक राक्षस के अत्याचार से त्रासद था। किल्मीर राक्षस ने हूण भट्ट के सात पुत्रों का भक्षण किया व ब्राह्मण की पत्नी पर कुदृष्टि डालने लगा तदउपरांत हूण भट्ट को देवताओं द्वारा आदेशित किया गया कि आप कश्मीर जाओ और भगवान शंकर की तपस्या करो शंकर भगवान ही इस राक्षस से निजात दिलाएंगे। हूण भट्ट ने सपत्नी कश्मीर में भगवान शंकर की पतस्या की, अराधना के बाद उन्हें कश्मीर से एक टोकरी में फूल देकर लौटाया और सात दिन जुताई करने तक प्रतिक्षा करने को कहा कि भगवान पैदा होंगे। ब्राह्मण हूण भट्ट भगवान के वचनों का पालन करते हुए जुताई करने लगे लेकिन इधर राक्षस का अत्याचार क्षेत्र पर और बढ़ने लगा जिससे इन्तजार करना कठिन हो रहा था, छटवें दिन ब्राह्मण हूण भट्ट ने हल को गहराई में लगाना सुरू किया कि धरती से एक-एक करके चार भाई महासू पैदा हुए। तदउपरान्त महासू भाईयों ने अपने वीरों के साथ किल्मीर राक्षस व उसकी सेना का नाश करके सम्पूर्ण क्षेत्र को राक्षसी अत्याचार से मुक्त किया। किंवदंती के अनुसार हनोल से आगे खूनीगाड़ (वर्तमान में सड़क के साथ छोटा गाँव) नामक गदेरे का खूनीगाड़ नाम पड़ने से भी है कि इस गदेरे में राक्षसों का संहार करके महासू सेना ने खून की गंगा बहा दी थी। 
किंवदंती के अनुसार गहराई में हल चलने की वजह से धरती से उत्पन्न हुए महासू भाई हल की फाल से चोटिल हो गए थे, जिसमें बड़े भाई बोठा महाराज के घुटने पर चोट आयी, चलने से असमर्थ होने बोठा महाराज यथा स्थान हनोल में ही रहे, उनके बाद पवासी महाराज का कान चोटिल हो गया और वे कान से बहरे हो गए वे नजदीक ठडियार गाँव मे रहे, तीसरे भाई बासिक महाराज की आँख पर चोट आई वे मैन्द्रथ में रहे, और अंत में चौथे भाई चालदा महाराज बिना चोटिल पैदा हुए जिससे चालदा पूरे क्षेत्र में भ्रमण करके क्षेत्र की रक्षा करते हैं।   
  क्षेत्र को राक्षस मुक्त करने के उपरान्त चारों भाईयों ने अपने वीरों के साथ क्षेत्र रक्षा की जिम्मेवारी बांटी। चार महासू भाईयों के साथ उनके वीरों का स्थापत्य भी पूज्यनीय है, बोठा महाराज के कईलू वीर उनके साथ हनोल में, बासिक महाराज के कपला वीर उनके साथ मैन्द्रथ में, पवासी महाराज के वीर कैलाथ ठडियार और चलदा महासू के सिड़कुड़िया वीर फते पर्वत पट्टी, रुपिन घाटी मौरी ब्लॉक के रक्षक हैं। 
लोक आस्था :-
लोक में महासू महाराज को न्याय के देवता के रूप में माना जाता है, महाराज के समक्ष की गई अर्जी‑फरियाद फलदायी होती है। क्षेत्र के गाँवों के देवमंडपों पर महासू का आधिपत्य स्वीकार किया जाता है और लोकदेवता की संस्था के रूप में वे अन्य ग्राम देवताओं के भी अधिपति माने जाते हैं। महासू देवता के प्रति लोक आस्था इतनी प्रबल है कि सब तरफ से निरास व्यक्ति महासू द्वार से निरास नहीं जाता है। महासू देवता की श्रद्धा से की गई भक्ति-अनुष्ठान यक़ीनन फलदायी होता है। कहते हैं कि महासू के न्याय से कोई अपराधी दंड बिना नहीं बच सकता। अगर किसी निष्कपट भुक्त भोगी व्यक्ति ने जिस अन्याय कर्ता के प्रति महासू महाराज को पुकारा यानि घात डाली वह कभी नहीं उतरती और महासू महाराज उसको पूरी तरह दण्डित करके छोड़ते हैं ऐसी परम मान्यता जौनपुर पट्टी टेहरी तक भी है। 
भक्त लोग महाराज जी के चरणों में अपनी मनोकामना के लिए सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं कि यदि उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तो वे पुनः दर्शन करने आएंगे और उनके लिए इच्छा शक्ति से चढ़ावा देंगे जैसे धातु में सोना, चाँदी, अति उत्तम भोग या बकरा बलि भी शामिल थी जो वर्तमान में निषेध कर दी गई है। वर्तमान में चढ़ाये हुए बकरे को वहीं छोड़ा जाता है जिसे घांडुवा कहा जाता है।
एक और रोचक तथ्य कि हनोल मंदिर परिसर में दो विशेष पत्थर रखे हैं मान्यता के अनुसार उन पत्थरों को केवल निष्कपट, पवित्र हृदय वाला व्यक्ति ही सहजता से उठा सकता है, जबकि गलत नेक नियति वाला व्यक्ति नहीं उठा सकता है इसलिए अधिकतर इसे आजमाने से बचते हैं, कलयुगी मनुष्यों का चरित्र कहाँ इतना पावन रहने वाला। इस परिक्षा को भी लोक‑धर्म व सत्यनिष्ठा का प्रतीक माना जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 
लोक समाज में विवाह, भूमि‑विवाद, पशुधन और फसल से जुड़ी शपथें भी अनेक बार महासू के नाम पर ली जाती हैं, महासू की शपथ ले ली तो व्यक्ति सच्चा निष्कपट माना जाता है यह भी सामाजिक अनुशासन एवं विधि‑व्यवस्था में देवता की सुदृढ़ नैतिक सत्ता का द्योतक है। देवता के सामने कोई भी व्यक्ति झूठ नहीं बोल सकता ऐसा दृड विश्वास है।  
महासू पर्व :-
हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (नाग चौथ) के दिन हनोल का ‘जागरा’ महासू महाराज के प्रमुख वार्षिक अनुष्ठानों में से एक है, जिसमें देव-मूर्तियों का विशेष स्नान, शुद्धिकरण, डोली यात्रा, रात्रि‑जागरण, नृत्य‑गान और जागर लगाने की परंपरा है जिसे पूरे क्षेत्र का हर वासिंदा यकीनन हाजरी लगाकर हर्षाेल्लास व नियम पूर्वक मनाता है। नाग चौथ जागरा में क्षेत्र के प्रवासियों एवं उत्तराखण्ड, हिमाचल के अन्य क्षेत्रों सेे भी भक्त बड़ी संख्यां में आते हैं।  
छत्रधारी चालदा महाराज की यात्रा :-
जैसे कि उपरोक्त वर्णित है छत्रधारी चालदा महाराज चल देवता के रूप में पूजित हैं, उनका कोई स्थाई मन्दिर नहीं है, वे एक वर्ष एक क्षेत्र पड़ाव में रहते हैं। महाराज की डोली मार्गशीर्ष में नियुक्त तिथि को बाहर निकलती है और अगले पड़ाव को निकलती है यह पड़ाव कहाँ कितने वर्षों का होगा देवता खुद बताता है। चालदा महाराज की  यात्रा पैदल ही होती है। 
इस वर्ष 2025 की यह ऐतिहासकि यात्रा जौनसार के दसऊ से 70 किलोमीटर दूर हिमाचल सिरमौर जिले के पश्मी गाँव को निकली। पश्मी गाँव में चालदा महाराज का संदेश पांच साल पहले घांडुवा (बकरा) के रूप में आया था। प्रत्यक्षदर्शीयों के अनुसार 2020 में एक घांडुवा पश्मी गाँव में आकर ठहर गया, लोग उसे सामान्य बकरा मान अन्यत्र छोड़ दें लेकिन बकरा हर बार फिर वहीं आकर रुकता, जब क्रम की पुनरावृत्ति होती रही तो चालदा महाराज अवतरित हुए और महाराज ने अपने आने के संदेश को घांडुवा रूप में देने की पुष्ठि की। तद्उपरान्त पश्मी गाँव व आस-पास के गाँवों ने मिलकर दो करोड़ लागत से महाराज का मन्दिर बनाया। 
महासू परंपरा सत्य, न्याय और सामाजिक संतुलन की उस धुरी को दर्शाती है जिस पर क्षेत्रीय समाज ने शदियों से अब तक अपनी नैतिकता कायम रखी हुई है। अपने अराध्य के उपर किस अति विश्वास व श्रद्धा में रहा जा सकता है यह क्षेत्र विशेष के जन मानस में देखा जा सकता है। महासू यात्रा के दौरान रास्ते में पड़ने वाले पड़ावों पर उमड़े भक्त जन सैलाब को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोक दिलों में कितनी गहराई तक महासू विराजमान हैं। क्या बड़ा, क्या छोटा, क्या शहरी क्या ग्रामिण सब महाराज के सेवक रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं।  

@ बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’     




गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

घुमक्कड़ी रुपिन सुपिन घाटी



घुमक्कड़ी की कड़ी में रुपिन व सुपिन नदियों का संगम नेटबाड़ के साथ सौड़-सांकरी, जखौल, दिवारा, मोरी ब्लॉक का वृतांत। नेटवाड़ से ही रुपिन -सुपिन नदियां मिलकर टौंस (तमस) नदी के नाम से जानी जाती है, टौंस डाकपत्थर में जाकर यमुना से मिलती है। रुपिन नदी का मुख्य उदगम बराड़ ताल ग्लेशियर है जो माझी बन से आगे पश्चिम में डोडाक्वार हिमाचल और उत्तर में तिब्बत से लगता है, नेटवाड़ से आगे रुपिन घाटी में 8-10 सीमांत गाँव हैं। वहीं सुपिन नदी का उदगम हरकीदून ग्लेशियर है। उत्तरकाशी जिले के इस सीमांत मोरी ब्लॉक में मुख्य तीन पट्टियाँ हैं, सिगतूर पट्टी जो पुरोला से उत्तर  पश्चिम का भूभाग टौंस नदी के साथ मोरी, नेटवाड़ का क्षेत्र हैं, वहीं पंचगाईं पट्टी नेटवाड़ से उत्तर में सुपिन घाटी वाला क्षेत्र है और नेटवाड़ के पश्चिम में रुपिन घाटी के साथ फ़ते पर्वत पट्टी आती है ।

पंचगाईं पट्टी मोरी ब्लॉक का मुख्य पर्यटक क्षेत्र है जिसमें

"गोविन्द नेशनल पार्क" के अंतर्गत सौड़-सांकरी, उत्तराखंड के बड़े गाँव में से एक जखोल गाँव, द्योक्यारा बुग्याळ, हरकीदून, केदार कांठा बुग्याळ, पाली पास एवं ब्लैक पीक आदि 10-15 ट्रेक पड़ते हैं । वर्तमान पुरोला विधायक श्री दुर्गेस्वर लाल आर्य फिताड़ी गाँव के हैं और चर्चित बद नाम हाकम सिंह लिवाड़ी से हैं, जो जखोल घाटी का सबसे अंतिम गाँव है।

सौड़-सांकरी से हरकीदून ट्रेक का आखरी गाँव ओसला, तालुका, डॉटमीर है, वर्तमान में ट्रेकर सांकरी में रुकने के वजाय सीधे तालुका जाना ज्यादा सुगम मानते हैं क्योंकि तालुका तक सड़क संपर्क हो चुका है।

विकास की दृष्टि से राज्य के अन्य सीमांत क्षेत्रों के अनुरूप यह क्षेत्र भी काफी कुछ मूलभूत अवश्यकताओं की बाट जोह रहा है, जिस तरह सेब बगवानी व ट्रेकिंग में यह क्षेत्र व्यक्तिगत आजीविका में सक्षम होता जा रहा है वहीं उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य व सड़क जैसे विकासन्नोमुख योजनाओं के लिए अभी भी आशा लगाए बैठा है, एक बानगी मोरी से आगे राजमार्ग की हालत आपको इसकी गवाही देता है।

आम लोक जीवन चर्या में नकद फसल व पशुपालन अब कम हो गया है कारण बागवानी में सेब उद्यान मुख्य आजीविका का साधन बन गया है।

गाँव अभी अपने वैभव में है, सभी गाँव परिवारों से भरे पड़े हैं, क्षेत्रीय लोगों ने अपने गाँव के साथ बजारों में भव्य मकान, होम स्टे, होटलों पर अच्छा इन्वेस्टमेन्ट किया हुआ है। यह आमजन की अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और लगाव को दर्शाता है।

गाँव में परिवारों की मैजूदगी केवल सरकारी और अच्छा रोजगार बाहर नहीं होने का कारण है, बाकी पलायनी सोच यहाँ भी वही है जैसे पूरे उत्तराखंड में है, जिसको अच्छा रोजगार व सरकारी नौकरी मिली रही वह भाग ही रहा है।

क्षेत्र अति शर्द होने के कारण मुख्य लोक पहनावे में स्थानीय भेड़ की ऊन का कोट पेंट देखा जा सकता है जिसमें महिलाओं की फज्जी (ऊन का लम्बा कुर्ता व सलवार) आकर्षक व पारम्परिकता प्रथमम का द्योतक है। सिखोली (जिसे हिमाचली टोपी नाम से भी जाना जाता है ) पुरुषों के सर पर हर समय सजी रहती है। साथ ही फज्जी के साथ कमरबंध।

ईष्ट देवता के रूप में फ़ते पर्वत पट्टी के ईष्ट देवता सैड़कुलिया महासू (महासू वीर), पंचगाईं में सोमेश्वर महाराज व सिगतूर पट्टी के ईष्ट देवता कर्ण महाराज हैं। कर्ण महाराज का भव्य पौराणिक मंदिर नेटवाड़ से उपर देवरा गाँव में स्थिति है, वास्तुशिल्प की दृष्टि से यह मंदिर भी  शिखरयुक्त  है व नयाँ ही बना है यानि आठरवीं या उन्नीसवीं शताब्दी का। मंदिर के प्रांगण में पाषाण निर्मित अनेक देव प्रतिकों के साथ अशोक स्तम्भ के चार मुखी शेर की आकृति विराजमान हैं। कर्णमहाराज के पुजारी देवरा गाँव के नोटियाल पंडित हैं और गाँव के नाथ जाति खुद को कर्ण के वीरों के रूप में मानती है।

दो राज्यों उत्तराखंड-हिमाचल, दो जनपद देहरादून-उत्तरकाशी के सीमांत जौनसार-भाभर, बंगाण व रवांईं

लोक-संस्कृति का साझा ईष्ट देवता महासू महाराज पूरी टौंस घाटी के अधिष्ठाता, रक्षक और न्यायकर्ता देवता के रूप में सर्व पूजित हैं।

बोली भाषा की दृष्टि से देखा जाय तो उत्तरकाशी जिले के पश्चिम सीमांत इस क्षेत्र की बोली रवांईं, बंगाणी और हिमाचली का मिश्रित रूप है, फिर भी समस्त मोरी ब्लॉक में अपवाद कुछेक क्षेत्रीय टोन के रवांईं ही बोली जाती है और आम जन अपने को रवांईं से ज्यादा कनेक्ट करता है इतर बगाण या हनोल।

आम जन गढ़वाली भाषा को ठीक-ठाक समझ-बींग लेते हैं। "मेरि भाषा मेरि पछयाण" अभियान के तहत आम लोगों से संवाद के दौरान यह अनुभव मिला। मेरा संवाद आम लोगों से गढ़वाली में ही रहा लेकिन उनकी तरफ से न समझने वाला कोई संकेत नहीं मिला, हाँ उनका जबाब स्थानीय के साथ हिंदी में जरूर था।

@ बलबीर राणा "अडिग"

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

सजल



उदयाचल से उगना, अस्ताचल में छिपना होता,
देखो, सूरज को रोज धरा के लिए नापना होता।

वो प्रकृति ऋतु-चक्रों के आदेशों को नहीं तोड़ती,
शीत, घाम, बरखा, हर हाल में उसे चलना होता।

हम मनुष्य पल, घड़ी, दिन-बार देख बदलते हैं रंग,
पर आत्मा को तयसुदा वक्त पर शरीर बदलना होता।

श्रम की तपती रेत में अथाह भाग रहे हैं दिन-रात,
कुछ को स्व, कुछ को परहित प्रारब्ध पाना होता।

संभलने–फिसलने में ही समय हो जाता अवसान का,
फिर भी आख़िरी साँस तक जी-जान से उलझना होता।

सच है नियती को जो करना है, करके रहेगी 'अडिग'
फिर भी तेरा ज़ोर–ज़बर नियति से लड़ना होता।

@ बलबीर राणा 'अडिग'