गुरुवार, 23 मई 2013

पथ वो पुराना (1)




थ वो पुराना गुजरा था जहां से याराना
बंसत बयारों और सावनी फूहारों बीच 
था अपना वो प्रेम आशियाना

अंकुरित हुआ था यौवन फूटे थे प्यार के बीज
दिलों की हरियाली में ओंश की बूंद का चमकना
पथ वो पुराना................

दिवस प्रेम की खुमारी और
रात अंगडाई का सफर था सुहाना
मधुबन में बना था वह घराना
पथ वो पुराना

ना रहती थी आज की फिक्र
ना होती थी कल की चिन्ता
चंचल मन, नादान दिल से करते थे बेमानी
जेठ की तपती दुपहरी में भी
रहता अपने पन का शीतलतना
पथ वो पुराना..........

अन्जान रिश्ते की डोर
खिंची थी पथ के दोना ओर
प्रेम के कच्चे धागे से बंधा था जिगर का मोर
आज समय के बाढ संग बह गया वो फसाना
अब वो न प्यारा न यार रहा ना ही रहा याराना
आज भी आँखो के सामने दिखता वो जमाना
पथ वो पुराना…………….


12 फरवरी 2013
बलबीर राणा ‘भैजी‘

तेरे आने से


तेरे आने से जिन्दगी आवाद हुई
सुखे खलियान में हरियाली उगी
उजडा जा रहा था घरौन्दा
निरसता पर बाज झपट रहा था
तेरे आने से चमगादडों की इस राह में
एका-एक दिवस का अवसान हुआ

रेत में तप रही थी प्रेम तृष्णा
जीवन ज्योति हवा के झोंको संग लड रही थी
तेरे आने से ना जाने कहां से
सूखे रेगिस्तान में सावन की बौछारें हुई

तन्हाई की ईंट तोड,
जवानी कंकरीट का ढेर बन रही थी
उदासी के समन्दर में
जीवन की सुबह ढूब रही थी
तेरे प्यार की पतवार से
जीवन की नय्या को खेवन हार मिला

आमावस्य की रात  चंदा ढूंढ रहा था
ठिठुरते सपनो के लिए आशियाना ढूंढ रहा था
तेरे आने से आज पतझड होते अरमा नो में
बंसत का आगमन हुआ
जैसे गरीब की बीबी का सौ श्रृंगार हुआ

09 फरवरी 2013


रिश्तों का सरोवर



रिश्तों के अटल सरोवर में,छिद्र क्यों हुआ जा रहा आज?
प्रीत का र्निमल नीर, क्यों रिसने लगा आज?
प्रेम के अटल पाषाण से र्निमित जलज,
जर्जर क्यों हुआ जा रहा आज?

एक ही ओट-गोट के जातक
प्रेम-पास से बेलगाम हो रहे,
दुनिया तो,एक ओर है
अपने ही नातों से दूर हाते जा रहे है,
अपने ही लहू की पीडा में,ये कैसा
औपचारिकता का मलहम लगने चला आज?

अंधड मे मानवता, आँख बन्द किये खडी है,
दूर से आवाज दे, कर्मों की इतिश्री हो रही है।
बेप्रीत की रेत से, यह सरोबर भरने चला आज,
ममता के कमल दल लुप्त होने चले आज।



बलबीर राणा भैजी”
29 जनवरी 2012

पिताजी





पिताजी छवि आपकी इस तन मन में रमी है,
सब कुछ है आज मेरे पास, बस आपकी कमी है।
वाणी के बोल आपके, हर वक्त याद आते हैं
जीवन की चडायी में, हाथ खींच सहारा दे जाते हैं।
इस कर्मभूमि के हर पहलू हर कार्य सम्पदा में,
क्षण. क्षण तुम्हें महसूस करता हूँ,
जीवन की गाडी का सारथी तुम्हें पाता हूँ।
आप केवल जनक नहीं सच्चे पालक थे,
उस से बढ कर एक सच्चे मार्गदर्शक थे।

 


16 फरवरी 2013


पुज्य पिताजी की पुण्य तिथी पर

सोमवार, 21 जनवरी 2013

जानते सुनते भी अन्जान

जीवन की सच्चायी को
महसूस, करते सबको देखा
इस सच्चायी को चरित्रार्थ करते
किसी को न देखा।
दूसरों की बात पर फब्तियां कसते सबको देखा,
दूसरे मन क्या गुजरी ये जानते न देखा।
किसी की, उम्मीद के टूट जाने पर
तुरूप मारते सबको देखा,
दो बचन सांत्वना के बोलते न देखा।
राह पडे पत्थर पर ठोकर मारते सबको देखा,
पत्थर भी, किसी काम आयेगा उसे सम्भालते न देखा।
दूसरे के गूंगे पर हंसते सबको देखा,
अपना ही जब गूंगा हो जाय ये भाव समझते न देखा।
दुनिया तेरे रंग भी अजीब है,
जानते सुनते भी अन्जान बनने की रीति है।  

10 दिसम्बर 2012