धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
शनिवार, 10 मई 2014
रविवार, 27 अप्रैल 2014
माँ बसुन्धरा
माँ बसुन्धरा को नमन करें
दो फूल श्रधा के अर्पण करें
न होने दें क्षरण माँ का
सब मिल कर यह प्रण करें।
कितना सुन्दर धरती माँ का आँचल
पल रहा इसमें जग सारा,
अपने मद के लिए क्यों तू मानव
फिरता मारा-मारा
संवार नहीं सकते इस आँचल को तो
विध्वंस भी तो ना करें,
माँ बसुन्धरा को नमन करें।
हिमगिरी शृंखलाओं से निरंतर
बहती निर्मल जल धारा,
सींच रहा इससे जड़ जीवन
उगता नित नयें अंकुरों का संसार प्यारा,
यूँ ही सोम्यता बनी रहे
सब मिल कर जतन करें,
माँ बसुन्धरा को नमन करें।
जल-जंगल पादप लताएँ
जगाये हैं जीवन ज्योति हमारी,
आज काट-काट कर खंडित हो रहे
एक दिन पड़ेगी जीवन पर भारी,
प्रदुषण के बारूदों से
प्रकृति प्रवृति को परवर्तित ना करें,
माँ बसुन्धरा को नमन करें।
© सर्वाधिकार सुरक्षित
बलबीर राणा "अडिग"
रविवार, 6 अप्रैल 2014
तन्हायी संग
4.भोर दूर हिमगिरी श्रिंखला की अनुपम छटा देख,
मन मुग्द होकर पूछ बैठा
क्या कभी मेरा धीर तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
ईमान मेरा तेरे जैसे अडिग रह पायेगा,
हिमगिरि बोला
इस प्रश्न का उत्तर मेरे संग बारह मास तठ्स्त सैनिक के पास है
विषम परिस्थिति पर भी जिसका राज है
तभी हिमगिरी का एक खंड भरभरा विखंडित हो जाता है
वह अडिग सैनिक रिपु बाण छाती सह शांत हो जाता है।
क्षण भर में वह अडिगता क्षोभ का घूँट जाती है ।
और मै अपने सवालों का जबाब नहीं ढूंढ पाता हूँ
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
5.
तन्हायी की खामोसी शांत नहीं बैठ पाती
जीवन के प्रति जुजुप्त्सा बढती जाती,
सृश्ठी की इन रचनाओं के बीच
मेरी रचना की मंजिल दूर नजर आती,
इसी तरह सत्य पथ के गंतव्य पर,
तन्हायी संग तन्मय चलता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
6.
शील समुद्र की शालीनता देख
आदतन पूछ बैठा
क्या कभी मेरे दिल की चंचलता
तेरे जैसे अचल हो पायेगी
अपने उदर में लाखों जीवों का, संसार बसा पायेगी,
तभी ज्वार भाटा का जलजला किनारों को तोड़ अपने गर्भ में ले जाता,
किनारों के बचे जीवन के क्रंदन सुन फिर व्यथित हो जाता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
6.
सृष्ठि की इस दोधारी तलवार के पैनेपन को
मेरी तन्हायी जब तक परख पाती
तभी एक आवाज कानो से टकरायी,
मत भटक धरा के ओर-छोर
तेरे सवालों का जबाब
मेरी उत्तम रचना मानव मस्तिस्क ही है,
दृष्टि बदलेगा तो मैं सृष्ठि बदल जाऊँगी,
जीवन का सच तुझे समझा पाऊँगी।
फिर एक बार अंतर मन में झांकता हूँ
खुद पर ही खुद को हंसता देखता हूँ
मै अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
क्रमश: -
मन मुग्द होकर पूछ बैठा
क्या कभी मेरा धीर तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
ईमान मेरा तेरे जैसे अडिग रह पायेगा,
हिमगिरि बोला
इस प्रश्न का उत्तर मेरे संग बारह मास तठ्स्त सैनिक के पास है
विषम परिस्थिति पर भी जिसका राज है
तभी हिमगिरी का एक खंड भरभरा विखंडित हो जाता है
वह अडिग सैनिक रिपु बाण छाती सह शांत हो जाता है।
क्षण भर में वह अडिगता क्षोभ का घूँट जाती है ।
और मै अपने सवालों का जबाब नहीं ढूंढ पाता हूँ
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
5.
तन्हायी की खामोसी शांत नहीं बैठ पाती
जीवन के प्रति जुजुप्त्सा बढती जाती,
सृश्ठी की इन रचनाओं के बीच
मेरी रचना की मंजिल दूर नजर आती,
इसी तरह सत्य पथ के गंतव्य पर,
तन्हायी संग तन्मय चलता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
6.
शील समुद्र की शालीनता देख
आदतन पूछ बैठा
क्या कभी मेरे दिल की चंचलता
तेरे जैसे अचल हो पायेगी
अपने उदर में लाखों जीवों का, संसार बसा पायेगी,
तभी ज्वार भाटा का जलजला किनारों को तोड़ अपने गर्भ में ले जाता,
किनारों के बचे जीवन के क्रंदन सुन फिर व्यथित हो जाता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
6.
सृष्ठि की इस दोधारी तलवार के पैनेपन को
मेरी तन्हायी जब तक परख पाती
तभी एक आवाज कानो से टकरायी,
मत भटक धरा के ओर-छोर
तेरे सवालों का जबाब
मेरी उत्तम रचना मानव मस्तिस्क ही है,
दृष्टि बदलेगा तो मैं सृष्ठि बदल जाऊँगी,
जीवन का सच तुझे समझा पाऊँगी।
फिर एक बार अंतर मन में झांकता हूँ
खुद पर ही खुद को हंसता देखता हूँ
मै अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
क्रमश: -
रविवार, 16 मार्च 2014
होली आयी
रंग-बिरंगी होली आयी,
प्यार-मुहब्बत का
पैगाम लायी,
रंग दो तन मन एक
दूजे का,
भर लो अपनी प्रेम
पिचकारी।
कितना अनोखा त्यौहार
अपना,
कितना सुन्दर
विधान अपना,
सजा दो आँगन
सतरंगो से अपना,
भर दो थाल गुलाला
से अपना।
बुझा दो मन से
नफरत की चिंगारी,
जला दो दिल में
लो प्रेम की प्यारी,
अपने-पराये का
भेद मिटा दो,
धर्म-जाती की
दीवारें ढहा दो।
इतना रंगों एक
दूजे को,
पहचान न एक दूजे
की रहे,
एक मय बन जाए हम सब,
जिगर के तार
यूँही जुड़े रहें।
फूहड़ न बना देना
इस प्रेम पर्व को,
मर्यादा इसकी बचा
के रखना,
जला न देना
आधुनिकता की ज्वाला से इसे,
सुन्दरता इसकी
बचा के रखना।
महारंगो के इस महोत्सव
को,
सुखी पलों की धरोहर
बना के रखना,
जब भी जीवन में
एक दूजे से मिले,
दिल से फिर प्रेम
पिचकारी फूटे।
बलबीर राणा “अडिग”
© सर्वाधिकार सुरक्षित
शनिवार, 25 जनवरी 2014
कषिश
तुमसे मिलने की कशिष कशिष ही रह गयी
तन्हायी की तम्नाये अधूरी छूट गयी
कब भीगेगा प्रेम फुहारों से ये आँगन
पूरी उम्र घटाओं के इन्तजार में कट गयी
बदलियो तुम्हें रोज दिल के करीब से जाते देख मन मचल जाता है,
जैसे छूने को हाथ बढाता, वैसे भ्रम टूट जाता है,
पर्वत से मिले बिना तुम, दूर आसमान में उड़ जाती हो,
एक बूँद तो बर्षा जाते निश्ठूरो, इस प्यासे चातक को क्यों हर रोज तरसा जाती हो।
सूरज तुम रोज सुबह आकर दिल के अंधियारे को रोशन कर जाते हो,
कि अब रास्ता उसके घर का ढूंढ ही लूंगा आस मन में जगा जाते हो,
भटकता भटकता जब उस नूर के करीब पहुँचने वाला होता,
लेकिन शाम होते ही आप भी, सामने वाली पहाड़ी से टाटा कर जाते हो।
दुनिया के प्रेम को शीतल छांव से सवांरने वाली चन्दा,
कब तक बिरान रहेगा ये आशियाना मेरा उसको
तन्हायी की तम्नाये अधूरी छूट गयी
कब भीगेगा प्रेम फुहारों से ये आँगन
पूरी उम्र घटाओं के इन्तजार में कट गयी
बदलियो तुम्हें रोज दिल के करीब से जाते देख मन मचल जाता है,
जैसे छूने को हाथ बढाता, वैसे भ्रम टूट जाता है,
पर्वत से मिले बिना तुम, दूर आसमान में उड़ जाती हो,
एक बूँद तो बर्षा जाते निश्ठूरो, इस प्यासे चातक को क्यों हर रोज तरसा जाती हो।
सूरज तुम रोज सुबह आकर दिल के अंधियारे को रोशन कर जाते हो,
कि अब रास्ता उसके घर का ढूंढ ही लूंगा आस मन में जगा जाते हो,
भटकता भटकता जब उस नूर के करीब पहुँचने वाला होता,
लेकिन शाम होते ही आप भी, सामने वाली पहाड़ी से टाटा कर जाते हो।
दुनिया के प्रेम को शीतल छांव से सवांरने वाली चन्दा,
कब तक बिरान रहेगा ये आशियाना मेरा उसको
तन्हायी संग
1.
दुनियां तन्हाई से भागती है,
मैं अक्सर बुलाता हूँ,
उसके आगोस से छिपकर
जीवन को करीब से देख पाता हूँ,
भीड़ भरे संसार से परे
सृश्ठी से मन की बात कह पाता हूँ।
क्या मैं तेरे जैसा विशाल आँगन सजा पाऊंगा,
जल स्थल नभ का अनुपम सौर मंडल बसा पाऊंगा?
सृश्ठी कहती तुझमे सच्चायी जानने का साहस है?
मेरी हर रचना जीवन का आभास है,
इसी तरह रोज
कल्प की कल्पना को साकार पाता हूँ,
मैं अक्सर तन्हाई को बुलाता हूँ।
2.
भोर दूर हिमगिरी की विह्न्गमता से विह्व्लित मन पूछ बैठता,
क्या कभी मेरा धीर भी तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
या संसार के कष्टों से विचलित होकर ईमान मेरा भर-भरा कर विखंडित हो जाएगा।
हिमगिरी बोला!!
ये सवाल देश रक्षक सैनिक से क्यों नहीं पूछता,
जो मेरे संग बारह महीने तथस्ट रहता,
तभी भयंकर गर्जना के साथ
एक विशाल गिरी खंड टूटता,
मेरा जबाब मुझे मिल जाता
जीवन की क्रुरता जान जाता
जब इतना विशाल पर्वत अपने अस्तित्व को नहीं बचा पाता,
तो मेरी बिसात क्या है,
इसी तरह प्रकृति सत्य को करीब लाता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
चलते चलते बाग़ के गुलाब से सवाल करता,
तू इन काँटों संग कैसे जीता,
गूलाब का जबाब कुछ ख़ास होता
जिसमे जीवन की खुसी का राज होता
अनचाहे में भी प्रेम से पेस किया जाता हूँ
टूटे रिश्तों और दिलों को जोड़ जाता हूँ,
इसी लिये काँटों संग भी मुस्कराता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को जीता हूँ।
3.
शनै: शनै: तन्हायों की शाम ढलती
मेरी तन्द्रा तठस्त हो जाती,
तारों से पूछता
क्या मैं भी तुम्हारे जैसा जीवन के खुले आसमान में चमक पाउँगा?
भौतिकता की इस चाँदनी में कहीं रोशनी खो तो नहीं जाऊंगा?
तभी एक तारा टूट जाता है
भीड़ भरे तारा मंडल से अँधेरे में गुम हो जाता है,
रात तारों के टूटने गम में गमगीन रहता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
जीवन के इस आसमान में टूटते तारों का मर्ज कौन समझता?
जो टिमटिमा रहा अपने दर्प में मुस्कराता रहता,
वो भी तो यहाँ टिमटिमाने आया था
काली रात को रोशनी देने आया था
लेकिन जीवन के सत्य वो अभागा तारा कहाँ जान पाया,
जीवन का सफ़र आधी रात तक ही तय कर पाया,
जिजीविषा की कुंठाओं को इन टूटते तारों संग विदा करता हूँ,
दुनियां तन्हायी को भगाती है, मैं अक्सर को बुलाता हूँ,
उसके आगोस में छिपकर जीवन को करीब से देखता हूँ।
4.
हिमालय की गोद में बैठकर ,
मन मुग्द होकर पूछ बैठा
क्या कभी मेरा धीर तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
ईमान मेरा तेरे जैसे अडिग रह पायेगा,
हिमगिरि बोला
इस प्रश्न का उत्तर मेरे संग बारह मास तठ्स्त सैनिक के पास है
विषम परिस्थिति पर भी जिसका राज है
तभी हिमगिरी का एक खंड भरभरा विखंडित हो जाता है
वह अडिग सैनिक रिपु बाण छाती सह शांत हो जाता है।
क्षण भर में वह अडिगता क्षोभ का घूँट जाती है ।
और मै अपने सवालों का जबाब नहीं ढूंढ पाता हूँ
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
तन्हायी की खामोसी शांत नहीं बैठ पाती
जीवन के प्रति जुजुप्त्सा बढती जाती,
सृश्ठी की इन रचनाओं के बीच
मेरी रचना की मंजिल दूर नजर आती,
इसी तरह सत्य पथ के गंतव्य पर,
तन्हायी संग तन्मय चलता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
5.
शील समुद्र की शालीनता देख
आदतन पूछ बैठा
क्या कभी मेरे दिल की चंचलता
तेरे जैसे अचल हो पायेगी
अपने उदर में लाखों जीवों का, संसार बसा पायेगी,
तभी ज्वार भाटा का जलजला किनारों को तोड़ अपने गर्भ में ले जाता,
किनारों के बचे जीवन के क्रंदन सुन फिर व्यथित हो जाता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
सृष्ठि की इस दोधारी तलवार के पैनेपन को
मेरी तन्हायी जब तक परख पाती
तभी एक आवाज कानो से टकरायी,
मत भटक धरा के ओर-छोर
तेरे सवालों का जबाब
मेरी उत्तम रचना मानव मस्तिस्क ही है,
दृष्टि बदलेगा तो मैं सृष्ठि बदल जाऊँगी,
जीवन का सच तुझे समझा पाऊँगी।
फिर एक बार अंतर मन में झांकता हूँ
खुद पर ही खुद को हंसता देखता हूँ
मै अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
6.
दुनियां तन्हाई से भागती है,
मैं अक्सर बुलाता हूँ,
उसके आगोस से छिपकर
जीवन को करीब से देख पाता हूँ,
भीड़ भरे संसार से परे
सृश्ठी से मन की बात कह पाता हूँ।
क्या मैं तेरे जैसा विशाल आँगन सजा पाऊंगा,
जल स्थल नभ का अनुपम सौर मंडल बसा पाऊंगा?
सृश्ठी कहती तुझमे सच्चायी जानने का साहस है?
मेरी हर रचना जीवन का आभास है,
इसी तरह रोज
कल्प की कल्पना को साकार पाता हूँ,
मैं अक्सर तन्हाई को बुलाता हूँ।
2.
भोर दूर हिमगिरी की विह्न्गमता से विह्व्लित मन पूछ बैठता,
क्या कभी मेरा धीर भी तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
या संसार के कष्टों से विचलित होकर ईमान मेरा भर-भरा कर विखंडित हो जाएगा।
हिमगिरी बोला!!
ये सवाल देश रक्षक सैनिक से क्यों नहीं पूछता,
जो मेरे संग बारह महीने तथस्ट रहता,
तभी भयंकर गर्जना के साथ
एक विशाल गिरी खंड टूटता,
मेरा जबाब मुझे मिल जाता
जीवन की क्रुरता जान जाता
जब इतना विशाल पर्वत अपने अस्तित्व को नहीं बचा पाता,
तो मेरी बिसात क्या है,
इसी तरह प्रकृति सत्य को करीब लाता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
चलते चलते बाग़ के गुलाब से सवाल करता,
तू इन काँटों संग कैसे जीता,
गूलाब का जबाब कुछ ख़ास होता
जिसमे जीवन की खुसी का राज होता
अनचाहे में भी प्रेम से पेस किया जाता हूँ
टूटे रिश्तों और दिलों को जोड़ जाता हूँ,
इसी लिये काँटों संग भी मुस्कराता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को जीता हूँ।
3.
शनै: शनै: तन्हायों की शाम ढलती
मेरी तन्द्रा तठस्त हो जाती,
तारों से पूछता
क्या मैं भी तुम्हारे जैसा जीवन के खुले आसमान में चमक पाउँगा?
भौतिकता की इस चाँदनी में कहीं रोशनी खो तो नहीं जाऊंगा?
तभी एक तारा टूट जाता है
भीड़ भरे तारा मंडल से अँधेरे में गुम हो जाता है,
रात तारों के टूटने गम में गमगीन रहता हूँ,
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
जीवन के इस आसमान में टूटते तारों का मर्ज कौन समझता?
जो टिमटिमा रहा अपने दर्प में मुस्कराता रहता,
वो भी तो यहाँ टिमटिमाने आया था
काली रात को रोशनी देने आया था
लेकिन जीवन के सत्य वो अभागा तारा कहाँ जान पाया,
जीवन का सफ़र आधी रात तक ही तय कर पाया,
जिजीविषा की कुंठाओं को इन टूटते तारों संग विदा करता हूँ,
दुनियां तन्हायी को भगाती है, मैं अक्सर को बुलाता हूँ,
उसके आगोस में छिपकर जीवन को करीब से देखता हूँ।
4.
हिमालय की गोद में बैठकर ,
मन मुग्द होकर पूछ बैठा
क्या कभी मेरा धीर तेरे धीर जैसा रह पायेगा,
ईमान मेरा तेरे जैसे अडिग रह पायेगा,
हिमगिरि बोला
इस प्रश्न का उत्तर मेरे संग बारह मास तठ्स्त सैनिक के पास है
विषम परिस्थिति पर भी जिसका राज है
तभी हिमगिरी का एक खंड भरभरा विखंडित हो जाता है
वह अडिग सैनिक रिपु बाण छाती सह शांत हो जाता है।
क्षण भर में वह अडिगता क्षोभ का घूँट जाती है ।
और मै अपने सवालों का जबाब नहीं ढूंढ पाता हूँ
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
तन्हायी की खामोसी शांत नहीं बैठ पाती
जीवन के प्रति जुजुप्त्सा बढती जाती,
सृश्ठी की इन रचनाओं के बीच
मेरी रचना की मंजिल दूर नजर आती,
इसी तरह सत्य पथ के गंतव्य पर,
तन्हायी संग तन्मय चलता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
5.
शील समुद्र की शालीनता देख
आदतन पूछ बैठा
क्या कभी मेरे दिल की चंचलता
तेरे जैसे अचल हो पायेगी
अपने उदर में लाखों जीवों का, संसार बसा पायेगी,
तभी ज्वार भाटा का जलजला किनारों को तोड़ अपने गर्भ में ले जाता,
किनारों के बचे जीवन के क्रंदन सुन फिर व्यथित हो जाता हूँ।
मैं अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
सृष्ठि की इस दोधारी तलवार के पैनेपन को
मेरी तन्हायी जब तक परख पाती
तभी एक आवाज कानो से टकरायी,
मत भटक धरा के ओर-छोर
तेरे सवालों का जबाब
मेरी उत्तम रचना मानव मस्तिस्क ही है,
दृष्टि बदलेगा तो मैं सृष्ठि बदल जाऊँगी,
जीवन का सच तुझे समझा पाऊँगी।
फिर एक बार अंतर मन में झांकता हूँ
खुद पर ही खुद को हंसता देखता हूँ
मै अक्सर तन्हायी को बुलाता हूँ।
6.
उस बिरान पथ पर लिखता
हर रोज सपनो की बातें,
क्या इससे सुन्दर अहसास दे पायेंगी?
हमारी मिलन की रातें,
तुम क्या जानोगे? तन्हायी
के अहसास को
जुगलबंदी में रहने वाले
तोता-मेना,
प्रेम की लो से देदिप्यमान
रहता,
हर पल दिल का कोना-कोना,
कितना भी गरज-बरस जाओ मेघो तुम
अब यह चित विचलित नहीं होगा,
अडिग प्रेम किरणों की आभा
को
कोई जलजला नहीं मिटा पायेगा,
बिरानी के इन घरोंदों में
मीठे पीड़ा का साम्राज्य बसता,
इस लिए रोज मंद दर्द की
स्याही से
एक पन्ना सपनो का लिखता,
7.राह
उन तन्हा राहों में हम सफ़र नहीं मिला जिधर भी गया
जिन्दगी के रस्तों को राहगीर की तरह छोड़ता गया।
दुनियां को क्या देखता वह अपने को संवारती रही
मेरा सपनो का महल शीशे कि तरह टूटता गया।
उलझनों की कड़ियाँ बिखरी पड़ी थी उन राहों में
सुलझाने की कोशिस में खुद ही उलझता गया।
चमन की बहारों से गुजरने को अब जी नहीं चाहता
यौवन में तन्हायी की राह पकड़ी थी चलता गया।
ना जाने कब होगा गंतब्य पूरा इस बीरान रस्ते का
चलते चलते जीवन का चौथाई पखवाड़ा गुजर गया।
क्रमश:
बलबीर राणा "अडिग"
7.राह
उन तन्हा राहों में हम सफ़र नहीं मिला जिधर भी गया
जिन्दगी के रस्तों को राहगीर की तरह छोड़ता गया।
दुनियां को क्या देखता वह अपने को संवारती रही
मेरा सपनो का महल शीशे कि तरह टूटता गया।
उलझनों की कड़ियाँ बिखरी पड़ी थी उन राहों में
सुलझाने की कोशिस में खुद ही उलझता गया।
चमन की बहारों से गुजरने को अब जी नहीं चाहता
यौवन में तन्हायी की राह पकड़ी थी चलता गया।
ना जाने कब होगा गंतब्य पूरा इस बीरान रस्ते का
चलते चलते जीवन का चौथाई पखवाड़ा गुजर गया।
क्रमश:
बलबीर राणा "अडिग"
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