शनिवार, 17 मई 2014

कूड़ी जग्वाल


खोळ बटिन भैर क्या चल्गे  
लठियाळा अपणेस नि रेगे
पैली कभी-कभार,
तू धार-काँठों बटिन
तीजे जन जून दिखे भी जांदू छै,
अब निजाण,
कख हर्चिन
तु क्या हर्चे सबी हर्चेणा च, 
दुन्या आज उन्दारे लंगी 
उकाल क्वी नि आणु,
संसारे सदानी रीती रे
उग्दा सूरज तेन सब प्रणाम करदा
डूब्दा थें क्वी नि करदू,
यूँ पाड आज डूबणा च,
उड़्दा सबुं देखी
बैठी कैन नि देखी
तुम उडिग्यां  
मी कूड़ी  जग्वालम बैठीं
बल!  
अलंगी जालू-पलंगी जालू
ऐलू जड़े पऽर।    

जून २००३ डैरी पन्ना बटिन 
रचना – बलबीर राणा “अडिग”
© सर्वाधिकार सुरक्षित
  
 

डाळे माया


यूँ अंखियों तें कु समझालू
खुलण त
औंशुन टबरान्दा
लगण त
स्वपनिल स्वेणा देख्दा
मनऽकी बोला ना?
कबि तिरवाल कबि ढ़िस्वाल
कबि उकाल कबि उन्दार
अर दिलऽक !
एऽक कप्त्याट्, कब्ळाट्,
होऽर घबग्याट्
यु पराणी
माया बिगेर रे नि सकदी
मथि वाळा
लोभ दिखायीं मोत लुकयीं 
लोभ मायाक सिक्का द्वी पहलु
बिगेर दौं-किल्वाडा बंधियों
मन-पराण, ज्यू-जागा
सबी बंध्याँ
यु अगासमात्री लग्लू दिनप्रिती
म्यार चौं तरफां घेरण लग्युं,
खैरी औन्दी,
हैंसी-हैंसिक जलणम
रुवे-रुवेक हैंसणम्
होर पीड़ाक छैलाऽम्
ये सुख्याँ होंठड़ियों पर
मुल-मूल्याट!
अरे! डाळा तू किले छे
ये बुडापम मायाक पिछ्वाडी पडि्यों
नया बीज ये बण नि जमी त्
कखी ना कखी त जमोण लग्याँ
सुधि छन वोंतें रुवोणु
जोन पिछवाडी मुड़ी नि देखण,
अवाज पच्छ्याणी त
वर्तमान छे भितर बटिन भट्याणु।

१५ मई २०१४
© सर्वाधिकार सुरक्षित
रचना – बलबीर राणा “अडिग”

गुरुवार, 15 मई 2014

यक्ष प्रश्न



जटिल बिडमबनाओं की सय्या सोते,
मनुष्यों को क्या कोई जगायेगा?  

आभा जिसकी कुत्सित पतंगों को जलाये,     
कोई ऐसा दीपक बन पायेगा?

व्यभिचार की काली रातों में, 
आचार प्रकाश कोई फैला पायेगा?
       
फीकी ना पड़े चमक आज इस दल-दल में,  
वसुंधरा गर्व से हीरा क्या कोई निकल आयेगा?

जिससे सोभायमान देश का आँगन हो,
निर्मल नीर भरा कलस कोई सजा पायेगा?

जब नियत सबकी सागर पिने की हो 
फिर कौन प्याऊ कल्याण का लगायेगा?
लाक्क्षा गृह बंद मानवता आज
विदुर मददी भक्त कौन हो पायेगा?

ऐसे अनगिनित यक्ष प्रश्नो के ओज से ,
मायावी ताल जीवन मूर्छित मौन है, 
सत्य वेदी पर बैठा ऐसा
युधिष्ठर आज कौन है?

शकुनियो के इन महासभाओं में
मर्यादा मोहरें हारती रहेगी,  
नीती जब मूक पांडव बन जाये,  
चीर द्रोपदियों की उतरती रहेंगी।  

१४ मई २०१४
रचना:- बलबीर राना “अडिग”
© सर्वाधिकार सुरक्षित


सोमवार, 12 मई 2014

मनत

अर्चना तुझ से भगवन,
मनत में पुरुषार्थ मांगता हूँ।

ठुकराता हूँ खैरात समझी रोटी,
कोडी को भी पसीने से भिगाना चाहता हूँ।

ना मिले सोहरत ना मिले दौलत,
कृष्ण मित्र सुदामा बनना चाहता हूँ।

जब तक मानव मर्यादा इस ह्रदय रहे ,
तब तक ही शांशें जीवन की चाहता हूँ ।

© सर्वाधिकार सुरक्षित
बलबीर राणा "अडिग"