मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

चींथडों में अपनापन

गरबी तू ही अच्छी थी
चींथडों में मेरे अपने
मेरे आगोस में हुआ करते थे
महलों की मखमली चादर
मैंने तेरा क्या बिगाड़ा
जो तु मेरे अपनों को
मुझसे छीन ले गयी।

रचना:-बलबीर राणा "अडिग"

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

दीमकी हमला


अब कोई आशा ही नहीं ?
बचने का रास्ता ही नहीं

सुना था परमाणु हमला
तीन पीढ़ियों को विक्लांग करता
लेकिन ये कौन सा हमला हुवा
जो पूरे युग को विक्लांग कर गया
इतिहास के किसी भी पन्ने पर
ऐसा आहिस्ता दीमकी हमला अंकित नहीं देखा
जो धीरे धीरे कुरेद जड़ नष्ट कर दे
और आने वाली पीडी
जीवन भर दूसरी संस्कृति की वैशाखी पर
चलने को मजबूर हो।

जागो भारत जागो
मत इण्डिया बन कर भागो
हिन्दी बचेगी बचेंगा भारत भी
बचेंगे हम भी।

चिंतन :- बलबीर राणा "अडिग"
© सर्वाधिकार सुरक्षित "अडिग शब्दों का पहरा"
www.balbirrana.blogspot.in

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

"पर" (द्वी घर्यों) वालों का बेलनटाईन डे


जों झुकड़ों प्रेम ज्योत जगी वो रांकाक सारा नि रैन्दा
क्या नाम दिया बेलनटाईन डे अंग्रेज चले गए पूछ थामे हम घिसट रहे हैं । भल मानुसो दिल से सोचो प्रेम प्यार मोहबत माया के लिए कोई घडी समय या दिन चाहिए अगर चाहिए तो वो मानव शरीर ही नहीं हो सकता दानव है या पशु!!  ऐसे प्रेमालाप वाले दिन तो पशुओं या दानवों का आता है । सच कहूँ तो यह दिन " पर " (अनाचार का दोष) वालों का है।  हमारी गढ़वाली में "पर" शब्द को इज्जत पर तीक्ष्ण बाण का घाव माना जाता है अर्थात "पर" उस पर लगता तो द्वी घर्या (दो घरों वाली या वाला) हो जाता है पुरुष हो या महिला।   उसकी औलाद से रिश्ता भी परहेज माना जाता था तो ये दिन पशुवत मनोवृति वाले द्वी घर्या वालों का है जिनके जीवन में प्रेम मात्र एक दिनी होता है । मेरे कटु सत्य को अपने को आधुनिक कहने वाले सहन नहीं कर पाएंगे पर अन्तरात्मा से पूछना जिस दिल में प्रेम की ज्योत जलती है वहां हमेशा अपनत्व का प्रकाश रहता है उसे विशेष दिन की जरुरत नहीं होती । इस दिन का इतिहास जो भी रहा हो लेकिन इसकी भोंडे चलन से यह "पर" वालों का ही दिन लगता है  जो सनातन संस्कृति में अनुचित के साथ औचत्यहीन है।
@ बलबीर राणा अडिग

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

कोटिस प्रणाम


दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी
सुगंध माटी की ललचाती होगी
बंद कमरे में बंद माँ भारती की घुटन
तुमसे सही नहीं जा सकी होगी
आज खुली हवा में सांस लेते देश की
हवा तुम्हें बुलाती होगी।

माटी का कर्ज चुकाया तुमने
अपने स्व को त्याग तुमने
बलिदान दे गए आन बान पर
रंग दे बसंती का चोला पहना तुमने
फांसी के फंदे पर झूलते वक्त
मुस्कराती माँ भारती की तस्बीर देखी होगी
दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी।

शत शत नमन तुम्हें शेर ए हिन्दो
शीश नवा कोटिश प्रणाम
कोटिश प्रणाम
गीत:- बलबीर राणा "अडिग"

प्रकाश आवाज दे रहा है


क्यों मिथ्या भ्रम पाले मित्र
जीवन प्रेम विनोद है
राहें खुली बंद नही
ईश्वर अल्ला भगवान् के बीच का द्वन्द नहीं
अंदर झांको देखो जरा
हर घडी इन्तजार में बैठा है वह
जिसे तलासते फिरते हो
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में
एक ही हाड मांस के पुतले को
कितना अलग देखा तुम्हारी आँखों ने
कब से उसी लाल खून को
काला समझ
बहाते आये
क्या कसूर है उन पंच तत्वों का
उसने एक मूर्ति गड़ी
धर्म जाति की किताब
उसने कभी नहीं पढ़ी
सुनो मुझ अदृश्य प्रकाश की आवाज
जो तुम्हारी आँखों को राहें दिखा रहा
कह रहा हूँ चिल्लाकर
कि!
मैं तुममें से किसी का भी नहीं
मैंने तुम्हें
प्रकृति का सुन्दर विहंगम रूप दिखाया
जो लताओं घटाओं
जीव जीवटताओं को
अपनी गोद में पालती है
और प्यार मुहब्बत का सन्देश देती है
लेकिन !
तुम उसके नियम को तोड़ते चलते गए
खुद के लिए  नफरत फैलाते गए
प्रकृति मेरा आनंद है
जिसका तुमने गाला घोंट मार दिया 
मैं दुःखी हूँ
तुम फिर
कैसे सुखी रह सकते हो।

@ बलबीर राणा "अडिग"

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

चकबंदी और भूमि सुधार के बिना पहाड़ का समुचित विकास असम्भव

     केंद्र सरकार या राज्य सरकार कितने भी विकासोन्मुख योजनाएं चला दे गारंटी के साथ कहता हूँ बिना भूमि सुधार और चकबंदी के उत्तराखंड का रति भर भी वास्तविक विकास नहीं हो पायेगा, हाँ सीधे- साधे गरीबों को पेट पालने हेतु छुट- पुट रोजगार और चकडेतों के लिए भण्डार अवस्य मिल जायेगा। औपनिवेशिक दौर से आज तक हुक्मरानो ने पहाड़ की श्रमसाध्य जनता को खुद के पाँव में खड़ा होने लायक विकल्प नहीं दिए परस्थितिजन्य पहाड़ का आदमी मनिआर्डर अर्थव्यवस्था के सहारे जीवन को संवारने पर जुटा रहा और वास्तविक जमीनी विकास के लिए सरकारों का पहाड़ के प्रति उदासीन रवया रहा है। पृथक उत्तराखंड के बाद उत्तराखंडी सरकारों ने मुख्यमंत्रियों की आवाद तो खूब की परंतु राज्य की जमीन बंजर होने से बचाने में बिफल रही पहाड़ का युवा केवल एक पीडीय सुखद जीवन की चाह में शहरों की और लालायित होता रहा, आलम ये है आज पलायन से बिरान सुन्दर सोम्य प्रकति की गोद में बसे गांव अपनों की पीड़ा से कराहते दिख रहे हैं।
   लम्बे समय से चल रहे विकास की योजनाओं का लाभ धरातल पर नहीं दिख रहा हाँ इतना जरूर हो रहा है सम्बंधित योजनाओं से जुड़े नौकरशाह और नेताओं की पाँचों उंगलिया घी में रहती है और माफियाओं की पौ बारह, इसी परिधि में चल रहे अनियांत्रि विकास योजनाओं के चलते केदार नाथ जैसे प्राकृतिक कोप भाजन का शिकार हर वर्ष राज्य को होना पड़ रहा है।
   विचारणीय बात यह है कि किसानो का खुद खेती के प्रति उदासीन होना और योजनाओं का कागजों में सिमटना क्यों सतत जारी है, कारण पूरी खेती का एक जगह में ना होना है। कृषि बागवानी की चाहे कितने पाठ क्यों ना पढ़ाये जाय और कश्मीर हिमाचल के जैसे होने के हजार सपने दिखाए जाय लेकिन 15 से 20 जगह 5 से 10 किलोमीटर में बिखरी खेती में कैसे काम होगा कैसे नईं वैज्ञानिक तरीके की खैती ईजाद होगी, उत्तराखंड की भूमि में आपार संभावनायें भी है और सामर्थ्य भी, परन्तु! कमी है दृढ़ इच्छा शक्ति सरकार की और हम यहाँ के वाशिंदों की भी, अग़र आज का बेरोजगार युवा चकबंदी पुरोधा श्री गणेश सिंह रावत गरीब जी के जैसे संकल्पित हो तो 16 से 18 घंटे मनसिक टीस देने वाली शहरों की नौकरी में जीवन नहीं खपाना पड़ेगा और मैदानों में 100 गज व् 5 विस्वा जमीन के लिए पूरे जीवन की कमाई भू माफियों के हाथों नहीं लुटानी पड़ेगी।

लेखक:- बलबीर राणा 'अड़िग' (गरीब क्रांति अभियान कार्यकर्त्ता)
ग्राम मटई चमोली

शनिवार, 10 जनवरी 2015

देव देखो खंजर उठाया है


देव क्यों बैठा मौन
देव देख! ये हैं कौन
अपने को तेरे दूत कहने वाले दानवी झुण्ड धरती पर क्यों आया है
देख कैसा त्राहिमाम मचाया है।

राक्षश ये हृदय विहीन
विवेक रहित संवेदन हीन
खंजर की धार पर किस भगवान किस धर्म की पैरवी करने वाले हैं
ये जो मानवता का गाला घोंटने वाले हैं।

बुद्ध ईशा तु पीर पैगम्बर
राम कृष्ण तु धरा अम्बर
अमानुषता की किताब लिखी नहीं तुमने फिर ये पाठ किसने पढ़ाया है
किसने इनको भरमाया है।

विनाश का यह तूफ़ान
हस्ती मिटाने वाला फरमान
धरती तो बची रहेगी, खुद ही खुद को मिटाने का बेड़ा इन्होंने उठाया है
देख जिन्होंने खंजर उठाया है।

रचना:- बलबीर राणा 'अडिग''
© सर्वाधिकार सुरक्षित मेरे ब्लॉग 'अडिग शब्दों का पहरा' में
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