तुझे अपना समझ जी रहा था
नहीं पता था तु पराया समझ निभा रहा है
इबादत लिखने चली जब कलम दिल में तेरे
देख हैरान हूँ परायापन की स्याही पहले से पुती हुयी है।
@ बलबीर राणा "अडिग"
©सर्वाधिकार सुरक्षित
धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
तुझे अपना समझ जी रहा था
नहीं पता था तु पराया समझ निभा रहा है
इबादत लिखने चली जब कलम दिल में तेरे
देख हैरान हूँ परायापन की स्याही पहले से पुती हुयी है।
@ बलबीर राणा "अडिग"
©सर्वाधिकार सुरक्षित
जाने कैसे कटते दिन कैसी गुजरती है रातें
ठिठुरता रोम रोम और क्रन्दन कराती है हवाएँ
तुझसे क्यों खपा होने लगा मैं गिरिवर
रचने वाले ने खिलोने में दी तेरी ये फिजायें।
दूर से जितना मोहक लगता है तू हिम शिखर
तेरा आँगन निर्जीवटता बिष पुष्पों से भरा है
डरता है सजीव जीवन तेरे आशियाने से
इस लिए मंद मूक मुश्कान लिए तु निश्चल खड़ा है।
क्यों नहीं पूछता उन नराधम इन्शानो से
जिन्होंने तुझ ऋषि पर भी हक़ की रेखा खींच दी।
क्या खोएगा क्या पायेगा वो तेरे शैल खंडो से
स्वेत मृत आवरण पर भी जिन्होंने मुठ्ठी भींच दी।
कितनी भी खीज उतार तू शीत बबडंरों के झोंको से
डगमगाउँगा नहीं पला हूँ मैं भी माँ भारती की ढूध् की धार से
क्यों ना कट जाए सर, निकल जाए सांस इस जेहन से
पहरा करेगी रूह अडिग की, घूम घूम तेरी इन चोटियों से।
रचना-: बलबीर राणा 'अडिग'
अरे माँ तु ही तो कहती थी
अले मेरे लsला
ज्यादा उथल पुथल न कल
बहार आने के बाद
खूब नाचना
सलालत करना
हुदंगल मचाना
किलकारियां मारना
कान्हा जैसा होगा तू जरूर
लेकिन!!!
जब आई बारी किल्किलाने की
तो... तो !
किताबों का बोझ
कंप्यूटर इंटरनेट
दुनियां का इन्साइक्लोपिडिया
और ना जाने कितने
बोझ तले
मेरी किलकारियों को दब गयी
धरती में आते ही
डाक्टर, इंजिनियर
और भी
पैंसों की मशीन बनाने की जुगत
होड़ अहम् की
दम्भ की
वाह रे दुनियां
दुनियां वालो
तुम्हारे लालच ने
बचपन आने नहीं दिया
बता माँ
कहाँ है बचपन?
रचना:- बलबीर राणा "अडिग"
© सर्वाधिकार सुरक्षित
पथिक आप दौड़ रहे हैं
संग मेरी आशाएं भी पीछा कर रहीं हैं
आशाएं अपेक्षा को बल दे रही
सपना उन्नत भारत का देख रही
योगी राह में थक ना जाना
मेरी अपेक्षा को उपेक्षित ना होने देना
तुझे मंजिल पर पहुंचना होगा
मुख विरोधियों का बंद करना होगा।
सौभाग्य भारत का अब नहीं सोयेगा
अब ना दुःख की बाट कोई जोयेगा।
@ बलबीर राणा 'अडिग'
आप दौड़ रहे हैं
संग मेरी आशाएं भी पीछा कर रहीं हैं
आशाएं अपेक्षा को बल दे रही
सपना उन्नत भारत का देख रही
योगी राह में थक ना जाना
मेरी अपेक्षा को उपेक्षित ना होने देना
तुझे मंजिल पर पहुंचना होगा
मुख विरोधियों का बंद करना होगा।
सौभाग्य भारत का अब नहीं सोयेगा
अब ना दुःख की बाट कोई नहीं जोयेगा।
@ बलबीर राणा 'अडिग'
माँ
तेरे चुम्बन का अहसास
थपकियों का प्यार
गोदी का सुख
माथे पर काले टीके की
लक्षमण रेखा
टीस उस डंडे की चोट की
जो कुसंगति की राह से अभी भी रोके हुए है
सब कुछ तो है
तेरा मेरे साथ
केवल तेरी काया ही नहीं है
उबरे (किचन) मैं
शीलन भरी लकड़यों के साथ
जूझती तेरी फूक
और आँख के आँशु ही नहीं है
तेरा जीवन के मध्य में जाना
मेरा दुर्भाग्य था
आज तेरी सगोडि
फ़ूलों से लकदक है
सारे फूल तेरा अभिषेक करते हैं
इसी तरह आशीष की
छत्र छाया रखना ।
सगोड़ी=बाटिका
@ बलबीर राणा 'अडिग'
फोटो साभार गूगल