सोमवार, 19 दिसंबर 2016

****माँ माटी और मिशन****


माँ, माटी और मिशन 
यही मेरा धर्म 
शिकवा नहीं
मेरा घर बिलख रहा
उसका घर खिलखिला रहा
माटी के लिए
बलिदान फितरत में थी
बलिदान हो गए
जय हिन्द गाते गाते।



बलबीर राणा 'अडिग'

****** हकदार ******

इस प्रकृति के विभव कोष का 
कौन पुरुष सुख भोगा सकता
चिर काल तक मानस मन पर
केवल प्रजा वरद पुत्र रह सकता
श्रम जिसका मनु हित रचा गया
वही देव सिंहासन हकदार हो सकता ।



शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

कालग्नि


निर्द्वेष हृदय
द्रोहाग्नि का मूल
नहीं हो सकता
ना ही
निर्द्वेष शरीर बृत्ति
लड़ने की
ये कालग्नि लपटें तो
विषैले व्यक्तियों की
सांस से निकलती हैं
जिसकी जद से
मनुष्य युगान्तर से
युद्धरत है।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

माँ माटी और मिशन


****माँ माटी और मिशन****
माँ, माटी और मिशन
यही मेरा धर्म
शिकवा नहीं
मेरा घर बिलख रहा
उसका घर खिलखिला रहा
माटी के लिए
बलिदान फितरत में थी
बलिदान हो गए
जय हिन्द गाते गाते।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

रविवार, 27 नवंबर 2016

अचानक मौसम बदलने लगा


अचानक ये कैसा मौसम बदलने लगा
गर्मी देख शिशिर भी हाथ मलने लगा।

सौ रहे थे जो गड़िड़्यों के ऊपर रजाई औढ़
बिन चदर  पसीने से कागज पिघलने लगा।

कल तक सफ़र सुहाना था, गाडी सौ से ऊपर थी
ये मुआं कहाँ से आया, सौ का भी लाला पड़ने लगा।

चीरी मच गयी ये अचानक कैसी लपटों ने घेर दिया
इस गर्मी से वातानुकूलित तहखना उबलने लगा।

इतनी जल्दी जमीन पर आजाऊँगा सोचा नहीं था
अब तो नोकर भी लाईन में साथ खड़ा होने लगा।

तेरा क्या खाया था तोदी के बच्चे, सबका हिस्सा था
काला समझ बच जायेगा, अब सबका अंत लगने लगा।

अब घोषणा हो चुकी, जनाजा तो निकलना तय ठैरा
बिना भोज के जनाजियों का आना मुश्किल लगने लगा।

चीरी मचना = बहुत दर्द होना

व्यंग by :- बलबीर राणा 'अडिग'

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

हिम्मत के संग चलना होगा।

काँटों की चुभन, सहना आना होगा
फूलों की सेज, संभलना आना होगा
सुख-दुःख का सारथी हिम्मत
हिम्मत के संग चलना होगा।

अँधेरे में कदम बढ़ाना होगा
उजाले में ठहरके देखना होगा
कुछ नया जरुर दिखेगा पथ पर
उस नयें से कुछ समझना होगा
हिम्मत के संग चलना होगा।
कहीं तपती धूप होगी
कहीं ठिठुरती ठंड मिलेगी
कभी अवरोध बनेगी मूसलाधार  
निर्जन सूखे के संग निभाना होगा
हिम्मत के संग चलना होगा।
एक तरफ छूटती ढलान दिखेगी 
सामने टोपी गिराती चढ़ाई होगी
सीधे-सुगम में हौंसले टूटते देखे अकसर 
जोश-होश बंधुओं को मिलाना होगा
हिम्मत के संग चलना होगा।
कडुवा हितेषी पहचानना मुश्किल
मीठा विद्वेषी समझना मुश्किल
गुप-चुप शांत सुखी की पहचान कठिन होगी  
हँसाने वाले दु:खी का हाथ खींचना होगा
हिम्मत के संग चलना होगा।
रचना:- बलबीर राणा ‘अडिग’

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

आवाज लगानी होगी

बर्फ जमी जो संशय की पिघलानी होगी,
एक और धारा गंगा की पश्चिम को बहानी होगी।

जिन्न बन चिपका जो बधिरपन   
सहन की दीवार हिलानी होगी ।

हर घर सड़क और चौबारे से   
मसाल जय भारत की उठानी होगी

बस में नहीं सफ़ेद धोती काले कृत्य ढोलेरे की 
ये लड़ाई हमारी है खुद लड़नी होगी।

बिखंड करते अमन के दुश्मनों को,
ये बात सरद पार जाकर बतानी होगी ।

बाज आ जाओ नापाको छोडो गीदड़ भभकियां


आज एक सुर में आवाज लगानी होगी ।
आवाज लगानी होगी।


@ बलबीर राणा ‘अडिग’