सोमवार, 19 दिसंबर 2016

इन्तजार नयीं सुबह का


ये झुर्रियां और गाल का पिचकापन्न 
देख रहा हूँ जीवन की साँझ ढलती जा रही है

पथरायी आँखे होंठों का बधिरपन
सवाल अनगिनित, तुझ से कर रही है।


माला के दानो में भजता रहा गिनता रहा 
तेरे  मूक को देख अब हिम्मत जबाब दे रही है 

अब कुछ आस जगी उसकी नींद खुल आलस अब भी है 
आने वाले नव भरतवंशी के लिए आस जग रही है

उग रहा एक सुरज भारत में 
काले वालों की काली रात जा रही है

होंठों पर जिसका भारत बंदन 
बीणा के स्वर संग बंदेमातरम गा रही है

इन्तजार है उस एक नयीं सुबह का 
जिसे देख रहा हूँ मैं वह हँसते आ रही है




*****मौसम बदलने लगा*****


अचानक ये कैसा मौसम बदलने लगा
गर्मी देख शिशिर भी हाथ मलने लगा।
सौ रहे थे जो गड़िड़्यों के ऊपर रजाई औढ़
बिन चदर पसीने से कागज पिघलने लगा।
कल तक सफ़र सुहाना था, गाडी सौ से ऊपर थी
ये मुआं कहाँ से आया, सौ का भी लाला पड़ने लगा।
चीरी मच गयी ये अचानक कैसी लपटों ने घेर दिया
इस गर्मी से वातानुकूलित तहखना उबलने लगा।
इतनी जल्दी जमीन पर आजाऊँगा सोचा नहीं था
अब तो नोकर भी लाईन में साथ खड़ा होने लगा।
तेरा क्या खाया था तोदी के बच्चे, सबका हिस्सा था
काला समझ बच जायेगा, अब सबका अंत लगने लगा।
अब घोषणा हो चुकी, जनाजा तो निकलना तय ठैरा
बिना भोज के जनाजियों का आना मुश्किल लगने लगा।

चीरी मचना = बहुत दर्द होना

****माँ माटी और मिशन****


माँ, माटी और मिशन 
यही मेरा धर्म 
शिकवा नहीं
मेरा घर बिलख रहा
उसका घर खिलखिला रहा
माटी के लिए
बलिदान फितरत में थी
बलिदान हो गए
जय हिन्द गाते गाते।



बलबीर राणा 'अडिग'

****** हकदार ******

इस प्रकृति के विभव कोष का 
कौन पुरुष सुख भोगा सकता
चिर काल तक मानस मन पर
केवल प्रजा वरद पुत्र रह सकता
श्रम जिसका मनु हित रचा गया
वही देव सिंहासन हकदार हो सकता ।



शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

कालग्नि


निर्द्वेष हृदय
द्रोहाग्नि का मूल
नहीं हो सकता
ना ही
निर्द्वेष शरीर बृत्ति
लड़ने की
ये कालग्नि लपटें तो
विषैले व्यक्तियों की
सांस से निकलती हैं
जिसकी जद से
मनुष्य युगान्तर से
युद्धरत है।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

माँ माटी और मिशन


****माँ माटी और मिशन****
माँ, माटी और मिशन
यही मेरा धर्म
शिकवा नहीं
मेरा घर बिलख रहा
उसका घर खिलखिला रहा
माटी के लिए
बलिदान फितरत में थी
बलिदान हो गए
जय हिन्द गाते गाते।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

रविवार, 27 नवंबर 2016

अचानक मौसम बदलने लगा


अचानक ये कैसा मौसम बदलने लगा
गर्मी देख शिशिर भी हाथ मलने लगा।

सौ रहे थे जो गड़िड़्यों के ऊपर रजाई औढ़
बिन चदर  पसीने से कागज पिघलने लगा।

कल तक सफ़र सुहाना था, गाडी सौ से ऊपर थी
ये मुआं कहाँ से आया, सौ का भी लाला पड़ने लगा।

चीरी मच गयी ये अचानक कैसी लपटों ने घेर दिया
इस गर्मी से वातानुकूलित तहखना उबलने लगा।

इतनी जल्दी जमीन पर आजाऊँगा सोचा नहीं था
अब तो नोकर भी लाईन में साथ खड़ा होने लगा।

तेरा क्या खाया था तोदी के बच्चे, सबका हिस्सा था
काला समझ बच जायेगा, अब सबका अंत लगने लगा।

अब घोषणा हो चुकी, जनाजा तो निकलना तय ठैरा
बिना भोज के जनाजियों का आना मुश्किल लगने लगा।

चीरी मचना = बहुत दर्द होना

व्यंग by :- बलबीर राणा 'अडिग'