सोमवार, 7 मई 2018

रण नाद

1.
शूरबीर तुम भारत के बढ़ते जावो चढ़ते जावो
रण नाद जय हिंद, जय भारत का करते जावो।

न रुके कदम कभी, न कभी बाहुबल लड़खड़ाये
चहूं ओर भारत क्षितिज पर तिरंगा लहराते जावो।

हौंसले में उमंग हो, उमंग में जतन हो
जतन में बिराम न आये, पौरुष रिपु माथे चढ़ता जाए
हे भारत पुत्र भरतवंशी, रंग बिलग संग चलते जावो
जय घोष जय हिंद, जय भारत का करते जावो।

2.
वार क्राई जय घोष, जब युद्ध मैदान गरजता है
दुश्मन का काल बन, हिन्द का जवान उतरता है।
आदर्श वाक्य रेजिमेंट का, सर माथे हमारा होता है
हुंकार भर रण भूमि में दुश्मन के पग तोड़ता है।

3.
“जय महाकाली  आयो  गोर्खाली” गोरखा बोलता है
“कायर हुनु भन्दा मरनु राम्रो” आदर्श संग खड़ा होता है।

“बोल बद्री  विशाल लाल  की  जय” करके गरजते गढ़वाली
"युद्धाय कृतनिश्चय:" आदर्श से कोई वार न जाता खाली।

“गरुड़ का हूँ बोल प्यारे”  तगड़े गार्ड्स चिल्लाये
“पहला  हमेशा  पहले”  आदर्श से झंडा  लहराये।

“कर्म ही धर्म है” के आदर्श की जब बजेगी मुनादी
“जय बजरंगी बोल”  पवन  पुत्र  की  तरह  कूदते  बिहारी।

जब चल पड़ेगा विजय रथ “शत्रुजीत सर्वदा शक्तिशाली”
हर हर महादेव कर छातों से कूद पड़ता छाताधारी।

“जो बोले निहाल सत श्री काल” गुरु मंत्र  ले रण भूमि पंजाबी उतरते है।
आदर्श “स्थल और जल” पर पताका फहराने का वे जज्बा रखते हैं।


“अडि कोलू अडि कोलू”  की हुंकार भर जब मद्रासी चलता है
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः” आदर्श के लिए समग्र समर्पण करता है।

सर्व धर्म एक ही परिवार के जब ग्रेनेडियर्स जवान फांदता है
“सर्वदा शक्तिशाली, जय हिंद का नारा” चहुँ ओर गूँजता है।

“छत्रपति शिवाजी महाराज की जय” बीर मराठा जब कहता है
आदर्श “कर्तव्य मन साहस” ले रुधिर चाप रण में चढ़ता है।

वीर वे जब  दहाड़ खोले,
“राजा राम चन्द्र की जय” वो बोले
“बीर भोग्या वसुंधरा” का आदर्श ले चल
राजपूताना राईफल के दृग से अरि साहस डोले।

“सर्वत्र विजय” का साहस जिसमें है
भारत के राजपूतों का खून उनमें है
“बजरंगबली की जय” जयकार से
नेस्ता नबूत करने की हिम्मत उसमें है।


“जाट बलवान जय भगवान” का जय घोष जिसका
“संगठन और बीरता” आदर्श शूत्र में विश्वास जाट का।

गुरु मंत्र “बोले निहाल सत श्री अकाल” जय घोष जो गरजते हैं
“निश्चय कर जीत अपनी करूं” वह सिख रेजिमेंट के बरसते हैं
नाम नमक निशान के लिए माँ भारती के शूर मर मिटते हैं
“डेग तेग फतेह” आदर्श संग सिख लाईट इन्फेंट्री के बन्दे होते हैं।

अनन्त पराक्रम की यह धरती
आदर्श जिसका “कर्तव्यम् अनवतमा्” है
“ज्वाला माता की जय” का चीर जो बांधे
वह डोगरा इस भूमि का बहादुर सर्वोतम है।

“पराकर्मो  विजय” का दम्भ से शौर्य गाथा जो लिखता है
“कालिका माता की जय” घोष बीर कुमाऊंनी चिंघाडता है।

“यश सिद्धि” पर विश्वास रखने वाले पराक्रमी हमारी शान हैं
“भारत माता की जय” महार रेजिमेंट का बीर सर्वत्र विद्यमान हैं।

“प्रस्शत रण बीरता” आदर्श, “दुर्गा माता की जय” वे बोले
जैक राईफल के रण बीरों समुख दुश्मन का साहस डोले


“बलिदानम् बीर लक्षणम्” श्री श्रेयकर जो पूजते हैं
“भारत माँ की जय” जय घोष जो करते हैं
काफिरों को जहनुम भेज देते ततक्षण
जब जैक लाईट इन्फेंट्री के बन्दे रण उतरते हैं

आदर्श “स्नो वेरियर और स्नो टाईगर” उतुंग शिखर रणधीर
जय घोष “की की सो सो ल्हरग्यालो” बोलते लादाखी हिमबीर

जिन्न दुश्मन का तब हिल जाता है
“रईनो चार्ज” करते जब आसामी आता है
“आसाम बिक्रम” आदर्श ले जब
हुंकार आसाम रेजिमेंट का बीर भरता है


4.

इन वार क्राई युद्ध घोषों की सह
रिपु दमन कभी बिराम नहीं लेने वाला
आप सुनिश्चिंत रहो देश वासियो
बीरों का तारुण्यताप नहीं गिरने वाला
कटिबद्ध  प्रण है प्राण जब तक देह में
नहीं उखड़ेंगे अडिग के कदम किसी नेह में
अग्नि निर्झरी फूटेगी जिगर के तप्त कुण्डों से
भारत का अभिषेक होता रहेगा दुश्मनों के मुंडों से।

प्रस्तुत रचना भारतीय थल सेना का मुख्य अंग जमीनी लडाई लड़ने वाले इन्फेंट्री रेजिमेंटस (पैदल सेनानगों) को समर्पित है जिनका पौरुष लडाई की आखरी विजय को सुनिश्चित करता है ।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

परिणय गीत


कहा था परिणय गीत लिखने को
संग-संग जीवन संगीत रचने को
मुड़ गयी राह तेरे लोचन संकेतों से
चल दी कलम प्रीत ग्रंथ लिखने को।

देख चमन प्रेम फुहारों का विहार
दो मालियों के दो फूलों का संसार
कितने सुंदर किसलय पंखुड़ियों का
सज्जित गुलमोहर का जीवन हार

अब हो गए दो हृदय एक स्पंदन
मन कर्म वचन की एक जकड़न
जीवन सुरभित अभ्यारण्य में
नहीं कोई चाहत न कहीं भटकन

चलो प्रिये अब प्रेम उषा अर्पण कर दें
यौवन दोफरी निशा को समर्पण कर दें
जब तिमिर आ जाये भटकें नहीं हम
आओ तपिश उच्छ्वासों का तर्पण कर दें।

@ बलबीर राणा "अडिग"

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

बॉर्डर के इस पार उस पार



तीक्ष्ण बाज निगाहें गड़ी हैं सीमा के इस पार उस पार
खूनी पंजो के नीचे तड़फ रहा, समदृष्ट जीवन संसार
एक इन्शान ट्रिगर थामे बैठा सीमा रेखा के इस पार
ठीक वैसा इन्शान वहाँ भी बैठा, बॉर्डर के उस पार
प्रकृति रचना पर किसका हक किसका है व्यापार
किसने खींची बर्बर खूनी रेखा, कौन है वो ठेकेदार।

किसान हल चला रहा, बैल जुते हैं इधर भी उधर भी
चहकते चुल-बुल स्कूल दौड़ रहे, इधर भी उधर भी
श्रम में मग्न मजदूर, जीवन दौड़ इधर भी उधर भी
बिलग नहीं हसरतें जीवंतता की इधर भी उधर भी
कोई बताये कौन सी बात, जिससे है यह प्रतिकार
फिर क्यों हर पल मौत का खौप, बॉर्डर के आर-पार।

कर्म साधना में लीन जिजीविषा दोनों और मस्त मौन है
अचानक गोलों के सोले से, घर उजाड़ने वाला वो कौन है
नित बुझ रहा चिराग किसी घर का, चमन सूना हो रहा
एक तरफ के जनाजे पर, ईद दीवाली का जश्न मन रहा
केवट वो पार लगाने वाला, किसी घर का होगा खेवनहार
क्यों खामोश कबीर जायसी के छंद, बॉर्डर के आर-पार

चली आ रही कल्पों से, इंसानी फनो की विभत्स फुंफकार
अपने अहम के लिए लील गयी, मनुज को मनुज की हुंकार
एक विधि से सजायी विधाता ने, गढ़ा धरती का सौम्य सोपान
बस एक कृतिम रेखा से टूटते रहे, ईशु पीर प्रभु  के अरमान
तस्वीर सजाएं जग माता की, पुष्पहार चढ़ा के देखें एक बार
फिर न उठेंगी  गिद्ध निगाहें "अडिग", बॉर्डर के इस पार उस पार।

रचना: बलबीर राणा "अडिग"




गुरुवार, 8 मार्च 2018

अबला नहीं अब वो सबला है


अर्पण समर्पण सहनशील अडिग चट्टान है
माया ममता की करुण कोमल किसलय है
काष्ठ है वो त्याग की प्रतिमूर्ति पन्नाधाय है
निर्मल नीर से भरा प्रेम सरोवर मीराबाई है
बुलंद हौंसले धीर दृग उतुंग हिमालय रथी भी है
तीक्ष्ण बुद्धि तेज जेट बिमान की सारथी भी है
शक्ति वह जो जल-थल क्या नभ तक अजेय है
मातृ शक्ति का ताप घर से क्षितिज तक तेज है
पूर्ण परताप जीवन पर उसका, धरा है वो जननी है
बात्सल्य की सुनिन्द गोद है गृहस्त जोत संगिनी है
फिर भी स्वार्थी मनुष्य ने युगों से उसे जकड़ के रखा
किसी ने घूँघट में तो किसी ने बुर्के में पकड़ के रखा
पिसती है दिन रात अपनो को तपती रहती चूल्हे पर
घूमती रहती चौक चौबारे क्या ऑफिस के कूल्हे पर
मत भ्रम पालो अब अबला नहीं वो दृढ़ सबला है नारी
जीवन की हर क्रीड़ा स्थली की कुशल कला है नारी
बहुत हो गया अब न पहनाओ धर्म संस्कारों की बेड़ियाँ
अवनी चतुर्वेदी कल्पना सी उड़ना चाहती सभी बेटियां।

रचना:- बलबीर राणा "अडिग"
www.balbirrana.blogspot.in

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

कुर्सी पर चूं नहीं हुई



रहा जीवन सदियों से कुर्सी की दासी
महल अजीर्ण, बाहर भूखी उबासी
जन घिसता रहा पिसता रहा
पर कुर्सी तुझ पर चूं नहीं हुई।

बुद्धि लिखती रही, बेबसी बकती रही
लाचार मरता रहा ईमानदार खपता रहा
बाहर नगाड़े फूट गए बज-बज कर
लेकिन कुर्सी तुझ पर चूं नहीं हुई।

साल बदलते रहे सार बदलता रहा
कुर्सी पर आदम से, आदमी बदलते रहे
तख्त बदलता रहा ताज बदलता रहा
लेकिन तुझ कुर्सी पर चूं नहीं हुई।

वादे होते रहे करार होती रही
कुर्सी के लिए ललकार होती रही
लपका ली गयी कुर्सी उम्मीदें देकर
लपकाते समय कसमकसाई जरूर
लेकिन चूं फिर भी नहीं हुई।

@ बलबीर राणा 'अडिग'

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

सावन का अंधा


   शिव रात्रि के लिए हर परिवार तन मन धन से महीने दो महीने से तैयारी करते थे। मकान की साज सज्जा हो या घर में लूण तेल की व्यवस्था, परिवार के गार्जिन की प्रतिष्ठा मानो शिवरात्रि के त्योहार में सफल मेहमानबाजी पर निर्भर होती थी, क्योंकि शिव रात्रि पर्व पर पूरे बैरासकुण्ड क्षेत्र के हर परिवार में रिस्तेदारों के साथ उनके भी सगे संबधियों का जमवाड़ा होता है। नयें रिश्ते जोड़ना या यूं कहें कि इलाके में नयीं ब्वारी की खोज का पर्व ही शिवरात्रि का मेला था। लड़की या घर परिवार देखना इत्यादि सामाजिक परिवेश पर नयें रिश्तों की  को-करार होती थी। तब हम बच्चों का उल्लास सायद आज की पीढ़ी को मयस्सर नहीं हो पायेगा, गारंटी से कहता हूं। छः महीने से गुच्छी और अंटी (कंची) से पैसे जमा करना, मकान पर पुताई के लिए कमेड़ा (सफेद मिट्टी) और  लाल मिट्टी दूर के गांव से लाना, दरवाजों के लिए गोन्त (गोमूत्र) और चूल्हे की कीर से काला पेंट बनाना, घर आंगन की सफाई, राई पालक की क्यारी को पानी दे झक झक बनाना और मैले में क्या खरीदना और कौन रिश्तेदार आ रहा है और कितने रुपये देगा इस खुशी की संसद ख़्वाले ख़्वाले और स्कूल में चलती थी। शिवरात्रि की अगली रात को  घर में सबसे बड़ा त्योहार होता अर्थात अच्छा खाना हलवा खीर इत्यादि खाने को मिलता था क्योंकि अगले दिन सभी का ब्रत होता था। शिव को फलाहार चढ़ाने तक तो हम बच्चे भी ब्रत रखते थे दाने सयाने शाम को भगवान शिव की डोली मठ से मंदिर आने के बाद ही अन्न जल ग्रहण करते थे। सुबह घर में फलाहार बनता था जिसमें तेडू स्पेशल बेराईटी के साथ पिंडालू (अर्बी), राजमा, मुंगरी और चुवे (मरसों) का बनता था। भगवान शिव को यह फलआहार बिना नमक मशाले के चढ़ता है, शिव को चढ़ने के बाद नमक मशाले से उसे लजीज बनाया जाता हैं जिसके चटकारे लोग कई दिनों तक लेते थे। शिव रात्रि के दिन सुबह से मंदिर में जलाभिषेक के लिए तांता लग जाता है मंदिर के चारों तरफ पंचदेव परिसरों में स्थानीय पंडितों की पीली धोती और लंबे टिका देखते ही बनता था, ऊपर मठ (मुख्य पुजारी निवास)  से मंदिर में बिराजमान सभी देव थानों में पुजारी की आठों पहर पूजा का अपना ही महत्व होता है। परिसर में एक तरफ कीर्तन मंडली जम जाती अगले 24 घंटे के लिए। सिद्ध पीठ बैरासकुण्ड महादेव में शिवरात्रि महातम की सबसे खास बात है अंखड दिपक रखना, अखण्ड दिया निसंतान दम्पत्ति रखते हैं और लोगों का परम विश्वास आज भी है कि अखंड दिया रखने के बाद कोई भी दम्पत्ति आज तक निरास नहीं हुआ। इस प्रक्रिया में स्त्री 24 घंटे तक हाथ में जलता दिया रख तपस्या करती है बिना अन्न जल लिए यहां तक की 24 घंटे तक शरीर की जरूरी प्रक्रिया लघु या दीर्घ संका भी नहीं जाना होता है, मर्द जनानी की कुछ जरूरी मदद करता है जैसे मख्खी हटाना या नाक साफ करना कहीं पर खुजली करना इत्यादि, इस कठिन तपस्या का साहस अपने आप में दृढ़ मातृ शक्ति का द्योतक है। पट्टी मल्ला दशोली अब विकास खंड घाट में स्थित यह शिव स्थली नंदप्रयाग से 17 मील उत्तर में पंचजूनि पर्वत के तल पर लगभग 3 एकड़ समतल मैदान के बीच बना है। स्थान का भौगोलिक और मंदिर के ऐतिहासिक व पौराणिक पहलू को इस संस्मरण में उधृत नहीं कर पा रहा हूँ इस पर पूर्ण साक्ष्य के साथ बैरासकुण्ड महातम नाम से मेरी आने वाली किताब अभी अपूर्ण है शिव कृपा होगी तो एक आध साल में इसे में पाठको तक पहुंचा सकूंगा। हाँ तो मंदिर के विशाल मैदान में दो दिन तक  मंदिर समिति के तत्वाधान में मैला चलता था जो आज भी सतत चलता है मेले में स्थानीय लोगों द्वारा विभिन्न प्रकार की दुकाने लगाई जाती है, जिनमें बच्चों के खिलौने, महिलाओं के शृंगार के सामान और मिठाइयां प्रमुख होती थी। रात को धर्मशालाओं में बुजुर्ग महिलाओं द्वारा जागर बाहर मैदान में युवाओं द्वारा झुमैला चांचडी का अपना ही आनंद होता था, दिन भर मैले में बच्चों का कोतुहल बना रहता था। तब के दौर में हमारे क्षेत्र के लोगों के लिए इस मेले का महत्व वार्षिक उल्लास का था जो वर्तमान में औपचारिक सा प्रतीत होता है । संचार क्रांति के चलते अब मंदिर तक पक्की सड़क हो गयी आधुनिक भौतिक सुख सुविधायें पूर्ण उपलभद्द है अब मेले का स्वरूप भव्य और आधुनिक हो गया है हर वर्ष राज्य की कोई बड़ी हस्ती मेले का उदघाटन करने पहुंच जाते हैं अब मेला तीन दिन तक चलता है रात्रि में राज्य के बड़े कलककरों का द्वारा सांस्कृतिक प्रोग्राम होता है और दिन में जिला स्तरीय खेलों का आयोजन होता है जो कि क्षेत्र की तरक्की और युवाओं के शाररिक और बौद्धिक विकास के लिए शुभ संकेत है। उम्र के 18वें हेमंत में सेना में आने के बाद आज 24 वर्ष तक मेले में न जा पाना अखरता है इए लिये मेरी स्मृति में 80 और 90 के दौर का बैरासकुण्ड मेले का उल्लास आज भी वैसा का वैसा है, कहते हैं सावन के अंधे को हमेशा हरा भरा दिखता है।
@ बलबीर राणा "अडिग"