बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

श्रम शक्ति


 कमी रखता नहीं कोई रह जाती है
राह संभलते भी ठोकर लग जाती है
अवरोध नहीं होता हर कोई प्रस्तर
कंकरी छोटी सी भी रोड़ा बन जाती है।

इम्तहान है जिंदगी का हर एक लम्हां
प्रश्न एक के बाद एक सामने आता है
पन्ने भरने की कोशिश हर कोई करता है
फिर भी कोई पन्ना कोरा ही रह जाता है।

सफर है यह जिंदगी चलती का नाम गाड़ी है
न चाहते हुए भी कुछ अवशिष्ट छूट जाता है
कोशिश करता है हर कोई निशानी छोड़ने की
वाकिया नुक्ता सा भी निशानी मिटा देता है।

रंग मंच है यह जिंदगी खुल के अभिनय करने का है
क्रीड़ा स्थली है यह यहाँ खूब जमके खेलना का है
ऐसा संभव नहीं हर मैच में जीत तेरी ही हो अड़िग
लेकिन  तन मन से श्रम शिल्प नहीं छोड़ने का है।

@ बलबीर राणा "अड़िग"



बुधवार, 15 अगस्त 2018

वतन पहरेदारों की जय बोल



जय बोलो जय हिन्द की वो सबके साझेदार हैं
जय बोलो उन वीरों की जो वतन के पहरेदार हैं

चैन की नींद वतन सौता है जिन बीरों के पहरे में
हर घड़ी के जागरण से भी सिकन नहीं चेहरों में
अमन गीत वो गाते फिरते काष्ठ के उस जीवन में
माँ माटी का तिलक लगाया खाते पीते यौवन में
मोह मात्र, उस क्षितिज की जिसके वे ठेकेदार हैं
जय बोलो उन बीरों की जो वतन के पहरेदार हैं।

देश खुशियों के खातिर जो खून की होली खेलते हैं
सरहद की अग्नि लपटों को सहज सीने पर झेलते हैं
युद्ध समर महायज्ञ में मृत्यु मंत्रों का जाप वो करते
बारूद समिधा की लो में होम अरि मुंडों का धरते
समग्र आहुती देते वे योद्धा तेज जिनकी धार हैं
जय बोलो उन वीरों की जो वतन के पहरेदार हैं।

शीत लहरों की ठिठुरन हो या तपता रेगिस्तान हो
मेघों की बौछारें हो या चीरता बर्फीला तूफान हो
कदम नहीं लखड़ाते जिनके धूल भरी आंधियों मैं
शेर ए हिन्द मस्त मोले रहते हिमखंडी वादियों में
दुर्गम उतुंग हिमालय चौकियों के वे चौकीदार हैं
जय बोलो उन बीरों की जो वतन के पहरेदार हैं।

पुकार त्राहिमाम पर संकट मोचन बन उढ़ आते हैं
अमोघ शास्त्र हैं आफत के झट प्रत्यंचा चढ़ जाते है
निज जीवन अभिलाषा उनकी टंगी रह जाती है
 नहीं पता कब देह इनकी तिरंगे पर लिपट जाती है
माँ भारती के इन तपस्वियों को नमन हजार बार है
जय बोलो उन वीरों की जो वतन के पहरेदार हैं।

रचना : बलबीर राणा "अडिग"

रविवार, 12 अगस्त 2018

उषा किरण


मुश्कान बिखेरती है वह झर-झर
किसलय कलियों के अधरों पर
आहिस्ता दस्तक दे रोशन दान से
चुपके चुम्बन करती कपोलों पर
अलसायी मृणांली देह संकुचाती
स्पर्श उसका आनन उरोजों पर
सरस सुरभि शीतल स्नेह लेकर
आयी है उषा किरण लाली भर कर
चिडया चूं चूं कर भोर वंदन करती
उषा किरण संग उर साधना जुट जाती
कंचन आभा सी चमकती ओश बूंद
दूर्वा शीश बैठ सबको लुभाती।

@ बलबीर राणा "अडिग"

सोमवार, 30 जुलाई 2018

आशाओं की उमंग



कब उजलेगी दिशाएं कब छंटेगा कुहासा
कुचली हुई शिखाओं की कब जगेगी आशा
कोई जरा बता दे ये कैसे हो रहा
धुंधली तिमिर का तम क्यों बढ़ रहा
अपसय की झालर गहरी हो रही
आकंठ झोपडियों टिमटिमाती लो बुझ रही
कौन दाता इस संदीप्ति को सुला रहा
उगते हुए की जड़ जहर सींच रहा।

इस वतन के हित का अंगार मांगता हूँ
सो रही जवानियों में एक ज्वार मांगता हूँ।

बैचैन हैं हवाएं, चहुँ और हुदंगड़ है
सालीन किश्ती को बबंडर का डर है
मँझदार में है केवट ओझल है किनारा
उछलती लहरों के कुहासे में डूबा एक सितारा
नभ अनल ताप भी रह गया अब बेचारा
किस सुत ज्योति पुंज से दूर होगा अँधेरा।

इस दुर्भिक्षण के लिए एक संग्राम मांगता हूँ
धारा पर भारत की फिर वही पहचान चाहता हूँ।

कुचक्र के पहाड़ से अवरुद्ध है गंग धारा
शिथिल है बलपुंज केसरी का वेग सारा
अग्निस्फुलिंग रज  ढेर होने के कगार है
स्वर्ण धरा का यौवन अँधेरे में भटक रहा है
निर्वाक है हिमालय यमुना सहमी हुई है
निस्तब्धता थी निशा, दुपहरी डरी है।

फिर एक विकराल भीमसेन का माँगता हूँ
भ्रष्टाचारियों के जिगर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें कब पुलकित होगी
अरमान आरजू की बरात कब सजित होगी
दुःखीया रातें आशा की किरण खोज रही
विक्रमादित्य की वसुन्धरा कराहने लगी
क्या ब्राह्मण क्या ठाकुर क्या कहार कुर्मी
लक्ष्मी कीचड़ में लिपटी बिलख रही।

गर्त में पड़ी मानवता का उत्थान माँगता हूँ
शासक अभिमन्यु, शिव जैसा तूफान माँगता हूँ।

भर गया है भयंकर भ्रष्ट टॉक्सिन हर रग में
बेचैन है  जिन्दगी  घर घर में
ठहरी हुई साँस को कौन राह दिखायेगा
गरीब घर का दीप कैसे टिमटिमायेगा
लेकिन राजनीति के इन शकुनी पांसों से
निजात मिलना आसान नहीं लगता
असंख्य दुर्योधनों के संग कुरुक्षेत्र में
कटने का संशय कम नहीं लगता।

जन्म वसुधा हित तुझसे वरदान माँगता हूँ
वासुदेव कृष्ण का फिर अंशदान माँगता हूँ।

रचना: बलबीर राणा "अडिग"
माँ वसुंधरा

सोमवार, 7 मई 2018

रण नाद

1.
शूरबीर तुम भारत के बढ़ते जावो चढ़ते जावो
रण नाद जय हिंद, जय भारत का करते जावो।

न रुके कदम कभी, न कभी बाहुबल लड़खड़ाये
चहूं ओर भारत क्षितिज पर तिरंगा लहराते जावो।

हौंसले में उमंग हो, उमंग में जतन हो
जतन में बिराम न आये, पौरुष रिपु माथे चढ़ता जाए
हे भारत पुत्र भरतवंशी, रंग बिलग संग चलते जावो
जय घोष जय हिंद, जय भारत का करते जावो।

2.
वार क्राई जय घोष, जब युद्ध मैदान गरजता है
दुश्मन का काल बन, हिन्द का जवान उतरता है।
आदर्श वाक्य रेजिमेंट का, सर माथे हमारा होता है
हुंकार भर रण भूमि में दुश्मन के पग तोड़ता है।

3.
“जय महाकाली  आयो  गोर्खाली” गोरखा बोलता है
“कायर हुनु भन्दा मरनु राम्रो” आदर्श संग खड़ा होता है।

“बोल बद्री  विशाल लाल  की  जय” करके गरजते गढ़वाली
"युद्धाय कृतनिश्चय:" आदर्श से कोई वार न जाता खाली।

“गरुड़ का हूँ बोल प्यारे”  तगड़े गार्ड्स चिल्लाये
“पहला  हमेशा  पहले”  आदर्श से झंडा  लहराये।

“कर्म ही धर्म है” के आदर्श की जब बजेगी मुनादी
“जय बजरंगी बोल”  पवन  पुत्र  की  तरह  कूदते  बिहारी।

जब चल पड़ेगा विजय रथ “शत्रुजीत सर्वदा शक्तिशाली”
हर हर महादेव कर छातों से कूद पड़ता छाताधारी।

“जो बोले निहाल सत श्री काल” गुरु मंत्र  ले रण भूमि पंजाबी उतरते है।
आदर्श “स्थल और जल” पर पताका फहराने का वे जज्बा रखते हैं।


“अडि कोलू अडि कोलू”  की हुंकार भर जब मद्रासी चलता है
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः” आदर्श के लिए समग्र समर्पण करता है।

सर्व धर्म एक ही परिवार के जब ग्रेनेडियर्स जवान फांदता है
“सर्वदा शक्तिशाली, जय हिंद का नारा” चहुँ ओर गूँजता है।

“छत्रपति शिवाजी महाराज की जय” बीर मराठा जब कहता है
आदर्श “कर्तव्य मन साहस” ले रुधिर चाप रण में चढ़ता है।

वीर वे जब  दहाड़ खोले,
“राजा राम चन्द्र की जय” वो बोले
“बीर भोग्या वसुंधरा” का आदर्श ले चल
राजपूताना राईफल के दृग से अरि साहस डोले।

“सर्वत्र विजय” का साहस जिसमें है
भारत के राजपूतों का खून उनमें है
“बजरंगबली की जय” जयकार से
नेस्ता नबूत करने की हिम्मत उसमें है।


“जाट बलवान जय भगवान” का जय घोष जिसका
“संगठन और बीरता” आदर्श शूत्र में विश्वास जाट का।

गुरु मंत्र “बोले निहाल सत श्री अकाल” जय घोष जो गरजते हैं
“निश्चय कर जीत अपनी करूं” वह सिख रेजिमेंट के बरसते हैं
नाम नमक निशान के लिए माँ भारती के शूर मर मिटते हैं
“डेग तेग फतेह” आदर्श संग सिख लाईट इन्फेंट्री के बन्दे होते हैं।

अनन्त पराक्रम की यह धरती
आदर्श जिसका “कर्तव्यम् अनवतमा्” है
“ज्वाला माता की जय” का चीर जो बांधे
वह डोगरा इस भूमि का बहादुर सर्वोतम है।

“पराकर्मो  विजय” का दम्भ से शौर्य गाथा जो लिखता है
“कालिका माता की जय” घोष बीर कुमाऊंनी चिंघाडता है।

“यश सिद्धि” पर विश्वास रखने वाले पराक्रमी हमारी शान हैं
“भारत माता की जय” महार रेजिमेंट का बीर सर्वत्र विद्यमान हैं।

“प्रस्शत रण बीरता” आदर्श, “दुर्गा माता की जय” वे बोले
जैक राईफल के रण बीरों समुख दुश्मन का साहस डोले


“बलिदानम् बीर लक्षणम्” श्री श्रेयकर जो पूजते हैं
“भारत माँ की जय” जय घोष जो करते हैं
काफिरों को जहनुम भेज देते ततक्षण
जब जैक लाईट इन्फेंट्री के बन्दे रण उतरते हैं

आदर्श “स्नो वेरियर और स्नो टाईगर” उतुंग शिखर रणधीर
जय घोष “की की सो सो ल्हरग्यालो” बोलते लादाखी हिमबीर

जिन्न दुश्मन का तब हिल जाता है
“रईनो चार्ज” करते जब आसामी आता है
“आसाम बिक्रम” आदर्श ले जब
हुंकार आसाम रेजिमेंट का बीर भरता है


4.

इन वार क्राई युद्ध घोषों की सह
रिपु दमन कभी बिराम नहीं लेने वाला
आप सुनिश्चिंत रहो देश वासियो
बीरों का तारुण्यताप नहीं गिरने वाला
कटिबद्ध  प्रण है प्राण जब तक देह में
नहीं उखड़ेंगे अडिग के कदम किसी नेह में
अग्नि निर्झरी फूटेगी जिगर के तप्त कुण्डों से
भारत का अभिषेक होता रहेगा दुश्मनों के मुंडों से।

प्रस्तुत रचना भारतीय थल सेना का मुख्य अंग जमीनी लडाई लड़ने वाले इन्फेंट्री रेजिमेंटस (पैदल सेनानगों) को समर्पित है जिनका पौरुष लडाई की आखरी विजय को सुनिश्चित करता है ।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

परिणय गीत


कहा था परिणय गीत लिखने को
संग-संग जीवन संगीत रचने को
मुड़ गयी राह तेरे लोचन संकेतों से
चल दी कलम प्रीत ग्रंथ लिखने को।

देख चमन प्रेम फुहारों का विहार
दो मालियों के दो फूलों का संसार
कितने सुंदर किसलय पंखुड़ियों का
सज्जित गुलमोहर का जीवन हार

अब हो गए दो हृदय एक स्पंदन
मन कर्म वचन की एक जकड़न
जीवन सुरभित अभ्यारण्य में
नहीं कोई चाहत न कहीं भटकन

चलो प्रिये अब प्रेम उषा अर्पण कर दें
यौवन दोफरी निशा को समर्पण कर दें
जब तिमिर आ जाये भटकें नहीं हम
आओ तपिश उच्छ्वासों का तर्पण कर दें।

@ बलबीर राणा "अडिग"