शनिवार, 11 जनवरी 2020

ढपली वाले कौन हैं तुम


बोलो ढपली वाले कौन हैं तुम
आजाद देश में आजादी
मांगने वाले कौन हो तुम

किसकी तुम ढाल बने हो
किसकी तुम पाल बने हो
हो किसके कवच प्यारो
कौन है अन्दर बतावो यारो
किसके लिए हथियार बने हो
अरे किसके लिए बन रहे हो बम
बोलो ढपली वाले कौन हो तुम

ढूंढो पहचानो उस मदारी को
देश युवावों के जुवारी को
समझो समझाओ उस विचार को
कु बुद्धि विवेक विकार को
फिर टुकडे भारत का करने का
कौन भरा रहा कुकृत्य धम्भ
बोलो ढपली वाले कौन हो तुम

कुतर्क भवनाओं से लूट रहे हैं
किसी बाप के सपने टूट रहे हैं
कैसे जिम्मेवार बनेगा वो भारत का
जिस पर राष्ट्रद्रोही फफोले फूट रहे हैं
कैसी आजादी किसकी आजादी
किसका जाल किसका है भ्रम
बोलो ढपली वाले कौन हो तुम

सिपाही सीमा पर खप रहा है
किसान खेतों में तप रहा है
उद्यमी कर्मों में मगन मूल हैं
व्यापारी व्यापार में मगसूल है
मनुज मनुज धर्म निभा रहा हैं
हर जन कमा के खा रहा है
फ्री खाके उल्टी करने वाले कौन हो तुम
बोलो ढपली वाले कौन हो तुम

नहीं चलेगी तुम्हारी तान
नहीं बजेगा तुम्हारा गान
अखंड भारत है अखंड ही रहेगा
भारत माँ मुकुट यूँ ही सजेगा
नक्शल रहेगा जेहादी
गाते है जो भारत बर्बादी
मुठ्ठीभर कुचले जायेंगे नहीं है गम
बोलो ढपली वाले कौन हो तुम।

@ बलबीर सिंह राणा 'अडिग'


सोमवार, 6 जनवरी 2020

बणाग का खलनायक : चीड़




“नि होन्दू  पिरुळै डांग, नि लगदी यू निर्भागी बणाग”
चीड़ पर नीड़ नहीं  हुआ करते हैं क्योंकि प्रकृति ने अपने आचरण को समझने के लिए इंशानो से ज्यादा समझ  विहगों को दी है उन्हें पता होता है कि चीड के बृक्ष पर हमारे नीड़ों को  संभालने का न सऊर हैं न सामर्थ्य  ना ही समझ, बसंत के बाद इसकी छिछेली पत्तियां भी इसे छोड़कर कुछ दिनों के लिए इसको ठंगरा (ठूंठ) बना देता है इसलिए कोई भी नभचर चीड पर  अपना घौंसला नहीं बनता, क्योंकि उन जातकों को भी पता है एक दिन यह नग्न हो जायेगा और मेरे घर को भी  नग्न कर देगा, और पता नहीं  किस दिशा और देश से क्रूर बाज के पंजे मेरे पौथुलों (चूजों) को दबोच लेगा। अगर बाज की निगाह से बच भी गए तो कुछ दिन बाद इसकी झड़ी हुई पत्तियां क्रुद्ध होकर दवानल के रूप में मेरी संतति को भष्म कर देगा।
  यह दंश केवल पक्षियों का ही नहीं उन तमाम  पशुओं का भी है जिनका अपना भव्य संसार जंगलों में बसता है। मध्य हिमालय के उत्तराखंड में करीब 16 फीसदी भूमि पर अकेले चीड़ के जंगल हैं बन वैज्ञानिकों के अनुसार उत्तराखंड में चीड़ का आविर्भाव अनादि काल से रहा है लेकिन पर्यावरणविदों का एक मत है कि हिमालय के इस भू भाग पर शंकुकार बन तो थे  लेकिन आधुनिक चीड नहीं, उत्तराखंड के स्थानीय लोगों का भी एक मत है कि आधुनिक चीड़ की उत्पत्ति काल औपनिवेश काल है अर्थात इसे १६वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा लाया गया मानते हैं । अंग्रेजों  द्वारा उत्तराखंड अधिपत्य के उतरार्ध में उत्तराखंड की इन सुंदर वादियों  को अपने एशो आराम की गाह बनाने के साथ यहाँ की भौगोलिक संरचना का भी गहरा अध्यन किया और अपने आमोद प्रमोद और विलासिता के साथ  इस  क्षेत्र  को आय के उत्तम साधन के रूप में देखा। यहाँ की जैवविविधता को देखते हुए अंग्रेज यूरोप और अफ्रीका से उन्नत किश्म के चीड़ (पाईन लॉंजिफोलिया, पाईन एक्सेल्सा, तथा पाईन खास्या) को यहां लाये और कम अवधि में मध्य हिमालय के आठ सौ मीटर से 1800 मीटर की ऊंचाई वाले भू भागों में इसे पनपा कर काफी लाभ कमाया। इन चीड़ों के बीज खाने में स्वदिष्ट होते हैं और यह बृक्ष यूकेलिप्टिस की तरह कम समय में फलने फूलने वाला और फायदे वाला होता हैं। औपनिवेशिक काल में पहाड़ की आर्थिकी को मजबूत करने के नाम पर तुरन्त लाभ कमाने के उद्देश्य से लाया गया चीड़ आज पहाड़ की आर्थिकी ही नहीं वरन पूरे मानव जीवन के लिये संकट का कारण बन खड़ा हुआ है। चीड़ के जंगलों में लगने वाली आग प्रतिवर्ष जहाँ करोड़ों रुपए मूल्य की वन सम्पदा नष्ट कर रही है, वहीं इससे पहाड़ के पर्यावरण में भी आमूलचूल परिवर्तन हो रहे हैं जिसमें प्राकृतिक जलस्रोतों का सूखना, आग से तापमान के बड़ने से कई हद तक ग्लेसियरों का पिघलना माना जा रहा है।
उत्तराखंड के जानेमाने पर्यावरणविद मैती आंदोलन प्रेणता श्री कल्याण सिंह रावत जी का कहना है कि अंग्रेज इतने शातिर और चालाक थे कि जब वे चीड़ की इस प्रजाति के बीज यहां लाये तो उनको ये शक था कि ये अनपढ़ गरीब इनके बीज खा देंगे इस लिए उन्होंने चीड़ के बीज के पैकेटों के बाहर से लिख दिया कि इसमें मानव मूत्र मिला है, जिससे ये लोग इन बीजों को नहीं खायेंगे । अंग्रेजों ने युद्ध स्तर पर नर्सरियां बनाकर बन पंचायतों के अधीन चीड़ के जंगलों को फैलाया। कहते हैं चीज एक हो और लाभ अनेक हो तो कौन व्यक्ति उससे लाभ नहीं लेना चाहेगा इसी तरह चीड भी अनेकों आर्थिक लाभ वाला पेड़ है। चीड़ तीखी ढलानों,चट्टानी इलाके,कम मिटटी की परत वाले जगहों, आम तौर पर रुखी जगहों जहाँ तेज़ और सीधी धूप आती हो ऐसी जगहों  पर खूब फलता फूलता है। आर्थिक लिहाज से चीड की लकड़ी मकान, फर्नीचर आदि घरेलु कामों और बड़े उद्योगों के लिए इनके सिल्फर बहुत उपयोगी होते हैं, ब्रिटिश काल में भारत में रेल का पदार्पण हुआ और रेल की पटरियों के लिए चीड़ का बहुत योगदान रहा। चीड़ की कुछ प्रजातियों की लकड़ी काग़ज़ बनाने के काम भी आती है, साथ ही चीड के लीसे से तारपीन का तेल, पेन्ट, वार्निश आदि आर्थिक लाभ की वस्तुओं का निर्माण किया जाता है ।
अब सवाल ये है कि इतने काम का पेड़ क्यों आज पहाड़ों में बनाग्नि के लिए खलनायक के रूप में खड़ा किया जा रहा है, जैसे कि मैं ऊपर उधृत कर चूका हूँ कि अंग्रेजी हुकूमत क्र दौर में व्यावसायिक रूप से चीड़ का बड़े पैमाने पर प्लांटेशन हुआ और देश आजादी के बाद काफी समय तक यह वदस्तूर चलता रहा । पहले प्लांटेशन के साथ-साथ चीड़ को टिंबर के लिए काटा भी जाता था, लेकिन 1981 के बाद एक हजार मीटर ऊँचाई के बाद हर तरह के पेड़ों के काटने पर रोक लगाई गई और आचरण के अनुसार चीड़ ने इसका फायदा उठाया। आज स्थिति ये हो गयी कि यह कुंलैं (चीड़) बांज, बुरांस और देवदार जैसे मिश्रित वनस्पति जंगलों में अपनी पेठ बना चुका है। मेरे देखा देखि पिछले तीस पैंतीस सालों में मेरे अपने गाँव मटई बैरासकुण्ड चमोली में जिस ऊँचाई पर कभी केवल बांज बुरांस हुआ करता था आज वहां कम्प्लीट चीड़ उग गया है, धीरे-धीरे चीड़ ने बाकी प्रजातियों के पेड़ों की जगह लेना शुरू कर दिया है। दुसरा चीड़ का एक अवगुण यह है कि यह अपने आसपास किसी दूसरी प्रजाति के पेड़ को पनपने नहीं देता है। चीड़ को न काटने की वजह इसने चौड़ी पत्ती के जंगलों की जगह छीननी शुरू कर दी, नतीजन आने वाले भविष्य में यह पहाड़ का सोना कहे जाने वाले बांज के अस्तित्व को मिटा देगा इसमें कोई दो राय नहीं है।
अब बात करते हैं कि चीड़ को ही क्यों उत्तराखंड में बंणाग के लिए खलनायक माना जा रहा है जबकि ईमानदारी से देखा जाय तो आग मैन मेड ही होती है तो फिर चीड क्यों दोषी? लेकिन मेरा मानना है चीड इस लिए दोषी है, क्योकि यह आग में घी का काम करता है जिससे एक छोटी चिंगारी भयानक दावानल बन जाती है, अब बौद्धिक वर्ग कहेगा यार वह तो पेड़ है वह कैसे जिम्मेवार है, लेकिन असली झगड़े की जड़ यही कुंलैं है। “नि होन्दू  पिरुळै डांग, नि लगदी यू निर्भागी बणाग ” (नहीं इतनी ज्यादा मात्र में चीड की पत्तियां का ढेर होता ना ही इतनी भंयकर बनाग्नि लगती)। भारतीय वन संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले चीड़ के जंगल से साल भर में छह टन तक पिरुल गिरता है। आग लगने की असलियत यह है कि बहुत कम कारण होते हैं  आदमियों के इन्वोल्ब बिनाआग लगे, अपवाद एक आद कुदरती घटनाओं को छोड़कर आग मनुष्यों द्वारा ही लगाई जाती है चाहे वह जंगल में गुजरते चरवाहों की लापरवाही हो, सड़क चलते आदमी की हो, बच्चों की शरारत हो या ग्रामिणो द्वारा अच्छी घास उगने की एवज में लगाई गई आग, या बन विभाग, आग अनजाने में लगी हो या जानबूझकर इसके लिए मनुष्य ही माध्यम होता है जानवरों के खुरों से आग लगने से रही। फिर सवाल घूमफिर के आता है कि फिर चीड़ कैसे गुनाहगार हुआ तो इस सवाल के जबाब में कुछ जमीनी तथ्य इस प्रकार हैं:-
पहला चीड़ अपने नीचे अन्य किसी वनस्पति को नहीं पनपने देता है चीड़ के जंगल लगभग अकेला चीड़ का  होता है अगर इसके नीचे अन्य वनस्पतियां उगती तो छोटी चिंगारी दावानल नहीं बन सकती।
दूसरा चीड़ की पत्तियां (पिरुल) अन्य पतझड़ वाले पेड़ों की पत्तियों की तरह जल्दी सड़ती नहीं है और इतनी अधिक मात्रा में जमा होती हैं जिससे जमीन के ऊपर एक गहरा आवरण बन जाता है जिससे घास या दूसरी बनस्पति नहीं उगती हरियाली बिना आग फैलना आसान होता है।
तीसरा सड़कों पर गिरे पिरुल पर गाड़ियों के चलने से सड़क के किनारे पिरुल का बुरादा जमा हो जाता है जिसमें मौजूद तेल की मात्रा इसे किसी बारूद सरीखा बना देती है, किसी भी कारण एक बुझी तीली से भी यह भड़क जाता है।
चौथा इससे निकलने वाला लीसा ज्वलनशील होता है जो छोटी आग के लिए बूस्टर का काम करता है और अधिकतर चीड के पेड़ तेलयुक्त होते हैं जिसे स्थानीय भाषा में छिला या छिल्कू कहा जाता है ऐसे पेड़ अगर आग पकड़ते हैं तो लम्बे समय तक जलते रहते हैं और हवा के कारण इसके फिलिंग दूर के जंगल में भी आग लगने का कारण बन जाता है ।
पांचवाँ चीड के जंगल बहुत घने होते हैं ज्यादा घने जंगलों के बीच इनकी मोटाई कम और लम्बाई पूरी होती है फिर लिसा निकालने के लिए पेड़ के निचे तने पर गहरी छिलाई की होती है जिससे पेड़ कमजोर पड़ जता है तेज हवा और तूफ़ान में ऐसे पतले और कमजोर पेड़ बहुत संख्या में टूट जाते हैं आग लगने के बाद ये टूटे हुए पेड़ भयानक दनावल के कारण बनता है ।
अब तथ्य और कारण जितने भी हों लेकिन गुनाहगार के साथ समाधान केवल और केवल मनुष्य है जंगल के वे निरीह प्राणी केवल भाग सकता है या अपनी जान गंवा सकता है। समाधान के लिए मेरा मनना है लाख कठोर नियम और जतन के बाद भी इन्शानो की मिस्टेक को नाकारा नहीं जा सकता इस लिए उत्तम यही है की पहाड़ों के असली स्वरूप को बचाना है तो चीड़ उन्मूलन ही लॉन्ग टर्म विकल्प है, इसके असर के रूप में अभी नहीं लेकिन आने वाले सौ दो सौ साल बाद कोई पीड़ी साधुवाद देगी । पर्यावरणविद कल्याण सिंह रावत “मैती” जी का कहना है अब वे चीड़  मुक्त उत्तराखण्ड के लिए बड़ा जन आन्दोलन और आमरण अनशन करने वाले हैं । प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने कभी कहा था,जब तक आप उत्तराखंड के लोगों को उनका वही जंगल वापस नहीं लौटाएंगे तब तक आग को भी नहीं रोक पाएंगे। आज भी उत्तराखंड में जहां मिश्रित वन (बांज, बुरांस और काफल जैसी प्रजातियों वाले जंगल) हैं उनमें आग की घटनाएं ना के बराबर होती हैं जमीन में छोटी बनस्पतियों के होते आग फैलती नहीं है । बाकी सरकार बनाग्नि मर्दन हेतु जो भी नीतियाँ बनाए आधुनिकरण सयंत्रों और तकनिकी का इस्तेमाल करे लेकिन तत्कालिक  आर्थिक लाभ दूरगामी विनाशक परिणामों पर अब कार्यान्वयन जरुरी है। मेरा तो स्पष्ट मत है कि अब चीड़ उन्मूलन के लिये किसी सरकार के फरमान या नीति का इन्तजार किये बिना उत्तराखण्ड  के जन समुदाय को श्री कल्याण सिंह रावत “मैती” जी के साथ  जन आन्दोलन में शामिल होकर औपनिवेशिक प्रतीक वृक्ष, चीड की समाप्ति और हिमालयी मूल के वनों के हक-हकूक के लिये लड़ना पड़ेगा।

@ बलबीर राणा ‘अडिग’





शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

एक गुमनाम पर्यावरण मित्र



जब प्रकृति वैभव की बात होती है तो तुरंत मानस पटल पर सुखी समृद्ध जीवन का बिम्ब उभरता है और दिखता है उस जहाँ में हँसते गाते कलरव करते जीवों का संसार और जीवन के लिए प्रकृति की साझेदारी। प्रकृति की यह साझेदारी अनुपम अतुल्यनीय अकल्पनीय होती है, जिसका निर्माता सृष्ठीकर्ता है। और वह किस रूप में विद्यमान है यह पृथ्वी के सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य के लिए पृथ्वी पर मनुष्य जीवन के उतरार्ध से शोध का विषय रहा है। मनुष्यों का यह शोध दो धारणाओं पर रहा। पहला वैज्ञानिक शोध और दुसरा धार्मिक मान्यताएं, वैज्ञानिक शोध इसे ब्रह्मांड में विस्फोट से उत्पन्न गैसीय घर्षण जनित मानते हैं जिससे सौरमंडल के सभी ग्रहों की स्थिति निर्धारण की और इसमें पृथ्वी को सबसे सुन्दर उपहार मिला जिसमें सजीव जीवन बसा। जबकि मानव सभ्यताएं और धार्मिक मान्यताएं एक मालिक के रूप में मानती हैं जो मनुष्य आकृति का पुरुष है, इसे ही मनुष्य पारब्रह्म परमेश्वर, भगवान, ईश्वर, अल्ला गॉड आदि ईश्वरीय संवोधन से पुकारते हैं। लेकिन मान्यताएं कुछ भी हो पृथ्वी का यह वैभव मनुष्य जनित तो नहीं है यह निर्धारित है। धरती के इस वैभव में अकल्पनीय आकृतियाँ हैं जिनका  सजीव जीवन के लिए कुछ न कुछ अहम् योगदान है बिना इनके वर्चस्व के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। इन कुदरत की कृतियों के इस आपसी सामंजस्य और संतुलन को ही पृथ्वी पर जिवोपार्जन की धुरी माना गया है। प्रकृति की इन अतुल्य कृतियों में प्रमुख है वनस्पति, वनस्पति है तो हवा पानी है।
     पानी वर्षा से जलवायु  का संतुलन है जिससे पृथ्वी के उस हिस्से का तापमान बना रहता है जिससे हिमखण्ड अस्तित्व में रहते हैं यही हिमप्रदेश तमाम जलस्रोतों का मूल है इन्हीं से सदानीरा नदियाँ निकलती हैं। ये नदियों न हो तो पृथ्वी के सारे जलस्रोत एक दिन में ख़त्म हो जायंगे। सारांश में कहा जाय तो वनस्पति ही पर्यवारण की सेंटर ऑफ़ ग्रेवटी है जिससे जलवायु संतुलन और परिवर्तन संभव हो पाता है और जिससे जीवन के लिए सर्वोपरि चीज अन्न जल उपलब्घ होता है। हाँ प्रकृति की ये  कृतियाँ मानव जनित तो नहीं है लेकिन मनुष्य अपने आविर्भावकाल से इनका क्षरण व विध्वंस जरुर करता आया है। पर्यावरण दोहन का यह क्रम आधुनिक वैज्ञानिक युग में अपने चरम पर पहुँच गया है इसका एक कारण गलफहमी भी हो सकता है क्योंकि विज्ञान ने आज लगभग सभी चीजें कृतिम दे दी। लेकिन हम भूल रहे है कि ये सब क्षणिक हैं बिना प्राकृतिक हवा पानी भोजन के जीवन संभव नहीं है। यही सिलसिला रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पूरी पृथ्वी जीवशून्य हो जाएगी  और  यह जीवरहित अन्य ग्रहों की तरह उसर भूखंड रह जायेगा। प्रकृति पुत्र श्री इन्द्र सिंह बिष्ट जी का कहना है बुबा विज्ञान कति भी नकली चीजें बणे दे पर आखिर पुटुगे आग अन्नाऽळ ही बुझोंण और तीस पणिल, भूख तीस यूं मशीनोन थोड़ी बुझोंण ।
    ऐसा नहीं कि मनुष्य अपने इस कृत्य से अनविज्ञ है लेकिन जानने सुनने के बाद पेड़ पौधों और वनस्पतियों का दोहन करता है। विश्व के तमाम पर्यावरण विद,वैज्ञानिक व बुद्धिजीवी चिरकाल से पृथ्वी को बचाने की मुहीम पर लगे हैं और साथ ही साथ आम जनमानस को भी आगाह करते आये हैं। धरती पर मानव समझ की विडम्बना ही कहेंगे कि सारे लोग आलेख के मुख्य सार प्रकृति संवर्धन पर क्षणिक ही विचार करते हैं और ज्यादा विचार केवल और केवल अपने अन्धाधुनिकरण के लिए होता है, लेकिन कतिपय पुरुष ऐसे भी हैं जो हर क्षण हर घड़ी पर्यावरण संवर्धन के लिए जीते हैं खपते हैं, इन्हीं पुरुषों में एक गुमनाम व्यक्तित्व हैं ग्राम बैरासकुण्ड जिला चमोली उत्तराखंड के श्री इंद्रसिंह बिष्ट जी।
     श्री बिष्ट जी का कृतित्व वैसे कुछ नहीं जो एक आम किसान अपने हित के लिए करता है ऐसा ही मान सकते हैं लेकिन पर्यावरण संरक्षण हेतु उनका ये कार्य किसी प्रेरणा से कम नहीं है । श्री इंद्रसिंह बिष्ट जी उम्र 82 साल है और ये ग्राम बैरासकुण्ड जिला चमोली के वासिंदे हैं, बचपन से आज तक उनका लगाव पेड़ों पोधों और जानवरों से ऐसा रहा कि जब इनकी सेवा में लग जाय तो खाना खाने तक भूल जाते हैं, उनका यह बृक्ष और जीव प्रेम तब और प्रगाड होता गया जब वे  1997 में पी. डब्लू. डी. की सरकारी सेवा से निवृत होकर घर आये। मात भूमि प्रेम की पराकाष्ठा यह रही कि ठीक ठाक आमदनी और परिवार की मंशा के विपरीत पलायनवादी विचार को फटकने नहीं दिया और अपनी मिटटी अपने घर में अपने पैत्रिक कार्य खेती किसानी में जुट गए। इस आलेख का मूल श्री बिष्ट जी का कार्य और एक गुमनाम व्यक्ति को जीवन के रहते उनकी करनी का प्रतिफल प्रेरणा के रुप में आमजन तक पहुँचाना है।
  बात करते हैं श्री इंद्रसिंह बिष्ट जी के कार्य की, तो बताते जाएँ कि उनकी काफी पैत्रिक खेती बैरासकुण्ड गाँव से सटे फराणखिला मोहल्ले के साथ थनाकटे नामक तोक में है और खेती के साथ उनकी काफी जमीन उस समय बंजर थी जिसे गाँव वाले चारागाह के तौर पर इस्तेमाल करते थे, साथ में एक बात मुख्य थी की उस जमीन पर उस समय चीड़ ने अपना साम्राज्य करना शुरू कर दिया था बिष्ट जी ने अपने स्व श्रम से उस जमीन पर पत्थरों की घेरबाड़ की और पूरे चीड के छोटे पोंधों को उखाड़कर वहां बांज, बुरांस और कुछ काफल के पेड़ लगाने शुरू किया और हर दिन अपने खेती के दैनिक कार्यों के चलते कभी दिन भर तो कभी घड़ी दो घड़ी उन पोधों के लिए देते गए और आज 21 साल बाद देखते देखते थानाकटे में लगभग तीन एकड़ से ज्यादा भूमि पर बांज बुंरास मिश्रित बड़ा सघन जंगल बन गया, हर किसी व्यक्ति को देखने के लिए आमंत्रित करते हैं और पेड़ों के साथ ऐसी बतियाते हैं जैसे अपने बच्चों  से, हर पेड़ की जीवनी बताते हैं कब यह सूख रहा था कब इसकी जड़ों पर पग्वोर (मिटटी) लगाया, छंटनी की कब इसकी फांगे झपन्याली होनी शुरू हुई इतना अप्रितम प्रेम आम मनुष्य नहीं किसी पर्यावरण पुत्र में ही देखने को मिलता है।
वैसे उत्तराखण्ड की धरती पूरे विश्व में एक मात्र ऐसी धरती है जहाँ के भूमि पुत्रों ने चिपको और मैती जैसे पर्यावरण संरक्षण मुहिमों के तहत विश्व विरादरी को पर्यावरण संरक्षण की सीख दी।आज जहाँ उत्तराखण्ड में गोरा देवी, सुन्दरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, कल्याण सिंह रावत मैती, विद्यादत्त शर्मा, गणेश सिंह गरीब जी आदि जैसे पर्यावरण हितेषी नामचीन नाम हैं वहीं इंद्रसिंह बिष्ट जी जैसे गुमनाम व्यक्ति हैं जो बिना किसी स्वार्थ के पर्यावरण रक्षा के लिए अपने जीवन को खपा रहे हैं । बताते चलें कि श्री बिष्ट जी के इस जंगल में आज पूरे बैरासकुण्ड ग्रामवासी यदा कदा जरुरत पर अपने मवेशियों के लिए चारा व उनके बिछाने के लिए सूखी पत्तियोँ (सुतर) का इस्तेमाल करते रहते हैं और एक और चमत्कार की बात है कि उस तोक में सूख गया पानी का स्रोत बांज के चलते फिर से उभर गया है, ये बांज की की महिमा है कि जिस धरती पर बांज होगा वहां पानी का सोता और जमीन नमी वाली होती है इसी बांज के परिणीत बाजं के साथ अन्य पेड़ और पादपों का खाना जंगल होता है। लेकिन आज बिडम्बना है कि क्या आम कास्तकार, क्या सरकार बांज के ऊपर ध्यान नहीं दे रही है और प्रकृति के साथ इस रूखेपन से विनाशकारी चीड़ का साम्राज्य चौड़े पत्तों वाले सघन जंगलों में अनवरत होने लग गया है।
     श्री इन्द्रसिंह बिष्ट जी के कार्य के परिणीत कुछ बातें पहाड़ का हरा सोना बांज बृक्ष पर भी की जाय, पर्यावरण, खेती- बाड़ी, समाज व संस्कृति से गहरा ताल्लुक रखने वाला बांज आजीविका का उत्तम साधन तो है ही वहीं पहाड़ी जल स्रोत को बचाने अच्छी वर्षा व भूस्खलन रोकने में सक्षम है। इन बांज के जड़ के पानी का महत्व वहीं जान सकता जिसने पिया हो। इस लेख के माध्यम से नयीं पीड़ी को संदेश देना चाहूंगा कि आगे पहाड़ और गंगा को बचाना है तो बांज का बचना अनिवार्य है चाहे इसके लिए कुछ भी जतन करो। इसी अथाह पर्यावरण प्रेम और अपने स्व सुख के लिए श्री इंद्रसिंह बिष्ट ने अपनी पैत्रिक खेती में यह बांज का जंगल उगाया आज वे स्थानीय युवाओं के लिए प्रेणा श्रोत हैं और गाँव के कई युवा इस प्रेरणा से बांज का संरक्षण कर रहे हैं।
    कहते हैं भावनात्मक लगाव भी एक अंतराल तक होता है बढ़ते वैश्विक परिदृश्य के चलते आज वर्तमान पीढ़ी के लिए ये जंगल ज्यादा लगाव वाले नहीं हैं क्योंकि उनकी आजीविका का वास्ता इन से नही है लेकिन पहाड़ और गंगा के अस्तित्व को बचाने के लिए आपको बांज का संरक्षण करना ही होगा। मध्य हिमालय में 1200 से 3500 मीटर ऊंचाई में समशीतोष्ण वनों की श्रेणी में मध्य हिमालयी क्षेत्र है और यहाँ की जलवायु बांज- बुरांस के मिश्रित जंगल अनुकूल होती है। बांज (ओक) की यहां तीन प्रजातियां है (बांज, तिलोंज/तेलिंग,और खरसू/खैरु) इन प्रजातियों की श्रेणी पहले बांज फिर खैरु फिर तेलिंग खैरु मिक्स जंगल हैं। बात करते हैं पर्यावरण रक्षा और आजीविका की तो मेरा क्षेत्र बैरासकुण्ड मटई और आस पास के सभी गाँव पुश्तेनी से बांज की रक्षा करते आये हैं गांव की खेती के साथ लगे हमारे बांज के जंगल जो हमारे पुरखों द्वारा रोपित और संरक्षित हैं आज भी अपने पूर्ण स्वरूप में झपन्याले (सघन) हैं यह पुश्तेनी धरोहर जहां हमारी आजीविका से जुड़ा है वहीं हमारी आध्यत्मिक श्रद्धा और भावनात्मक लगाव इन पेड़ों से है। क्या मजाल नियम विरुद्ध एक भी वासिन्दा एक सोँली (टहनी) काट दे, इसी दृढ़ संकल्प से हम लोग बिना चौकीदारी के भी अपने इन बांज के पेड़ों को बचाते आये, हमारे in गावों को पहाड़ के इस हरे सोने का लाभ निरंतर मिलता आया है, हमारी ग्राम पंचायत के नियम के अनुसार इस जंगल को तीन से चार खंडो में बांटा गया है एक या दो साल में एक खण्ड की छंटाई होती है उसमें भी कितने फीट की टहनी कटेगी और कितने सुगयटे (बांज के  पत्तों का गट्ठा) व कितने भारे (कच्ची लकड़ी के गठ्ठे ) एक परिवार द्वारा लाया जाएगा इसे पंचायत सुनिश्चित करती है विरुद्ध कार्य करने वाले व्यक्ति को दंडित किया जाता है इससे साल में दो से तीन महीने सम्पूर्ण गांव के मवेशियों के लिए पूर्ण चारा और वर्ष भर के लिए ईंधन (लकड़ी) मिल जाती है साथ ही हर वर्ष पतझड़ में बांज की सुखी पत्तियों (सुतर) के लिए भी यहीं नियम होता है व पर्याप्त मात्रा में मवेशियों के नीचे बिछाने के लिए सुतर मिल जाता है जिससे उत्तम कम्पोस्ट खाद बनती है।
     अपने इस लेख के माध्यम से  पर्यावरण सम्बंधित उत्तराखंड और भारत सरकार के सभी विभागों के आला  अधिकारियों और राजनीती क्षेत्र के नेताओं से अपील करता हूँ कि हिमालय अस्तित्व की जड़ बांज संरक्षण के लिए हुए कामो को देखने के लिए हमारे बैरासकुण्ड क्षेत्र में जाएँ और क्षेत्र के साथ उस अकेले 82 वर्षीय प्रकृति पुत्र इन्द्रसिंह बिष्ट जी द्वारा निर्मित बांज के जंगल को देखें फिर आपके विवेक में जो उचित सम्मान लगे उन्हें दिया जाय ताकि आने वाली पीड़ी को प्रेणा मिल सके और चीड़ के विनाशकारी परिणामों के चलते बांज के साथ पर्यावरण को बचाया जा सके।

आलेख : बलबीर सिंह राणा ‘अडिग’
ग्राम मटई ग्वाड़ जिला चमोली उत्तराखण्ड
संपर्क : 9871469312 

गुरुवार, 28 नवंबर 2019

विनय गीत



मन से अर्पण दिल से समर्पण
एक ही सीरत सूरत का दर्पण
ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन

समझ की पटरी सामर्थ्य की गाड़ी
चलेंगे संग संग, न अगाड़ी पिछाड़ी
हंसते गाते पथ पूरा करेंगे
प्रेम गंतव्य पर चला करेंगे
तज देंगे उस दुनियां को
जहाँ होता हो भावनाओं का मर्दन

ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन

जब चुभे जो कंटक तेरे पग में
तब दर्द उभरे मेरे पगों  में
कारा चुभे जब आँखों में मेरी
अश्क बहे तब नैनों से तेरी
प्रीत रश्मि से अंतस उजियारा हो
हो तपिस उच्छवासों का समर्थन

ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन


लिखेंगे परिणय का हर एक पन्ना
अधूरी न रहे कामायनी तमन्ना
सींचेंगे गृहस्थ की, कुसुम क्यारी
बनकर मैं घन, तु पावस न्यारी
जीवन गोधूलि बेला तक
प्रेम वन्धन की संभाल संवर्धन

ऐसा निश्छल प्रणय हो प्रिये
हो जो कर्म मेरा, हो वह तेरा अर्जन ।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

शनिवार, 16 नवंबर 2019

--||---एक अंतर्द्वंद---||--


ओ चिन्मय प्रकृति
अपने बहकावे में ले ले
ताकि अकेले दौड़ता रहूँ
कभी खुद से ही आगे
कभी खुद से ही पीछे
स्वयं से प्रथम और अंतिम
अकेला जीतूँगा
अकेले से ही हारूँगा
ना कोई प्रतिस्पर्धा
नहीं किसी का प्रतिरोध
प्रतिभागी, प्रतियोगी होने का
भय संशय कुछ नहीं
जय विजय का द्वंद नहीं
चेतना में एक नाद निकले
अनहद गरजै और
जीवन तेरे चिन्मय के साथ
चिरकाल वासी हो जाय
लेकिन क्या मेरे अंतर्द्वंद यह
सम्भव है?

@ बलबीर राणा 'अड़िग'


मंगलवार, 12 नवंबर 2019

रक्षा का ध्रुव प्रमाण




जय के लिए जीवन देते हैं
विजय के लिए देते हैं प्राण
प्राण को प्रण सम्मुख रखने वाले
राष्ट्र रक्षा के हैं ध्रुव प्रमाण
धन्य है, वह माता जिसने जने पूत महान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

मृत्यु का कोई भय नहीं है
खपने का संशय नहीं है
बुझने का डर नहीं सताता
अगर मगर मन में नहीं आता
चिराग ये वेखौप जलते हैं
बर्फ पावश हो या तूफान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

न कभी माया ने रिझाया
न कभी ममता ने डिगाया
बहने न दिया अश्कों से पानी
बिकल न होने दी तरुण जवानी
कर्मवेदी पर निर्भीक अड़िग ये
निःसंकोच निकलते हथेली रखके जान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

कराल कष्टों को साध्य वे करते
भू विविधता को वाध्य वे करते
त्याग तप सब विवश हो जाते
वियोग वैराग्य नतमस्तक हो जाते
क्षोभ ग्लानि जिनके निकट न फटके
मांगा है मिट्टी से, मृन्तुंजय वरदान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

कृतज्ञ हैं उस मनोबल का
शस्त्र से सशक्त आत्मबल का
होके जिजीविषा के हजार विकार
कभी न किया कर्तव्यपथ का प्रतिकार
अर्पण समर्पण को, नमन है वीरो
तुम्ही ही हो हर कठिन कष्टों का निधान
पुनीत तिरंगे की शान, भारत के वीर जवान।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

रविवार, 3 नवंबर 2019

असली मोगली



कार्टून का मोगली नहीं
असली जीवन का मोगली है
गाँवों का बचपन
चेहरों पर हंसी ही नहीं
अंदर से भी ठहाका है
निर्भीक अभयारण्य
प्रकृति वैभव में
कूदते हैं फांदते है
छलांगे लगाते है
क्योंकि ये अभी
विकास की जद में
नहीं आये
जद में आते ही
बन जाएंगे ये भी
बस्तों के नीचे दबे
रिमोट से उछलने
वाले बेबी।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'