सोमवार, 3 मई 2021

मातृभाषा अभियान में प्रथम पंक्ति के संगेर थे श्री हरीश ममगांई जी

 



    करोनाकाल चल रहा है। चल क्या आँख मुँह बन्द कर भाग रहा है। आंधी चल रही है। और बबडंर चक्रवात में इन्सानी जान त्राहीमाम कर रही है। दो हजार बीस को लोग ट्वेंटी ट्वेंटी कह अशुभ मान रहे थे कि येन अध्या पध्या कने च। लेकिन इक्कीस तो बीस का भी बाप निकला। पिछले साल करोना जिस धीमी रफ्तार से भारत में आया उसी धीमी रफ्तार से जाने के उपक्रम में आ चुका था। देश ने स्वदेशी वेक्सीन भी र्निमत कर दी थी जनता आस्वस्त हो गई कि अब बच जायेंगे। पिछले साल खोये अपनो की यादें धुंधली होने के साथ नये साल में जख्म भरने के रुप में देखा जाने लगा था। अपनों का खो जाने का जख्म, बिजनिस बाड़ी रोजी रोटी का जख्म देश की अर्थ व्यवस्था का जख्म, टूट चुके आस को जगाने का वक्त देखा जाने लगा। सब जख्मों को भरने की उम्मीद से आम जन ने कमर क्या कसी र्निभीक हो गई और इस अदृश्य  काल ने मौका ना चुकाते हुए  झपट पड़ा और एक तरफ से। लपेटता झपेटता जा रहा है छोटे बड़े जवान बृद्ध जो सामने आ रहा है चटकाता जा रहा हैं। महामरी हाँ घोर महामारी। अन्य कालों में भी फैली थी बल महामारियां पर अहसास नहीं था। ऐ अपड़ी ब्वै का यनु भयाक्रांत ऐसास दुश्मन तैं कि ना हुयां। सारे जतन धरे के धरे रह गये ढाई पाई ऐन मौके पर व्यर्थ। लाखों पाई भी जान नहीं वख्स रही है। कब किसका नम्बर लग जाये पता नहीं। हे राम कौन दोषी। सिस्टम या समाज।पर समय दोषारोपण का समय नहीं सम्भलने का है और वो भी एक दूसरे का हाथ पकड़कर। धाद सहित देश की कई संस्थायें और महामानव दिन रात खुद की परवाह किये दूसरे की जान बचाने की मुहिम में लगे हैं। ऐसे लोगों की बदौलत ही  अभी तक धरती टिकी है नही तो आपदा को अवसर देख बटोरने वाले हैवानो के चलते परलय निश्चित है ।

            इसी महाप्रलय करोना महामारी के चलते कुछ दिन पहले हमने भी खोया है एक साथी को। अजीज को। धाद मातृभाषा और गढ़वाली साहित्य का संगेर श्री हरीश ममगांई जी को। पूरा धाद परिवार स्तभ्ध है। पर होनी को कौन टाल सकता। होनी निश्चित है और जतन अनिश्चित। ये वर्तमान समय बता रहा है । जतन का मौका ही नहीं दे रहा है। बल ब्याली त बात ह्वे छै अर ब्याली चलग्यां। 

            फरवरी दो हजार बीस से मैं देख रहा था कि हर दिन हरीश भैजी सबसे आगे लग कर धाद मातृभाषा ग्रुप की सांग ग्रुप एडमिन श्री गरीश पंत मृणल जी के साथ पूरे सार्मथ्य से तड़तड़ी कमर से उठाये चल रहे थे। हम लोग समयानुसार कभी कभार बोक (किनारा) भी लग जाते हैं पर हरीश भैजी कभी नहीं। ग्रुप में लगभग सभी नोकरी पेशे से हैं समय की वाध्यता हर किसी के पास होती है पर हरीश ममगांई जी का हिगनत्यार (सर्मपण) ऐसा कि हर कविता लेख पर अपनी उचित प्रतिक्रिया जरुर देते थे। उनकी इसी प्रतिबद्धता से आज सभी साहित्यकारों स्तभ्ध हैं। शोक में हैं। काणा त्वे क्या चैणा द्वी आँखा साणा। ऐसे ही हर लिख्वार को प्रतिक्रिया रुप में साणी आँखी दे जाते थे।

            श्री ममगांई गढ़वाली के उम्दा गजलकार तो थे ही साथ ही उनकी पकड़ हिन्दी कविता संस्मरण और कहानियों पर भी अच्छी थी। साहित्य परख भाषायी ज्ञान की गहराई व विवेचना आपकी पहचान थी। और ये सब होने के साथ वे एक वेहतर पाठक थे लर्नर थे, जिज्ञासु बाल चित वालेे। वर्तमान मा दिख्येणु च कि लिखणु त भौत छन पर पढ़ेणु नि, हरीश भैजिक पाढ़ाकु आदत वूं कि रचनों मा साफ दिख्येन्दी। जीवन में लर्नर एटीटयूड लाना हर किसी के बस का नहीं साब। आम इन्सान में देखा जाता कि एक आध सीड़ी कामयाबी के बाद वह खुद को सम्पूर्ण घोषित कर लेते हैं। जबकि धरती पर मानव इतिहास बताता है कि धरा पर कोई व्यक्ति सत गुण सम्पूर्ण नहीं हुआ। पिछले कुछ महिनों से मंमगांई जी अनुवाद पर लगे थें और अनुवाद की परिपक्वता ऐसे कि जैसे अनुवाद ही उनका सृजन होगा।      

ममगांई जी का सानिध्य मुझे धाद मातृभाषा ग्रुप से ही मिला उससे पहले मैं भैजी को जनता नहीं था। दो हजार बीस के लोकडाउन से धाद से ही आभासी दोस्ती हुई, दोस्ती क्या हुई कुछ दिनों में ही अजीज बन गये। क्या रुलाने के लिए ही आप इतने कम समय में अजीज बने ? सायद हाँ। गलवान संघर्ष के दौरान जब में अरुणाचल तवांग बोर्डर पर तैनात था और काफी दिनों से नेटवर्क से दूर रहा तब नेटवर्क में आने पर देखा निजी परिजनों के साथ हरीश भैजी के भी मिस काॅल व मैसेज मिला। कि राणा जी कख छै पोस्टिंग, अजक्याल भौत दिनो बटिन दिखेणा नि सब असल कुसल। उस प्रतिकूल परिस्थित में इस आपार स्नेह को कैसे भूल सकता हूँ। यदा कदा कहीं पर संसय होने से मैं उनके पास चला जाता था छुवीं लगाने यानि फोन पर। छुवीं मातृ भाषा की अपने पहाड़ की और गढ़वाली साहित्य की। वे कहते थे राणा जी आप लोगों से ही सीख रहा हूँ जबकि कौन नहीं जानता हैं कि आप हमारे सृजन र्निणायक थे। गुरु थे। चाहे पद्य हो या गद्य।

            इस अप्रेल 21 के पहले सप्ताह में हमनें फिर दाध मातृभाषा अभियान ग्रुप में काव्य प्रतियोगिता रखने का प्लान रखा जिसमें आपने डियूटी पर व्यस्त रहूँगा की बात कही थी फिर भी साथ पूरा निभाने का भरोसा दिया था और मृणाल जी को हंडरेड नहीं हंडरेड फिफ्टी परसेन्ट यकीन था कि हम मैजूद हो पायेंगे कि नहीं आप जरुर मैजुद रहेंगे। अब मृणाल जी भी एक तरफ से निहत्थे हो गये। सायद अप्रेल दूसरे हप्ते तक ममगांई जी दिखे थे फिर वे ग्रुप में नजर नहीं आये । 20-22 अप्रेल के आस पास एक दिन मैने ग्रुप में संदेश भी प्रेसित किया था लेकिन उनका कोई प्रतिउत्तर नहीं आया कामेश भाई गांव जाने की आशंका जता रहे थे लेकिन मि जाण करोना वूं तैं दिव्यलोक मा ल्यी जाणू तैयार कनू रै। उसी दौरान एक रात दस बजे फोन भी  लगाया था पर उत्तर नहीं मिला मन कुछ आशंकित हो रहा था। और एक मई को ग्रुप में मिले सन्देश ने स्तभ्ध कर दिया। कमर टुटग्ये।

            कितनी बारिकी से वे हर रचना की परख और मुल्यांकन करते थे। जब पिछले साल ग्रुप में गढ़वाली छंद बध काव्यशाला के तहत  प्रतियोगिता होती रही थी तो हरीश भैजी पहले ग्रुप में छंद विधान से संबन्धित तमाम प्रकार की जानकरी साझा करते थे कि किस प्रकार से कौन छंद लिखा जाता है उस छंद का मापदंड क्या है मात्रा भार क्या होना चाहिए आदि आदि। फिर मुल्यांकन पर एक एक पंक्ति और मात्रा को गिनते हुए हर प्रतिभागी को उसकी कमी बताते थे। ता ब्वाला अगला भै कु यतनु सर्मपण अपणी भाषा का पैथर जन कि बल्द बेची रितो हुयूं ह्वलु। मि स्वचदू छै कि यीं मनखी घौर बार नि छ जु इत्गा टेम होणु। पर जुनूनी मनखी तैं समै कमि नि होन्दी बल।

            मातृभाषा अभियान तैं इनु संगेर नि मिललू। सांग उठाने वाले हम सब हैं पर आप जैसा नहीं क्योंकि अपनी अडिग बात बोलुं तों हर इन्सान कहीं ना कहीं आत्ममुग्द होता है पर आपके चेहरे पर ये छव्या (झाई) मुझे तो कभी नजर नहीं आई । जितनी भारी और गहरी आवाज उतना धीर गंभीर चरित्र। किसी बात पर भी उतावलापन नहीं। शालीनता और धैर्य की प्रतिमूर्ति। आज जहां हमारी गढ़वाली भाषा ने अपना योग्य सृजक खोया वहीं आपके परिवार और आपके विभाग को आपके रुप में हुई क्षति की भरपाई मुष्किल है। भगवान आपके परिवार को इस महा दुःख सहने की शक्ति और आपको अपने दिव्य लोक में यथोंचित स्थान प्रदान करे।

            श्री हरीश भैजी से मिलने का मौका नहीं मिला क्योंकि पिछले साल से मिलना अभिषाप हो रखा हैं। साहित्य सेवियों का मिलन साहित्य संगोष्ठियों में ही होता है जो पिछले वर्ष से वेवनारों पर ही चल रहा है। और मैं ठैरा वेबनार रहित मनखी इस लिए एक आद विडयो काॅल के अलावा र्वच्वल मिलन भी नहीं हुआ।

            यह आंधी आप जैसे कतिपय स्वजनो को उड़ा ले गयी और आगे क्या होगा राम जाने। अल्प समय में जितने अनुभव आपसे मिले और आपको जान पाया उतनी बातें आलेख में लिखना संभव नहीं हो पा रहा है, क्येंकि बार बार गला भी रुंध रहा हैं और आँखें पसीज रही है। मैं अतिभावुक होना नहीं दर्शाना चहता हूँ क्योकि मेरा फिल्ड मुझे भावुकता की इजाजत नहीं देता है। खैर सैनिक होने के साथ मैं आम नागरिक भी हूँ इसलिए भावुक होना लजमी है। दिल से श्रधेय ममगांई जी की सदगी को सल्यूट करता हूँ। हर बात को इम्तीनान से सुनते थे और अधिकतर प्रतिउत्तर में सहमति ही जताते थे। सबके साथ सामंजस्य बैठाना आप से सिखने को मिला और मिला हर चीज वस्तु का सम्मान करना, धैर्य रखना।  

            धाद मातृभाषा अभियान के एडमिन श्री गिरीश पंत मृणाल जी के साथ अपना यथा संभव सहयोग जताते हुए श्री ममगांई जी के सृजन को एकत्रित कर पुष्तक रुप में लाने के लिए अपनी वचन बद्धता व्यक्त करता हूँ और धाद के अन्य साधकों से भी सहयोग की अपील करता हूँ। यह एक साहित्यकार के लिए सच्ची श्रृद्धांजली होगी और हम भाषा प्रेमियों का कर्तव्य । अपणु किंचक प्रयास से यीं श्रद्धान्जली स्मारिका कु कैर अफूं तैं तस्सली देणु कि वा देवआत्मा कखि ना कखि बटिन जरुर द्यखली अर आश्रीवाद द्येली। पैली श्रदेध छाँ अब प्रथम पुज्यनीय ह्वेग्यां किलै कि वा अब पितर बणग्यां।

आखिर मा गढ़वळि साहित्य का यीं सिपै तैं वूं कि द्वी रचना आखिर जात्रा अर प्राण (मरण विषै) से याद करि अपणी श्राद्धान्जली देन्दू।

 

@ बलबीर राणा अडिग

 

आखरी जात्रा

1.

जूनी जलूड़ी त आज तलक कैन नि खाई

सूना पलंग मा से ह्वा या बुगचा बण्युं रै उमर भर

एक दिन सब छोड़ी छाड़ि आखिरी जात्रा का

बाटा लग जाण

एक दिन तय च जब आखिरी संदेश जालु

भै. भयातए ओर. पोराए रिस्तादारए अर दगड़या. सगड़या होला कठ्ठा

तांतु लग जालु वूंकु भी जौं खाडकरों तैं जिंदा मा

द्वी छुईं भी गाड़णु कु बगत त बिल्कुल हराम

पर जिकुड़ी मा टोम करणा खुणि हत्यार पळ्यौणौ खूब छौ।

2.

अपरी ठसक अर ठंगट्याट लेकि मड़घाट आला कना कना

अर वख भी अपरी चपराट से बाज नि आला

मड़घाट मा द्वी तरों का मनखि ह्वे जांदन जरा हेरा

एक विशेषाधिकार युक्त जौंमु सांस कु अर जिकुड़ी की धकधक कु परमिट बाकी रंदु

हैका वु जु टुप्प सांग पर पोड़ि पोड़ि सब्युं कु तमासु देखदन

मिजाण हैंसदा भी होला गात से भैर हवा का रूप मा

अर खरोळदा होला जिन्दों का जिकुड़ी का भैर. भितर ।

3.

अडिंठा वु देखला कु नकन्याट करणु च अर कैकी निरक डबळाट च

वु ई भी देखला कि क्वी त बानु बणैकि वख बटि भी ठसकणा छन

कुछ कोणों मा गुणमुण गुणमुण चार पुश्तों की योजना बणाणा छन

बल हमुन अब तलक यु तीर मारयालि अर ऐथर हौर धमाकु करला

माथि मजिस्ट्रेट झणि क्या आदेश जारी ह्वा करणु अपरी कलम से।

4.

दगड़योंए पाणि पिलौण त ल्वोटा माए मटयाळा मा नि

वु सब्युं कु बुबा भी बुल्दु बल प्रेम का द्वी फूल

पाती भी वे खुण बिजयाँ छन

मड़घाट मा आखिरी जात्रा मा सब कुछ

देखणो कु मिलदु

नि मिलदि कुछ त वु च द्वि सच्चा आंसुओं का दगड़ ष् मौन विदाई ष्।

 

प्राण (मालिनी छंद मा)

कसम वसम खावाए चा नि खावा हमारी ।

हम त मर गयां रेए जान ह्वेगी तुमारी ।

सुरुक सुरुक बैरीए प्राण ली ग्ये चुरैकी ।

सरम वरम भी ख्वैए ह्वे अदानो भिखारी ।।

 

हरक फरक मायाए से कु होंदों कु चांदो ।

जख जख ठग चांदोए वो दिलों तैं मिसांदो ।

जनम मरण से भीए माथि प्रेमी कु बाटो ।

कतर कतर ह्वे जौए वो खुट्टी नी उठांदो ।।

 

रचना :  हरीश ममगांई

 

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

इस्कोल : चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

 



        इस्कोल मा वार्षिकोउत्सो  छायी। मि बि न्यूतयूं छै। हेड मास्टर जी लड़ीक जै कि उमर आठेक साल रै ह्वली वे खुणि बड़ा लाड़न गुलाबरै नुमेस कु चानफुर्या बौड़ जनु दिखै जयेणु छै। नोनु मुख पिंगलु आखाँ स्यता। कराळी नजर। मुंड खाड़। मुखड़ी चळकाट गैब। बल पढ़ण मा सबसि हुस्यार। बल हेड मास्टर अर इस्कोले माथसमपुर्सी औनार वा बाळो। बाळा तैं सर्रा बरमांडा सवाल पुच्छयेण लगिन अर वा सवालौं तडतड़ाट करि जबाबा देन्दू, तोता माफिक। धर्मक दस लक्षण अर नों रसोंक उदारण बतै गयूं। पाणी तौल माछों ज्यून्दा रैणु राज बिंगे गयूं। जून पर छाप अर गरण कु विज्ञान समझे गयूं।  अभौ कन सुबगत बणी सकदू अर सुबगत कने अभौ, दिस्टान्त सास्तर सुणे गयूं। इंग्लैडा आठवां राजा हेनरी राणी नौं अर पेशवों कुर्सीनामा तक सुणे गयूं। सब्बी सवालों  टकटको जबाब।

    नोना उत्तरन मास्टरां भितर खुस्सी लड्डू छाँ फुटणा। आखिर मा बाळा तैं पूछेग्यों कि बाबा तु भबिस्या मा क्या बणण चान्दू। बाळान मुंड मा बिठै बिठयूं जबाबा दिनी, बल लोकसेवा। सभा तड़ तड़ तड़ ताळी बजाण लगिन। तैकु मास्टर बुबा मने-मन अगास मा छै उड़णु।

    बुढ़या अध्यक्ष साबन नोना मुंड मा हाथ धैरी आश्रीवाद  दिनी। ब्वोल ब्यटा इनाम मा जु त्वे चैणु मांग,  वीं चीज द्यूला। मांग ब्यटा मांग ।

    नोनु स्वचण लगिन। बुबा अर होर मास्टर चिन्ता मा ऐग्ये कि पता नि यु क्व क्या पढ़ण वळी चीज किताब सिताब मंगलु। बाळा मुख फर ना ना परकारा रंग औण जाण लगिन। चळविचळ। तै का भितरे बनोटी अर वास्तविक भावों लड़ै आँख्यूं मा दिख्योण लगिन। वा जर्रा सी खम्म खांसी, गोळ साफ करि। नकली परदा हटिन। अर तेन सौजि बोलि। लड्डू। 

    तैकु बुबा अर हौर मास्टर हकदक। अबारी तलक मेरी बि जु सास अटकी छै मिन बि सुखै सास ल्येनी। तौं सब्यून बाळा मने बबर्राट अर ज्यू चपळाट सर्रा पृथिक तौळ चिपाड़ण मा क्वे कमी नि छोड़ी छै पर आखिर मा बाळु बची ग्ये। बाळा मन अर ज्यू मा बचणे पूरी आसा रैन्दी पर हम छाँ कि तै बचण नि देणा। बस्ता किताब कंपुटर इन्टरनेट अर पता नि क्या क्या चीजन तै चिपाड़ी बणें देणा वी तैं कमांड पर चलणु वळु रोबोट, मशीन।

            लड्डू हर्या भर्यां ज्यूना डाळा लपलपा पात छ। जु सुरसुर्या बथों ससर्राट मा छुस्स छुस्स मजाक कर्दा हैंसदा, ना कि मोर्यां काठे अलमारी डवारों जन च्यूंच्याट कणाट । 

रचना - चन्द्रधर शर्मा  गुलेरी

अनुवाद - बलबीर राणा अडिग 

बुधवार, 24 मार्च 2021

शहीद को सलाम



दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी
सुगंध माटी की ललचाती होगी
कैद में बंद माँ भारती की घुटन
परवानो तुमको तड़फाती होगी
 
जंजीरों में जकड़े भारत का क्रंदन 
तुमसे देखा नहीं गया होगा
खुली हवा में सांस लेते भारत को
सपनो में तुमने देखा होगा।
 
कराह भारतियों की विथाती होगी
दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी
 
माटी का कर्ज चुकाया तुमने
पुत्र होने का फर्ज निभाया तुमने
स्व को त्याग बलिदान दे करके
रंग दे बसंती चोला पहना तुमने।
 
फिरंगियों देख भौंहे चढ़ती होगी
दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी
 
फांसी के फंदे पर झूलते समय
मुस्कान भारत की देखी होगी
इस लिए झूल गए खुशी-खुशी
कितनी अनोखी मौत वह होगी।
 
माँ भारती जणगनमण सुनाती होगी
दुर्गन्ध गुलामी की उबाती होगी।
 
शत शत नमन शेर ए हिन्दो
शीश झुका तुम्हें सलाम
धरती पुत्रों की शादाहत को
अडिग का कोटिस प्रणाम ।

@ Balbir Singh Rana 'Adig' 
#adigshabdonkapehara

शनिवार, 20 मार्च 2021

प्रेम की शक्ति



मेरा देश मेरी मिट्टी 

मेरी दृष्टि मेरी मेरी सृष्टि

न उच्चाट 

न खट्टास 

एक आदेश 

आदेशानुसार भेष

थार मरुस्थल में थीर 

रन ऑफ कच्छ में धीर 

सियाचिन ग्लेशियर में अडिग 

हिमालय  हिमशिखरों में अटल 

उत्तरपूर्व सघनों में सतर्क 

समुद्री तटों पर तठस्थ 

कहीं भी मन नहीं उचटा

कहीं भी दिल नहीं हटा

काठ की भूमि में काठ बन 

चलता रहा

आत्मसात करता रहा

महान राष्ट्र की 

विधिद्द जलवायु को, 

लू, उमस, शीत लहर

कुछ भी तो नहीं चुभा

क्योंकि यह प्रेम की शक्ति है 

वर्दी और

माँ भारत माता के प्रेम की।


@ बलबीर राणा अड़िग

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

शुभम करोति कल्याणम

       


       बाहर पटाके फुट रहे थे

      गानों का शोर सराबा

      चल राहा था,

      देखा, सुना पूछा तो पता चला

      नयां साल आ रहा है।

      हिन्दू ने कहा हमारा नहीं

      इसाईयों का आ रहा है

      मोमिन बौद्ध तठस्त थे,

      सबको देख सुन

      मैं शुभम करोति कल्याणम

      कह अन्दर आ गया

      क्योंकि कर्म पथ पर

      मेरी हर सुबह

      नयें युग, नयें साल, महिने

      और नयें दिन का होता है

      सबको आपकी मान्यता

      मुबारक ।

      मेरा अंक दिवस मुबारक 

     

      @ बलबीर राणा अडिग

नूतन इक्कीस के नाम काका की चिठ्ठी

 

    


    प्रिय नूतन इक्कीस तेरी जग्वाल अब समाप्ती की ओर है और अब पांच घंटे के बाद तेरी नन्हीं किलकारियां इस धरा मंडल पर गुंजनी सुरु हो जायेंगी। तेरे आने की खुशी में पृथवी वासी अति ब्याकुल हैं। कोई केक, कोई दिया बाती, पटाके फुलझड़ीयां लेकर तेरे स्वागत के लिए बेकरार हैं कुछ कुछ ने तो महंगी से महंगी ब्रान्ड ले रखी हैं कि आज तो छक पीना है और कल से लालमणी को बिल्कुल हाथ नहीं लगायेंगे बल, कसम से। कुछ कुछ तो अबेर के जैसे बोल्या सिगरेट बीड़ी के सुटटे पर सुटटे ऐसे मार रहें है जैसे हाफ टाईम में बाथरुम की आड़ में स्कुल्या छोरे मारते हैं। वे भी कल से पीताम्बरी और स्वेताम्बरी को तिलांजली देगें बल। और तो और कुछ कुछ आदर्श खरचिली गृहणियों ने आज खूब सौपिंग कर ली और घर में खूब पार्टी सार्टी का इंतजाम भी किया कि कल से वे अपने फिजूलखर्ची पर लगाम लगायेंगे। ये तो भ्वोळ से ही देखी जायेगी कि कौन कितना वादा निभता है। प्रिय नूतन इसी तरह पिछले अन्य बर्षों के आने के स्वागत में पृथवी लोकवासी आने वाले नूतन वर्ष का स्वागत सत्कार करते आये है और आगे भी करते रहेंगे। यह लोक आशाबाद पर जीता है और आने वाली चुनौतियों का मुकाबला करता है।  

      अब तेरे आने से पहले पत्र लिखने का खास कारण इस प्रकार है कि रिवाज के अनुरुप पिछले साल तेरे बड़े भाई बीस बीस के स्वागत में हमने कोई कोर कसर छोड़ी थी। पर वा र्निभगी ना ना प्रकार के दुख और सबक दे गया। पिछली जनवरी को चीन के बुहान के अलावा पूरा विश्व नव उंमग और नव उर्जा के साथ बीस के साथ आन्दमयी जीवन निभाने के लिए अपने अपने कर्यों में तल्लीन हो गये थे। मार्च आते आते एक अदृश्य वायरस करोना ने सारे संसार को हिलाना सुरु कर दिया और जन मानस अपनी जान की चिन्ता में त्राहीमान करने लगे।

हमारे देश में सफेद दाड़ी बाल वाले राष्ट्र नायक ने बाईस मार्च को जनता र्कफ्यू की अपील कर दी पूरे देश ने राष्ट्र नेता की आज्ञा का पालन किया और जनता र्कफ्यू को सफल बनाया फिर क्या था फिर था सफेद दाड़ी बाल वाले ने पच्चीस मार्च से सम्पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी, और यह सिलसिला आगे बड़ता गया। जीवन पंछी के पर रुक गये जीवन घरों में कैद हो गया। राशन की दुकानों में लाईन लम्बी होती गयी। पेट्रोल पम्प घाम तापने लग गये सड़के सूनी हो गयी, रेल, जहाज, गाड़ी, घोड़े खाली हाथ बैल बेचे जैसे हल्या के खोल्ये रह गये।

प्रिय नूतन इक्कीस बाबू एक हप्ते में सम्पूर्ण धरती ऐसे चकाचक साफ हो गई मानो ऐरियल डिटर्जेन्ट से धुलाई की हो। खग मृग पोन पंछी स्वछन्द विचरण करने लग गये। वाटसैप फेसबुक के भले दिन आ गये लोग विडीयो कॉल और ऑनलाईन में करतब दिखाने लगे। घर में बैठे बच्चे बड़े बूड़ों संग रामायाण देख संस्कार सिखने लगे और दादी नानियों के किस्सों के दिन आने लगे। एक ही घर के अन्दर रहने वाले जो जो भाई भौज नोकरी के चलते हप्तों तक आपस में नहीं मिल पाते थे वे आपस में कैरम बेटमिंटन, सांप सीड़ी, लूडो और तास सीप में जमने लगे। मर्द किचन और फर्स पौंचे में बीबी का हाथ बांटने लगा। सुबह सुबह घर की छतों में सूर्य नमस्कार और योगासन होने लगा। भारतीय आयुर्वेद जुबान से व्यवहार में आने लगा। बिचारे तेज पत्ता काली मिर्च सौंप, गिलोई आदी औषधियों की घर घर कुटाई होने लगी। रामदेव बाबा की दुकान को और चार चांद लगने लगा।    

      नूतन इक्कीस बाबू तीन महीने ऐसे ही किसी की मौज में तो किसी की फौज में कटी विशेषकर  अपने मजदूर भाईयों का सबसे ज्यादा निरोण हुआ विचारे झोला तमला और अपने सेर पाथों को कोळी उठाकर पैदल ही भूखे नंगे अपने पुश्तेनी घर कूड़ी की और लौटने लगे। गांव की बंजर कुड़ियां आवाद होने लगी। विरान उबरों से धुंवा आने लगा तो जाले लगे डंडियाळियां चहकने लगी। बांझ से घीरी चौक की पठाली बांझा मुक्त होकर खुशी के मारे नाचने लगी। चलो यह र्निभगी करोना किसी के मुख पर तो हंसी लाया।

      पर बाबू क्या बोलना इस दुर्बीज ने ऐसा अनर्थ किया कि जो इसका ग्रास बना उसको अपनो के हाथ का आखरी पानी की घूंट तो दूर कंधा तक नसीब नहीं हुआ। लोग अपनों से ही भय खाने लगे। खिलते स्वाणे मुखड़ों पर म्वाले लग गये, लोग हाथ मिलाना तो दूर हर घड़ी सनिटाईजर से हाथ मलने लगे। लुतड़े लग गये बाबा हाथों पर। बाहर से आये आदमी को लोग ऐसे देखने लगे ऐ ब्वोयी जैसे यमराज आया हो। खैर जाने वाले ने जाना ही था क्योंकि उसका दाना पानी इस लोक में समाप्त हो चुका था पर भय नाग बन सबके झिकुडियों को हिर्र हिर्र डराता रहा। सबसे ज्यादा नींद खराब उन ज्वान नोने नोनियों की हुई जिनकी शादी कैन्सल हुई ऐंरा बिचारे तीन तीन, चार चार महिने सुहागरात की जग्वाल में करवट बदलते रहे। 

      चलो जैसे तैसे सरकार और जनता ने हिम्मत बांधी और काल करोना के साथ जीने का तरिका अपनाना सुरु किया नयें अंग्रेजी शब्द आम लोगों की घर्या जुबानी डिक्सनरी और व्यवहार में शामिल हो गये। जैसे सेनिटाईजेशन, सोशियल डिस्टेसिंग, क्वारन्टाईन, होम आईसोलेसन आदी आदी। बाबू जून से लॉककडाडन खुलना सुरु हुआ और आम जिन्दगी पटरी पर आने लगी। अब तेरे बड़े भ्राता बीस के जाते जाते वैज्ञानिकों ने दुनियां की सांस बढ़ा दी है कि ब्वना छाँ कि वेक्सीन तैयार हो गई बल। किसी किसी देश ने तो लगानी भी सुरु कर दी है बल। पर अभी भी वो लम्बा सफेद फ्रेंचकट दाड़ी वाला अमिताभ बच्चन अपनी भारी रौबिली आवाज में मोबाईल पर समझा बुझा रहा है कि जब तक दवाई नही तब कोई ढिलाई नहीं। अफूं त ढीला होकर करोना ग्रसित हो गया था पर भाई आखिर जंग जीत गया तो उसने बोलाना ही जो ठैरा।

      ये है बाबू नूतन इक्कीस तेरे पीठी के बड़े भाई बीस की बिदागत। ये तुझे इस लिए बताना भी जरुरी था कि उसका असर पसर तेरे पर भी पूरा का पूरा रहने वाला जो ठैरा ताकि तू भी अभी से कमर कस ले। पर बाबू और कुछ अचाणचक वाली आफद मत लाना यार जैसे बाड़ साड़, रगड़ बगड़, खंड मंड और चीन पाकिस्तान जैसे दुर्बिज पड़ोसियों की बिना बात की छिंज्याट। तुझे पता नहीं कि इन झगड़े फिरसादों और करोना के चक्कर से हमारे कई फौजी भाई पूरे साल भर छुटटी नहीं काट पाये ऐरां विचारे देश खातिर लदाख, नीती माणा, सिक्किम और अरुणाचल की हिंवाली पहाड़ियों में तड़तड़े अडिग हैं। चल त मैं भी अब तेरे स्वागत की तैयारी करता हूँ मेरे दगड़या ने स्पेशल ब्रांड रखी है बल आज। बाकी भ्वोळ से देखा जायेगा तेरे साथ। जय हिन्द।

                                                                    तेरा शुभचिन्त

                                                                    अडिग काका

 

@ बलबीर सिंह राणा अडिग

बीस सौ बीस

बीस सौ बीस चला गया तू

चित्र विचित्र दिखा गया तू 

एक ही भेषधारी मानवों में 

देव दानवों को बता गया तू।


इतिहास तुझे जब याद करेगा

पुनरावृति न हो फरियाद करेगा 

देह अपनो के हाथ को तरसी थी 

निरीह निरासा के लिए याद करेगा। 


हाँ कुछ अद्भुत तू  दिखा गया

कुछ नव नीत रीत सिखा गया

चंद में भी निभ जाता जीवन 

राह संयम धैर्य की दिखा गया। 


सत रंगों से विलग तेरे रंग देखे 

कुछ पद छंदों में, कुछ भंग देखे 

नकली शोर सराबे से कुछ दिन

प्रकृति और प्रदत संग संग देखे।


साल बुरा नहीं था बनाया गया 

सरारती जाल में फंसाया गया

बुरे मुल्क के किये के सिले से

सबको भंवर में डुबाया गया । 


अब रुके आहिस्ता चलने लगे 

चेहरों के ढक्कन उतरने लगे

संकुचित वैभव की कलियाँ 

कुसुम बन चमन में फूलने लगे। 


चल अलविदा बीस बीस 

नहीं है तुझसे कोई रीस 

उतार चढ़ाव का है जीवन 

बुझती नहीं जिजीविषा तीस। 


31 दिसंबर 2020

@ बलबीर राणा अड़िग