थी बल*, वह सुन्दर व महान भूमि
हैलो ईश्वर कहाँ है वह ?
मेरे बाप दादाओं ने
अपने स्वेद से सींचकर
स्वर्ग बनाया था उसे ।
वह धरा
ऐसा इतिहास में मैने भी पढ़ा था।
पुरखों के स्वेद से पल्लवित
धरती धधकी थी, बल,
टिड्डियों का झुण्ड आया था, बल
शोर मचाते झैं झैं करते
सबको चट कर गए थे रातोंरात,
हमारी बारी आने वाली थी कि
चुपचाप अंधेरे में जवाहर टनल से नीचे।
2.
जिस भूमि को लोग स्वर्ग कहा करते हैं
वह आग के बीच भागते जीवों वाला जंगल है
अब भी मुझे।
बीत चुका है युग कलित भूमि का
वहाँ आदमी हैं पर आक्रांत
भावनाएं है पर आक्रोश
आदमखोरों का आसरा
3.
ऊँचे हिम शिखरों से रिस रही होगी
चिनाव, झेलम,
सेब, बदाम के बगीचों कों,
बुढ्ढे दादा का रोपा चिनार
जवान ही होगा
डल झील में किश्ती वैसे ही
आहिस्ता सरक रही होगी,
4.
आज भी
पीर पंजाल, समसाबाड़ी, हिमालय
पर्वत मालाओं के बीच के
उस कटोरे में जीवन त्रासद है
डरता हूँ वहां जाने से
क्योंकि मेरे पूर्वजों के खंडरों में
खडग लिए अब भी छुपा है निशाचर
तिलक धारियों की टोह में।
5.
आँख खोलते ही चीख निकलती है
उस भयंकर आकृति को देख
जिसके हाथ में ऐके सैंतालीस है
वह आँखों से खून टपकाता दौड़ रहा है
शान्ति को मारने।
कैसे लौटूं वहाँ,
अब भी मुझे अजान की जगह
भाग जाओं सुनायी दे रहा है,
बताओं कौन दे रहा है गांरटी
कि मेरी माँ के जैसे मेरी पत्नी को
ना भागना पड़े अंधेरी रात में
नादान चूजों को छाती चिपकाये,
और
मेरी तरह
ताउम्र के लिए
जिस पर चेहरे की निशानियां
नदारद हों ।
* बल
गढ़वाली में बल शब्द का प्रयोग
- अन्यपुरुष कथन का भाव प्रकट करने में
- अपनी बात को जोर देने में
- प्रत्यक्ष ना देखने का भाव प्रकटीकरण में
- कथन की विश्वसनीयता पर संदेह
- कथा, कहानी व घटना सुनाने में
@ बलबीर राणा ‘अडिग’

