धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
शनिवार, 9 अप्रैल 2022
सोमवार, 4 अप्रैल 2022
विस्थापित बाप की सिहरन
थी बल*, वह सुन्दर व महान भूमि
हैलो ईश्वर कहाँ है वह ?
मेरे बाप दादाओं ने
अपने स्वेद से सींचकर
स्वर्ग बनाया था उसे ।
वह धरा
ऐसा इतिहास में मैने भी पढ़ा था।
पुरखों के स्वेद से पल्लवित
धरती धधकी थी, बल,
टिड्डियों का झुण्ड आया था, बल
शोर मचाते झैं झैं करते
सबको चट कर गए थे रातोंरात,
हमारी बारी आने वाली थी कि
चुपचाप अंधेरे में जवाहर टनल से नीचे।
2.
जिस भूमि को लोग स्वर्ग कहा करते हैं
वह आग के बीच भागते जीवों वाला जंगल है
अब भी मुझे।
बीत चुका है युग कलित भूमि का
वहाँ आदमी हैं पर आक्रांत
भावनाएं है पर आक्रोश
आदमखोरों का आसरा
3.
ऊँचे हिम शिखरों से रिस रही होगी
चिनाव, झेलम,
सेब, बदाम के बगीचों कों,
बुढ्ढे दादा का रोपा चिनार
जवान ही होगा
डल झील में किश्ती वैसे ही
आहिस्ता सरक रही होगी,
4.
आज भी
पीर पंजाल, समसाबाड़ी, हिमालय
पर्वत मालाओं के बीच के
उस कटोरे में जीवन त्रासद है
डरता हूँ वहां जाने से
क्योंकि मेरे पूर्वजों के खंडरों में
खडग लिए अब भी छुपा है निशाचर
तिलक धारियों की टोह में।
5.
आँख खोलते ही चीख निकलती है
उस भयंकर आकृति को देख
जिसके हाथ में ऐके सैंतालीस है
वह आँखों से खून टपकाता दौड़ रहा है
शान्ति को मारने।
कैसे लौटूं वहाँ,
अब भी मुझे अजान की जगह
भाग जाओं सुनायी दे रहा है,
बताओं कौन दे रहा है गांरटी
कि मेरी माँ के जैसे मेरी पत्नी को
ना भागना पड़े अंधेरी रात में
नादान चूजों को छाती चिपकाये,
और
मेरी तरह
ताउम्र के लिए
जिस पर चेहरे की निशानियां
नदारद हों ।
* बल
गढ़वाली में बल शब्द का प्रयोग
- अन्यपुरुष कथन का भाव प्रकट करने में
- अपनी बात को जोर देने में
- प्रत्यक्ष ना देखने का भाव प्रकटीकरण में
- कथन की विश्वसनीयता पर संदेह
- कथा, कहानी व घटना सुनाने में
@ बलबीर राणा ‘अडिग’
मंगलवार, 29 मार्च 2022
प्रकृति वैभव
नीला अम्बर आँचल ओढ़े
प्रकृति का यह मंजुल रूप
रात्रि चंदा शीतल छाया
दिवा दिवाकर गुनगुनी धूप।
जड़, जंगल पादपों का वैभव
जीवनदायनी सदानिरायें निर्मल
तन हरीतिमा चिंकुर प्राणवायु
पय पल्लवित जीव अति दुर्लभ।
आँगन सतरंगी कुसुम वाटिकायें
गोद पशु विहगों का विहार
लहलहाती अनाज की बालियां
क्षुधा मिटाता समग्र संसार।
तेरे इस अनुपम वैभव में भी
दुःखी हो अगर कोई इन्शान
कर्महीन मतिहीन ही होगा
जो न समझा तेरा विधान ।
@ बलबीर राणा ‘अड़िग’
मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022
नारी
हर नजर और नजरिये का
अपने खातिर किरदार
अपनी परिभाषा है वह।
माँ, बहन, बहू, बेटी
हमसफर/दोस्त/साथी
सहचरी/सहभागनी
अर्धांगनी/बामांगनी
प्रिया/त्रिया वगैरा वगैरा।
लेकिन मैं देखता हूँ
इन किरदारों के मंचन में
जो विभन्न भाव भंगिमाएं,
कला मुद्राओं व वेशभूषा से
सज्जित जो मूर्ति बनी है
वह धरती जैसी है
जगत ढोने वाली धरती।
वह अचल/अडिग है
जिसमें धीर-थीर धैर्य है
जिससे जीवन उर्जित है
जिसमें संजीदगी है समांजस्य है
वेदना समन की शक्ति है।
इस परिपूर्ण सजल मूर्ति में
प्रेम, ममता, माया-मोह है
चपल मेधा मति है
चंचल किसलय इतनी कि
तनिक दुःख पर
विह्वलता, करुणा और
दया-धर्म पसीजता है।
उसमें नूर है आकर्षण है
निश्च्छलता है निर्मलता है
सौम्यता है सम्मोहन है
और वह विदुषी वाकपटुता है।
दानव समन को
रणचण्डी काली ज्वाला है
तेज तलवार कटार धारी
तीलू रौतेली, अहिल्याबाई
रानी लक्षमीबाई है ।
वह अबला नहीं सबला है
जल-थल, नभ पूरे ब्रह्माण्ड को
विजित करने का सामर्थ्य है
अनन्य शास्त्र व शस्त्रधारी
शक्ति स्वामिनी है।
वह कोयल कोकिला है
वीणा वादिनी संगीत साम्राज्ञी है
कलित कलाओं में
निपुण योगनी है।
साहित्य संस्कृति की सूक्ति है
लयात्मक छन्दबंध है
वन्धन मुक्त मुक्तक भी है
और सबसे बढ़कर
संतति का सम्पूर्ण जीवन ग्रंथ है।
वह ज्ञान ज्योति है
तिमिर में प्रकाश पुंज है
जीवन के हर कार्य में
प्रखर प्रवीण, दक्ष है ।
त्याग, अर्पण समर्पण व
सर्व गुण समपन्न
सुंदर जो ये कुट्यारी है
वह नारी है, वह नारी है।
कुट्यारी - गठरी
@ बलबीर राणा 'अडिग '
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022
गजल
जब भी मिलन हो मुखड़ी अनजान न लगे,
यादों के मेले में छुवीं विरान न लगे।
जोड़ें दिल के तार, चंद लगे लम्हों में,
धरती की अगली मुलाकात, आसमान न लगे।
फ़िराक़ में रखें अपनापन रिश्ते ढूंढने को,
मिले तो धुक-धुकी लगें बेजान न लगे।
पगडंडियां, हाईवे, मोड़-सोड़ सब हैं सफर में,
अबेर-सबेर चलेगा, पर रफ्तार को विराम न लगे।
उकाळ, उंदार वाले होते हैं प्रेम पथ अकसर,
चलते रहना, कठिन लगे पर हारमान न लगे।
पहेलियाँ बहुत हैं संसारिकता की पोथियों में,
सुलझा लो तो ज्ञान लगे अभिमान न लगे।
बरकतों के बाग हरियाली हो झकमकार जब,
तब जरूरत मंदों को वो रेगिस्तान न लगे।
जज्बातों को संभाल कर रखना अडिग,
जब निकले बात लगे, बद जुमान न लगे।
*गढ़वाली शब्दों का अर्थ :-*
मुखड़ी – चेहरा। छुवीं – बातचीत। धुक-धुकी – धड़कती। अबेर-सबेर- लेट-पेट। उकाळ उंदार -चढ़ाई उतराई। झकमकार-लबालब। जुमान – जुबाँ।
@ बलबीर राणा ‘अडिग’
सोमवार, 31 जनवरी 2022
स्वर्गजित
सरहद, सागर हर हद पर निगेहबान हैं,
चौकस हैं अरि अक्षि पर संधान हैं।
अडिग हैं आखरी लहू बूंद तक, न रंज ना राड़,
स्वर्गजित सुत, भारतमाता के जवान हैं।
बुधवार, 26 जनवरी 2022
गणतंत्र दिवस
अरुणोदय हुआ चला,
प्राची उदयमान हुई।
माँ भारती के स्वागत को,
राष्ट्र उमंगें वेगवान हुई।।
माघ की मंगल बेला पर,
तिरंगा शान से फहरायें।
गणतंत्र के महापर्व पर
प्रीत से जनगण मन गाएं ।।
महापुरूषों के स्वेद से,
मकरन्द यह निकला है।
योद्धाओं के सोणित से,
हमें लोकतंत्र मिला है।।
चित से उन महामानवों के,
बलिदान का गुणगान करें।
लोकतंत्र के महाग्रंथ का,
अन्तःकरण से सम्मान करें।।
पल्लवन इस वट बृक्ष का,
बुद्धि शक्ति तरकीब से हुआ।
तब इस सघन छाया में बैठना,
हम सबको नशीब हुआ।
ज्ञान, भुजबल परिश्रम से,
शेष दोष-दीनता दूर करें।
रिक्त है अभी भी जो कोष
चलो मिलकर भरपूर करें।
काम स्व हित संधान तक
यह लोकतंत्र का मान नहीं।
राष्ट्रहित निज कर्तव्यों को
आराम नहीं विश्राम नहीं।
जग में माँ भारती की,
ऐसी ही ऊँची शान रहे।
अधरों पर तेरे भरत सुत,
जय भारत का गान रहे।
@ बलबीर राणा 'अडिग'


