रविवार, 4 दिसंबर 2022

गजल




बादलों सा बरखा की कहानी में रहें,

गम के जैसा आँखों के पानी में रहें ।


फेंको मत ऐसे टूटे आईने के टुकड़ों को,

ताकि अपने बिखरे निशानी में रहे।


छोकरापन नहीं ठीक झंगरळया हो गए

हम पुराने हुए पुरानी में रहें।


जुबां ज्यूंद्याल नहीं, जो फेंको दो मुट्ठियां भर

अखंड मोतिम है जुबां, जुबानी में रहें।


वक्त वादियां हैं, दूर निकल जाती हैं, 

रवाँ में ही फायदा, रवानी में रहें ।


छोड़ दें देह की अकड़ सकड़ *अडिग*,

दिल कहता है जवां है तो जवानी में रहें। 


अर्थ :-

झंगरळया- आधा सफेदी वाले बाल

ज्यूंद्याल - पूजा के अभिमंत्रित चांवल

मोतिम - वचन, वाणी


*@ बलबीर राणा 'अडिग'*

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

खेल फुटबॉल का

 



पांवो से पांव लड़े

सर से सर भिड़े

मैदाने जंग एक बॉल पर

ऐसे भिड़े कि ऐसे भिड़े ।

 

फुटबॉल के खिलाड़ी हैं

पारंगत हैं अनाड़ी न हैं

नाम नमक निशान पर जूझते

कोई शहरी कोई पहाड़ी हैं।

 

लात-लातों की बात मिली

गेंद फिरकी सी घूम चली

बॉल बेचारी नाचती रही

कभी इधर चली, कभी उधर चली।

 

थी यहीं वह, अब यहाँ नहीं

थी वहीं वह, अब वहाँ नहीं

जगह न कोई मैदान में

गेंद कहाँ नहीं, कहाँ नहीं।

 

क्षण इधर गई, क्षण उधर गई

भागती-भागती हाँपती रही

क्षण विसराम उसे तब मिला

जब एक खेमे के गोल दगी।

 

चरम रोमांस का खेला होता

अदभुत संगत का मेला होता

विजय श्री सरताज उनके 

जिनके हौंसलों में रेला होता।

 

विश्व के सभी फुटबॉल खिलाडियों को समर्पित

 

रचना : बलबीर राणा ‘अडिग’


 

बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

उस रावण का दहन




आज फिर पुतला जलेगा,

राख ढेरों से शहर पटेगा,

बारुदी धुऍं में दूभर होंगी सांसे,

रावण अवशेष फिर अट्टहास करेगा। 


सारे अर्थ व्यर्थ हैं,

चहुं ओर रावण समर्थ हैं,

पुतलों पर प्राण प्रतिष्ठा करने के 

कर्म काण्ड सब निरर्थक है।


तंत्र कुम्भकरणी नींद में रहता, 

सरेआम सीता हरण होता,

जटायु हिम्मत दिखती नहीं कहीं, 

मेरी क्या पड़ी, खिसकने में हित दिखता।


हर विजयादशमी जितने रावण जलते हैं, 

हजारों गुना और उगते हैं,  

राम केवल वरण के लिए रह गया, 

चलन में रावण ही विचरते हैं। 


अंदर बैठे उस रावण का दहन करें,

मेरा तो क्या, भावना को भस्म करें,

भारत में राम राज्य लाना है तो, 

राम पद चिह्नो पर गमन करें।


@ बलबीर राणा 'अड़िग'

शनिवार, 13 अगस्त 2022

राष्ट्र उमंगें वेगवान हुई

 

अरुणोदय हुआ चला,

प्राची उदयमान हुई।

माँ भारती के स्वागत को,

राष्ट्र उमंगें वेगवान हुई।।


श्रावणी मंगल बेला पर,

तिरंगा शान से फहरायें। 

आजादी के अमृत महोत्सव को

युगों के लिए अमर बनाएं।।


महापुरूषों के स्वेद से,

मकरन्द यह निकला है।

योद्धाओं के शोणित से, 

हमें लोकतंत्र मिला है।।


चित से उन महामानवों के,

बलिदान का गुणगान करें।

लोकतंत्र के महाग्रंथ का,

अन्तःकरण से सम्मान करें।।


पल्लवन इस वट वृक्ष का,

बुद्धि शक्ति तरकीब से हुआ।

तब इस सघन छाया में बैठना, 

हम सबको नसीब हुआ।


ज्ञान, भुजबल परिश्रम से,

शेष दोष-दीनता दूर करें।

रिक्त है अभी भी जो कोष 

चलो मिलकर भरपूर करें।


काम स्व हित संधान तक

यह लोकतंत्र का मान नहीं।

राष्ट्रहित निज कर्तव्यों को

आराम नहीं  विश्राम नहीं।


जग में माँ भारती की,

ऐसी ही ऊँची शान रहे।

अधरों पर तेरे भरत सुत,

जय भारत का गान रहे। 


रचना :- बलबीर राणा 'अडिग'

रविवार, 10 जुलाई 2022

दोहे



मद मोह में अंधे बन, न करो भागम भाग। 

रहे इतना भान मनुज, लगे ना अमिट दाग।।


सत मार्ग कारिज होवे, बन जाए कर्मप्रधान।

तेरे बाद रहे अमर, तेरे करम सुजान।।


कल के लिए आज तेरा, हो संचय तू जान।

सत पूंजी संकट मिटे, सत सुमार्ग पहचान।


देव धर्म धरा सब दीर्घ, कुपथ गमन नष्टवान।

शूल वाणी बमन तजो, सुवचन सम बलवान।


छुवीं नन्हीं शीतल बने, छुवीं ही बड़ी आग।

छुवीं लगे ऐसी अडिग, नष्ट हों तेरे दाग। 


छुवीं = बातचीत 


©® बलबीर राणा ‘अडिग’





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रविवार, 3 जुलाई 2022

गजल


 


मोहकता तो एक  बहाना है,

अंगजा  को धरती सजाना है।

 

जितने  भी  रंग  ऋतुऐं  बदले,

उन्हीं में उसका आना जाना है।

 

आभा जो कुसुम बन निखरी,

उसको  नहीं  कुम्हलाना  है। 

 

और  प्रारब्ध पुष्प का बाकी,

फल बनके  बीज  बनाना है।

 

प्रेम से गाड़े जाने वाले बीज को,

धरा चीर अंकुर  बन  आना  है ।

 

ये  तो प्रकृति  रीति  है  अडिग

अंकुर का वृक्ष बन बूढ़ा जाना है।

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’


रविवार, 19 जून 2022

पिताजी के जूते




आज नजर पड़ी 

बिना पांव के 

उन प्रिय जूतों पर 

जो पिताजी के प्रिय थे 

लोकलाज 

शान सम्मान के द्योतक थे, 

लेकिन आज

निरा तिरस्कृत

कौने में पड़े

धूल से सने, 

तलवे वैसे ही चकत्तेदार चौखट,

जैसे कि आज से 

ठीक पच्चपन साल पहले 

जब ये फैक्टरी से निकले होंगे,

पिताजी पहनते नहीं थे

ले जाते थे इन्हें

काख में दबाके

रस्ते भर,

ताकि गंतव्य में अगले गांव

आते ही कुछ समय पहनके

दिखा सके जूते पहनने की हैसियत, 

और

आजीवन नंगे पांवों में बिवाईयां 

गाड़ते रहे पहाड़ की पगडंडियों पर

मेरे लिए । 


@ बलबीर राणा 'अडिग''