धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
रविवार, 17 जनवरी 2016
सैनिक उद्गीथ
शुक्रवार, 1 जनवरी 2016
नयीं प्रभा नयी स्फूर्ति
फिर उग आया सूरज नयां बन तेरे लिए।
आँगन जगमगाने आयी नयीं रोशनी लिए,
नव उमंग से फिर लाल हुआ व्योम तेरे लिए।
नयें गीतों की नयीं तान, मोहनी गुंजन लिए
स्वागत में बैठी नव सुमन कली सिर्फ तेरे लिए।
नूतन वर्ष इन्तजार में खड़ा संग श्रम के लिए
नयीं सुगंध संग ताज़ी पुरवायी बह रही तेरे लिए।
सतकर्म समर्पण करें, एक नयें भारत के लिए
सुगम, शुभम-शुभ अडिग आह्वान तेरे लिए।
बुधवार, 25 नवंबर 2015
चींटी के पर
जब थी वह धरती पर
पग-पग कर्मो से नापती रही
दिन-दिन रात-रात
कर्मो की परिभाषा लिखती रही
आज एक
उग्र जिज्ञासा जगी
क्यों न पंख मांगे जाय
आसमान में उड़ कर
खुद को उठाया जाय
और खास बना जाय
लेकिन जीवन का सत्य
वह कर्मकार
चींटी नहीं समझी
कि ये पंख
उगटणहार करता हैं।
उगटणहार - अंत
@ बलबीर राणा 'अडिग'
मंगलवार, 10 नवंबर 2015
दिवाली सन्देश
मिलकर ऐसा दिया जलाएं
खुशियों की किरण मुश्कराये
अंतस से तम का अंधियारा
हमेशा के लिए मिट जाए।
भेद न करे मनु-मन हमारा
यूँ ही मानवता के पहरे को
कोई अधम तोड़ न पाये
मिलकर ऐसा दिया जलाएं।
समग्र समभाव दिप्त हो चले
चलो कर्म पथ अपना सूचित बनाएं
मिल कर ऐसा दीप जलाएं।
फुलझड़ियाँ चहुँ और माया मगन हो
दिवाली संदेश अडिग लाये
मिलकर ऐसा दिया जलाएं।
@ सर्वाधिकार सुरक्षित
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015
सतर्कता जागरूकता सप्ताह विशेष
मेरी दृष्टि से सुशासन में पांच ‘स’ होना अति आवश्यक है जिसमें सम्पूर्ण प्रजा सुखी, साधन संपन्न, सुरक्षित और स्वस्थ रहे साथ ही सुशासन की विशेषता में पारदर्शी होना, उत्तरदायी होना, विधि के नियमो का पालन करना, समावेशी होना, प्रभावी होना और कार्यकुशल होना माना गया है । युगों का इतिहास गवाह है धरती पर ऐसे कई शासक रहे हैं जिनकी प्रजा इन पांच ‘स’ से परिपूर्ण थी और आज भी विश्व के कई देश हैं लेकिन कालांतर में भारत जैसे संप्रभुता संपन्न वाले गणतंत्र में अभी तक यह सपना ही लगता है। देश को औपनिवेशिकता से मुक्ति के सात दशक होने वाले हैं फिर भी देश का आम जन एक सुखी जीवन की कल्पना खुद के लिए गाली समझता है कारण ? व्यक्ति के खुद की कमी से ज्यादा उसका शासक और शासन प्रणाली। वर्तमान भ्रष्ट तंत्र के प्रभाव से आमजन में प्रशासन के प्रति अविश्वास निराशा और क्षोभ के सिवाय कुछ नहीं है, इस अपारदर्शी प्रणाली से देश का एक वर्ग स्व उथान की सीडी चढ़ता जा रहा है और एक वर्ग मुंह ताके चढ़ने वालों को देख ख्याली पुलाव खा रहा है या अपने को असहाय महसूस कर रहा है। अब सवाल है कि कैसे आमजन की उदासी दूर हो और प्रशासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आये इसके लिए आज तक की सभी सरकारों के प्रयास बैक फुट पर ही रहे। देश भ्रष्टाचार मुक्त हो और शासन कार्य प्रणाली पारदर्शी हो इसके लिए भारत सरकार ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission (CVC) की स्थापना 1965 में की जो कि भारत सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों/कर्मचारियों से सम्बन्धित भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए कार्य करने के लिए जबावदेह घोषित किया गया, आज तक चाहे आयोग का कार्य क्रियान्वियन असरकारी रहा हो या कागजों तक सिमित रहा हो लेकिन आयोग के इस वर्ष 2015 की सोच और रूप रेखा में आशा की किरण नजर आ रही है जिसके तहत आयोग ने अपने मूलभूत उदेश्य में से एक जागरूकता को पहचाना और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकारी तौर पर सार्वजानिक जागरूकता अभियान शुरू करने का निश्चय लिया जिसका विषय आयोग ने निवारण सतर्कता सुशासन का एक प्रभावी उपाय चुना है इस अभियान की प्रसंशा की जानी चाहिए और आशा भी। देश में ईमानदारी, पारदर्शिता और जबाबदेही की संस्कृति स्थापित हो इसके लिए हम सब नागरिकों का नैतिक दायित्व बनता है कि इस सरकार की इस मुहिम को सहयोग कर बल प्रदान करें खुद भी जागरुक हों और औरों को भी जागरूक करें तभी भ्रष्टाचार रूपी दानव से हम निजात पायेंगे।
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गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
सन्देश देता दशहरा
हर वर्ष सन्देश देता दशहरा
छंटेगा तम का अंधड़ घनेरा
सत्य की विजय अधम पर होय
सुपथ पर उगे नयां पावन सबेरा।
धैर्य न व्याकुल हो धीर दे सहारा
मर्यादा पर विश्वास बड़े तेरा
मीठे सरोवर में जीवन नहाये
न रहे कोई जलज धरा पे खारा
हर वर्ष .......
पुतले संग राख ख़ाक हो अहम सारा
अंतस में रावण फिर न बना रहे कारा
बाहर-बाहर गीत राम के गुंजित न हो
ज्यु भीतर भी बने पुरुषोत्तम का बसेरा
हर वर्ष...........
सर्व सम्भाव पल्लवित हो चितेरा
बगिया में कुसुम् लताएँ बनाये घेरा
उगने न पाये काँटे जात-पात के
भय हीन निर्भय हो जीवन हमेरा।
हर वर्ष.........
दंभ अभिमान पर वार हो सदा
सत वाणों से तरकश हो भरा
छेदन हो क्रोध कपट कटुता का
अडिग कल्पना का हो यह संसारा
हर वर्ष सन्देश देता दशहरा ।
ज्यु = जिगर, दिल
रचना:- बलबीर राणा 'अडिग'
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रविवार, 6 सितंबर 2015
माँ को शहीद का सन्देश
जिसे देख रही तु चिर निंद्रा में ये माटी का पुतला है
तेरा लाल अभी भी सीमा पर खड़ा है, निगाह उठा जाना।
पर कुतर कुतर चीलों का निवाला बना गए उनके
ये, काश्मीर पर नजर रखने वालो को समझा देना
माँ जब ताबूत आये मेरा, दो आँशु गिरा मुश्करा देना।
तोड़ रहे हैं, तोड़ते रहेंगे हर चक्रव्यूह काफिरों का वाणों से
काली के भेष में आकर माँ, दैंत्यों को ललकार देना
माँ जब ताबूत आये मेरा, दो आँशु गिरा मुश्करा देना।
हर जन्म तेरी कोख में जन्मूँ कोख पर अपनी मत रोना
शोक-संताप क्षोभ कर मेरी आत्मा मैली मत होने देना
माँ जब ताबूत आये मेरा, दो आँशु गिरा मुश्करा देना।
जब हो जवान गबरू वो बेटा, मेरा हेट पहना देना
लाल का लाल है तैयार, ये शकुनियों को चेता देना
माँ जब ताबूत आये मेरा, दो आँशु गिरा मुश्करा देना।



