शुक्रवार, 7 जून 2019

पगडंडी

असंख्य पांवों की
ठोकर खाने के बाद
सघन के अंदर
पगडंडी बन जाती है
सुगम राह
किसी की मंजिल के लिए
खुशियों के लिए।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

रविवार, 7 अप्रैल 2019

गढ़वाली जवान हूँ


जीवन का नेह निचोड़ गीत मातृभूमि का गाता हूँ
तिरंगे वसन का प्रेमी मैं शौर्य विजय की गाथा हूँ
मौन क्षितिज चारों दिशाओं पर पूरा हिंदुस्तान हूँ
भारतीय सेना की शान हूँ वीर गढ़वाली जवान हूँ।

वीर गबर दरवान जसवंत के देश का वासी हूँ
सघन बनों दुर्गम ठौर प्राचीर प्रहरी सन्यासी हूँ
भय न किसी झंझावतों से न फिक्र तुफानो की
कीट कीकर में फंख खोल उड़ने का अभ्यासी हूँ।

राष्ट्र रक्षार्थ कर्मवेदी पर रचा गया एक विधान हूँ
भारतीय सेना की शान हूँ वीर गढ़वाली जवान हूँ।

क्यों न दुःख कराल कष्टों से मेरा जीवन संसार रहे
चाहे समर भूमि में धधकता शोला व हाहाकार रहे
युद्धाय कृत निश्चय: आदर्श सर माथे पर रखता हूँ 
बद्री विशाल लाल की जय का, जय घोष करता हूँ।

रेड लाईन यार्ड वर्दी धारी औरों से परे पहचान हूँ 
भारतीय सेना की शान हूँ वीर गढ़वाली जवान हूँ।

गम नहीं मैं आहुत हो जाऊं भारत माँ तेरा प्रताप रहे
वेग बुलंद हो उन्नति का इस भुवन अमित छाप रहे 
पहाड़ी पुत्र हूँ सिंहनाद कर अरि मांदों पर झपटता हूँ 
शपथ ली पुनीत गीता की गीत महाभारत के गाता हूँ।

राष्ट्र सुख शांति निमित एक कवच हूँ परिधान हूँ 
भारतीय सेना की शान हूँ वीर गढ़वाली जवान हूँ।

रंचना : बलबीर राणा 'अड़िग'

मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

लोकतंत्र के पर्व पर


मजबूर नहीं मजबूत बनकर, देश का उत्थान करें
लोकतंत्र के पर्व पर निस्वार्थ होकर मतदान करें ।

चलो नित्य के काम धंधों को जरा तनिक बिराम दें
चलायमान उदर साधना को एक दिन का आराम दें
निकलो घर से आवाज दो चाटुकारिता पर चोट करें
हिंदुस्तान की मजबूती को मिलकर सब वोट करें
भागीदारी यह देश निमित राष्ट्रहित में श्रमदान करें
लोकतंत्र के पर्व पर निस्वार्थ होकर मतदान करें ।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के आप मतदाता हो
एक वोट अमोल है, आप राष्ट्र भाग्य विधाता हो
ये मत समझना मेरे न जाने से क्या होने जाएगा
आपके न होने से देश, असक्षम को ढोने जाएगा
सामर्थ्यवान को समर्थ करेंगे मिलकर आह्वान करें
लोकतंत्र के पर्व पर निस्वार्थ होकर मतदान करें।

मत बहकावे में आकर, अपने वोट को न व्यर्थ करें
अधिकार आपका जिसे चाहते हो उसे समर्थ करें
घपला घोटालेबाजों को लोकतंत्र मंदिर नहीं पहुंचाना
पीड़ी बंशावलियों को वोट देकर और नहीं पछताना
देश लूट कर तिजोरी भरने वालों का समाधान करें
लोकतंत्र के पर्व पर निस्वार्थ होकर मतदान करें।

स्व स्वार्थ की राजनीति से लोकतंत्र गर्त में जा रहा
राष्ट्रहित परे रखकर जन-जन में फर्क किया जा रहा
यही समझना और समझाना जिम्मेवारी का काम है
सक्षम व्यक्ति को चुनकर भेजना बफादारी का नाम है
जाति-धर्म से ऊपर उठकर संविधान का मान करें
लोकतंत्र के पर्व पर निस्वार्थ होकर मतदान करें।

2 अप्रेल 2019
रंचना : बलबीर राणा 'अडिग'

शनिवार, 16 मार्च 2019

असंभव कहना नहीं सीखा


भारत भू कण कण नाप
दिग्विजय इतिहास लिखा
पौरुष अरुण शिखा मुझे
माँ भारती का भाल दिखा

चलता हूँ उस किरण पीछे
जो तिमिर में राह दिखाती
राष्ट्ररक्षार्थ धर्मयज्ञ में
रक्षति रक्षत: मंत्र जपती

मन मोह नहीं खोज पाया
चक्षु यौवन न पा सके
उर उठते किसलय भाव
कंठ ऊपर गमन न कर सके।

कर्म भुमि में लक्ष्य मिला
त्याग समर्पण और दृढ़ता
फिर क्या था चलता रहा
असंभव कहना नहीं सीखा।

जय बद्रीविशाल
Dedicated to
Maj Amit Dimri , SC

@ Balbir Rana 'Adig'

शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2019

है साहस ?

आतंकियों को तो अब मरना ही है मरने की उसने ठानी है
अरे देश उनका क्या करोगे जो बोलते पाक जुबानी है

कर सको तो करो काम साहस दिखाने का
पहले अंदर के जकयचंदो को मिटाने का

न फिर कोई दुश्मन घर का मेहमान बनने जायेगा
न कोई उसकी खीर चाट कर यशोगान फिर गायेगा

फिर न कोई पैरवी करेगा और न रात को कोर्ट खुलवाएगा
न कोई इन आतंकियों के मरने पर घड़ियाली आंशू बहाएगा

फिर न कोई अलगाववादियों के घर उनसे झपी लेगा
फिर न कोई सर्जिकल स्ट्राइक शौर्य बल पर चुटकी लेगा।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

केशर घाटी की शांति तक

इस वर्दी का यही मोल है
यही समग्र समर्पण है यही अमोल है

ललाट पर अर्पण लिखा जो,
उसे टाला नहीं जा सकता

राष्ट्र रक्षार्थ हव्य बने जो 
होम उनका रोका नहीं जा सकता 

भारत वर्चस्व निमित यह हवन है 
आपके शौर्य को नमन है  

केशर घाटी की शांति तक समर विराम नहीं लेगा 
आखरी अराजक तक पराक्रम आराम नहीं लेगा 


अब छुटपुट नहीं पूरा नेस्तनाबूत करना है 
इन छद्दमों की छाती पर तिरंगा लहराना है 

बाज बन झपट पड़ो जिस घर में आतंकी शेष है
शूरत्व नहीं सुकुमार होता, धरना बिकराल भेष है

बहुत हो गया मानमनोवल पत्थर पर अब मौन नहीं  
सटेसाटयम की भाषा चलेगी बेक़सूर का खून नहीं 

@ बलबीर राणा 'अड़िग'

बुधवार, 13 फ़रवरी 2019

आखरी कब तक

डंसती रहेगी ये सर्पीली सड़कें आखरी कब तक
उठती रहेगी यूं असमय चिताएं आखरी कब तक
कौन दोषी किसके सर फोड़ें ठीकरा इस जुल्म का
बिना जुल्म के जुल्म ढहता रहेगा आखरी कब तक।

यूं वेकसूर को हर ले जाएगी मृत्यु आखरी कब तक
हंसते खेलते परिवार पर तुषारपात आखरी कब तक
कौन आया वो मौत का सौदागर इन सुंदर वादियों में
बिना मोल का ले जाना जारी रहेगा आखरी कब तक।

सौदे कायदे कानून का जेबों में आखरी कब तक
पतवार नौसीखिये केवट हाथों आखरी कब तक
नहीं थाम सकेगा पतवार वो मतवाला झूमते हाथों से
डूबाते रहोगे नैया हम पहाडियों की आखरी कब तक।

@ बलबीर राणा 'अड़िग'