बुधवार, 5 अक्टूबर 2022

उस रावण का दहन




आज फिर पुतला जलेगा,

राख ढेरों से शहर पटेगा,

बारुदी धुऍं में दूभर होंगी सांसे,

रावण अवशेष फिर अट्टहास करेगा। 


सारे अर्थ व्यर्थ हैं,

चहुं ओर रावण समर्थ हैं,

पुतलों पर प्राण प्रतिष्ठा करने के 

कर्म काण्ड सब निरर्थक है।


तंत्र कुम्भकरणी नींद में रहता, 

सरेआम सीता हरण होता,

जटायु हिम्मत दिखती नहीं कहीं, 

मेरी क्या पड़ी, खिसकने में हित दिखता।


हर विजयादशमी जितने रावण जलते हैं, 

हजारों गुना और उगते हैं,  

राम केवल वरण के लिए रह गया, 

चलन में रावण ही विचरते हैं। 


अंदर बैठे उस रावण का दहन करें,

मेरा तो क्या, भावना को भस्म करें,

भारत में राम राज्य लाना है तो, 

राम पद चिह्नो पर गमन करें।


@ बलबीर राणा 'अड़िग'

शनिवार, 13 अगस्त 2022

राष्ट्र उमंगें वेगवान हुई

 

अरुणोदय हुआ चला,

प्राची उदयमान हुई।

माँ भारती के स्वागत को,

राष्ट्र उमंगें वेगवान हुई।।


श्रावणी मंगल बेला पर,

तिरंगा शान से फहरायें। 

आजादी के अमृत महोत्सव को

युगों के लिए अमर बनाएं।।


महापुरूषों के स्वेद से,

मकरन्द यह निकला है।

योद्धाओं के शोणित से, 

हमें लोकतंत्र मिला है।।


चित से उन महामानवों के,

बलिदान का गुणगान करें।

लोकतंत्र के महाग्रंथ का,

अन्तःकरण से सम्मान करें।।


पल्लवन इस वट वृक्ष का,

बुद्धि शक्ति तरकीब से हुआ।

तब इस सघन छाया में बैठना, 

हम सबको नसीब हुआ।


ज्ञान, भुजबल परिश्रम से,

शेष दोष-दीनता दूर करें।

रिक्त है अभी भी जो कोष 

चलो मिलकर भरपूर करें।


काम स्व हित संधान तक

यह लोकतंत्र का मान नहीं।

राष्ट्रहित निज कर्तव्यों को

आराम नहीं  विश्राम नहीं।


जग में माँ भारती की,

ऐसी ही ऊँची शान रहे।

अधरों पर तेरे भरत सुत,

जय भारत का गान रहे। 


रचना :- बलबीर राणा 'अडिग'

रविवार, 10 जुलाई 2022

दोहे



मद मोह में अंधे बन, न करो भागम भाग। 

रहे इतना भान मनुज, लगे ना अमिट दाग।।


सत मार्ग कारिज होवे, बन जाए कर्मप्रधान।

तेरे बाद रहे अमर, तेरे करम सुजान।।


कल के लिए आज तेरा, हो संचय तू जान।

सत पूंजी संकट मिटे, सत सुमार्ग पहचान।


देव धर्म धरा सब दीर्घ, कुपथ गमन नष्टवान।

शूल वाणी बमन तजो, सुवचन सम बलवान।


छुवीं नन्हीं शीतल बने, छुवीं ही बड़ी आग।

छुवीं लगे ऐसी अडिग, नष्ट हों तेरे दाग। 


छुवीं = बातचीत 


©® बलबीर राणा ‘अडिग’





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रविवार, 3 जुलाई 2022

गजल


 


मोहकता तो एक  बहाना है,

अंगजा  को धरती सजाना है।

 

जितने  भी  रंग  ऋतुऐं  बदले,

उन्हीं में उसका आना जाना है।

 

आभा जो कुसुम बन निखरी,

उसको  नहीं  कुम्हलाना  है। 

 

और  प्रारब्ध पुष्प का बाकी,

फल बनके  बीज  बनाना है।

 

प्रेम से गाड़े जाने वाले बीज को,

धरा चीर अंकुर  बन  आना  है ।

 

ये  तो प्रकृति  रीति  है  अडिग

अंकुर का वृक्ष बन बूढ़ा जाना है।

 

@ बलबीर राणा ‘अडिग’


रविवार, 19 जून 2022

पिताजी के जूते




आज नजर पड़ी 

बिना पांव के 

उन प्रिय जूतों पर 

जो पिताजी के प्रिय थे 

लोकलाज 

शान सम्मान के द्योतक थे, 

लेकिन आज

निरा तिरस्कृत

कौने में पड़े

धूल से सने, 

तलवे वैसे ही चकत्तेदार चौखट,

जैसे कि आज से 

ठीक पच्चपन साल पहले 

जब ये फैक्टरी से निकले होंगे,

पिताजी पहनते नहीं थे

ले जाते थे इन्हें

काख में दबाके

रस्ते भर,

ताकि गंतव्य में अगले गांव

आते ही कुछ समय पहनके

दिखा सके जूते पहनने की हैसियत, 

और

आजीवन नंगे पांवों में बिवाईयां 

गाड़ते रहे पहाड़ की पगडंडियों पर

मेरे लिए । 


@ बलबीर राणा 'अडिग''

शनिवार, 28 मई 2022

बड़ा आदमी



बड़ा आदमी 

बनने के लिए

पहले गळदार

बन जावो

फिर जिस भी टाईप का

बड़ा बनना है

बन जाओगे

अनेक टाईप के चारी

अनेक टाईप के नेता

यहां तक कुछेक टाईप के

कुछेक समाज सेवक भी

बड़ा अदमी ही बनता है

जिस टाईप की गळदारी

उस टाईप की बड़ी चाकरी।


गळदार - झूठ बोलकर सौदा पटाने वाला ।


@ बलबीर राणा ‘अडिग’


सोमवार, 23 मई 2022

भूख




बहुत हिम्मत और

ताकतवर है साब भूख

हजारों मील दौड़ती है 

संसार के ओर छोर

महाद्वीपों से महाद्वीप

प्रायद्वीपों से टापुओं में 

दाने के लिए। 


भूख बहुत

भावुक नाजुक 

कंयारी क्वांसीली ठैरी,

पिघल जाती है 

द्वार चौराहों पर 

तीर्थ मंदिरों में 

गली, चौक, चौराहों और दरवारों में, 

स्वान बन नतमस्तक हो जाती है

अपने लायक दाने को।


भूख बड़ी 

खूंखार आदमखोर है 

चूस लेती है खून 

ठेले के नीबू से

मल्टीप्लेस मौलों तक, 

चपरासी की फाइल से 

बड़े साब के हस्ताक्षर तक , 

गली का गड्डा भरने से 

एक्सप्रेसवे बनने तक।


भूख बड़ी झूटी  

लंपट है  

क्षुधा मिटते ही 

वादाखिलापी पर आ जाती है

गिरगिट की तरह रंग 

बदलना इसकी फितरत में है

विशेषकर कुर्सी भूख का। 


झोपड़ी, मंजिलों से

अट्टालिकाओं में, 

टाट पट्टी, 

प्लास्टिक कुर्सी से

लग्जरी रोवोल्विंग चियरों में

विलग रूपों वाली है भूख।


विभन्न भाव भंगिमाओं में

नजर आती है भूख

कहीं रोती बिबलाती

कहीं मुल्ल-मुळकती

कहीं खिखताट तो

कहीं विभत्स ठहाका लगाती 

दुखाती, बनाती, रचाती, नचाती 

रहती है जीवन को। 


कुछ भूख घर चलाने को

कुछ केवल घर भरने को 

कोई भूख, भूखों के लिए

कोई स्व सुखों के लिए 

खटकती रहती है। 


एक भूख प्रेम को

एक घृणा को

एक आत्ममुग्त्ता को

एक राष्ट्र स्वाभिमान को 

व्याकुल करती है । 


भूख 

चातक के जैसे

स्वाति नक्षत्र में 

बरसने वाली बूंद  की प्रतीक्षा में 

तठस्थ नहीं रह सकती

बल्कि

पिपीलिका की तरह 

हर समय गतिमान 

चलायमान रहती है

जीवन चलाने को ।


@ बलबीर राणा ‘अडिग’