मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

किस भाव से तुम्हें नमन करें?






साबरमती के शंत बापू 
नए युग का शुत्रपात करने वाले बापू 
अहिंसा का शास्त्र रचने वाले बापू  
संसार के दमित मन को जगाने वाले बापू  
आजादी का पाठ  पढ़ाने वाले बापू 
बशुधेव कुटम्बकम के भाव से 
जग को नईं दिशा देने वाले बापू 
बापू  !!!! आज …….
तेरा ही देश दिशा हीन हो चला। 
तेरे पद चिह्नों की
सरेआम खिल्ली उडाने चला 
जिस विदेशियों का दमन किया तुने 
फिर उसी के रहमोकरम पर चलने चला 
स्वदेशी छोड़ विदेशी अपनाने चला 
हे !!! अर्ध नग्न तपस्वी महान आत्मा
आज का  भारत ………
किस भाव से तुम्हें नमन करें? 
भारतीय ! जो इंडियन बन गया। 
तेरे विचारों को सपना समझ भूल गया। 

……….बलबीर राणा "भैजी"
०२ अक्तूबर २०१२  

रविवार, 30 सितंबर 2012

खुशियों के कुछ पलों के लिए




खुशियों के कुछ पलों के लिए 
घोंसले में चहकता है पंछी 
पंखो के बाहुपाश में  समेटता 
चमन को 
चोंच टकराता
घरोंदे के ओर- छोर, 
उमंग ढूंडता
जीतना चाहता अपने मौन को 
मस्तमंगल धुन में
संसार के पराभव को गाना चाहता 
खुशी की व्यंजना में
प्रेम का शब्दावरण 
पहनाना चाहता 
क्रूर बाज के तीक्ष्ण निगाहों से 
घरोंदे को बचाना चाहता 

बलबीर राणा "भैजी"
३० सितम्बर  २०१२ 



मंगलवार, 25 सितंबर 2012

वटवृक्ष: तेरा जीना बेकार !!

वटवृक्ष: तेरा जीना बेकार !!: यौवन तुझे आज फिर ललकार !! तेरा जीना बेकार !! फैला है अनियमिता का अन्धकार लूट खसोट का व्यापार खुली आँखो के धृतराष्टों के ...

रविवार, 23 सितंबर 2012

पिंजरे में कैद जीवन



पिंजरे में कैद जीवन
हाँ यहाँ कैद रहती
उसकी दुनियां उसका संसार
यहां उसके
विचार कैद
भावनाएं कैद
कुन्द होता विवेक
कर्मों के इस कारागार में
मन का पंछी
पंख फडफडाता
वो उडना चाहता
आजाद विचारों की अभिव्यक्ति के साथ
बखान करना चाहता
मन के उद्गारों को
पूरा करना चाहता
दिल के अरमानो को
लेकिन क्या ??
इसके आदर्श और आदेशों की बेडियां
इजाजत देगी ?
आदेश उच्चस्थ के
धंभ के
अहम के
आदर्श संस्था के
मान के
सम्मान के
दे के स्वाभीमान के
लेकिन !!!
कौन समझेगा?
इस मूक पशु की बेदना को
हाँ मूक पशु ही है
जो रक्षित करता
देश की आन को
बान को
शान को
यहां हांकी जाती उसकी इच्छाऐं
थोपी जाती बेवाक बर्चनायें
उसके सच्चे जीवन की आजादी
इस खुले कारागार के नियमों का
हर हाल में पालन करना
यही अज्ञाकारी जीजिविषा से वह
अलौलिक मनुष्य योनि के सच्चे
उपभोग से बंचित रखता

रचना - बबीर राणा भैजी
२३ सितम्बर 2012

रचनाकार: बलबीर राणा की कविताएं

रचनाकार: बलबीर राणा की कविताएं

सोमवार, 17 सितंबर 2012

सुर में पहाड़ की वेदना ताल में दर्द

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उनके गीतों और  रचनाओं  में समाता उत्तराखंड,
 उनकी भिव्यक्ति  में निर्विकार पहाड़ी  जीवन 
हर शब्द में झलकती  उत्तराखंडी संस्कृति 
सुर में पहाड़ की वेदना
ताल में दर्द
प्रखर  उत्तराखंडी आवाज
जिस आवाज से 
हडकंप मचता राजसत्ता में
कुशासन की  कुर्सी हिलती 
उस कंठ से निकलती 
माँ बेटियों की संवेदनाएं 
प्रेमी  दिलों की चंचलता 
दिखता  मनमोहक उत्तराखंडी  छटा का विह्ंगम  दृश्य 
किस ओर उनकी नजर नहीं जाती 
कण कण में होते क्षण क्षण में होते 
हर जगह व्याप्त उनकी उपस्थिति 
ऊँचे हिवांली काठियों में 
रोंतेली घाटियों में 
कल कल करती श्वेत गंगा यमुना के प्रवाह में 
बिपुल पहाड़ी गाँव में विचरण  करती लय
सुरों से  सुमन  खिलते जवान दिलों में 
फिर अठ्लेलियाँ लेता बूढा जीवन 
झूम उठती माँ की ममता 
हे गढ़ पुरुष उत्तराखंडी  शिरमोर 
तुझे कोटि कोटि प्रणाम 

बलबीर राणा "भैजी" 
१४ सितम्बर २०१२