सहस्रों जुग
देखे मैंने
अजातशत्रु बन
अजर अमर
सदियों से जी
रहा हूँ।
काल के काल कलीकाल
बनते गये
कल्पों का
कोलाहल सुनके भी
मूक सहिष्णु
बना रहा।
ना टुटी तन्द्र
मेरी
ऐसा ही निशब्द
खडा रहा।
अथाह धैर्य शनेः
शनेः अनश्वर बनता रहा
धरा की अकुलाहट
देख भी
भावना की पाती
में ना बहा।
प्रकृति के
अकुलाहट में
मोन मेरा
पराजित ना हुआ।
कभी कभी जीवित अडिगता मेरी
चित को कटोचती
तुम क्यों
भ्रमित हो
पर्वत में भी
अचल दिल धडकता।
मानव की
विभित्सिका और अधम देख
प्रलय के आँसू
रोता।






