गुरुवार, 27 अप्रैल 2023

जिद्दी




प्रेमियों से

ज्यादा जिद्दी

धुन के पक्के 

इस धरा पर

और किसी को नहीं देखा।


निरा बहरे 

दुनियां की चुहल

चिल्लाहट भी

प्रेमगीत सुनाई पड़ता इन्हें ।


प्रेम पल्लवन के लिए 

सावन की रिमझिम

चाहते हैं सदैव

तभी तो

धरती का हर कौना 

हरा-भरा दिखता है

इन्हें 

सावन के अंधे की तरह।


जग्वाळ में बैठे प्रेमी

से जादा

कोई नहीं जानता

पल की गहराई 

प्रतीक्षा की लम्बाई

अंतहीन दिशाओं फैलाव 

आकाश के नीले का गाड़ापान ।



@ बलबीर राणा 'अडिग'

गुरुवार, 30 मार्च 2023

अडिग दोहे


अभाव में रखते  सब,  रघुनन्दन  का भान। 

भाव में जो भाव रखे, मनुज वही मतिमान।। 

 

नाम यशोधन जग फले, फले वैभव तमाम।

गरूर ग्रहण  ना लगे, रामा धन  तू मान।।


हरीतिमा मिले आंगन, सुकरम राह सुजान ।

चरे चाकरी कुपथ जो, करे चौपट  मचान ।। 


चले चटकी चालाकी, रखे जब  तक छुपाए।

चटख चटके चकड़ैती, राम दृष्टि ज्यूँ आए।।


प्रीति हो जब आफूँ से, वही राम  लग जाए।

आत्म प्रीत जग प्रीत है, यही राम को भाए।।


राम नाम सत नाम है, सत है राम विधान। 

और सब खंडित होवे, राम  सत्ता तू जान।।


प्रेम भूख  लागे अडिग, उदर  भूख हो गोण। 

सब तृष्णा से छक देवे, राम नाम की भौंण।।


शब्दार्थ :-

आफूँ - अपने से 

भौंण -  धुन

@ बलबीर राणा ‘अडिग’

रविवार, 12 मार्च 2023

समय


अपने हिस्से के
मुट्ठी भर मेवों से
तीन चौथाई बचा के
रखता था अजय
हर रोज 
ताकि छः आठ महिने में 
बन सके दो-चार किलो,


जब उसे छुट्टी मिलती 
ले जाता था 
पीठ में लाद 
रम की बोतलों के बीच छुपाकर घर,


माँ खुश-ख़ुशी 
पूरे गाँव में पेणु बाँटती थी 
लैंची चणों के साथ,
गाँव बाहें भरके
दुलार प्रेम आशीष देता था
सरहद पर
अपने अजय के विजय होने का, 
था एक समय, 

है एक समय 
अजय वैसे ही बचाता है 
अपने हिस्से के मेवों को
वैसे ही छुपाते लाता है घर
पर
अब ना माँ को पता चलता
ना ही गाँव को 
क्योंकि
आज का अजय
गाँव नहीं शहर में
रहता है. 


पेणु - शुभ अवसर पर घर-घरों बांटे जाने वाला मिठाई या पकवान.


@ बलबीर राणा 'अडिग'

https://adigshabdonkapehara.blogspot.com


मंगलवार, 7 मार्च 2023

होली आयी

 


पूरब से निकली किरण

अधरों पे मुस्कान लिए बोली

उठो अलस भगाओ, देखो बाहर

रंगों में रंग कर आयी होली।

 

अबीर गुलाल पिचकारी लेकर

खड़ी है हुलियारों की टोली

उल्लास बरस रहा है चहुँ ओर

बासंती फुहार लेकर आयी होली।

 

छोड़ो कल की बातें, गले मिलें

मेरा तेरा अब तक बहुत हो ली

मन का विश्वास दिलों में प्रेम

भाईचारा लेकर आयी होली।

 

रंगी है धरती रंगे हैं चौक चौबारे

सजी है बिलग रंगों की रंगोली

मधुमास है, पकड़ो प्रेम झर रहा है

आनंद की प्याली पिलाने आयी होली।

 

 @ बलबीर राणा अडिग

#https://adigshabdonkapehara.blogspot.com

बुधवार, 8 फ़रवरी 2023

प्यार


प्यार को 
वैसे ही जाना है मैंने
जैसी
पंछी  ने आसमान
मछली  ने पानी को ।

वैसे ही
पकड़ के रखता हूँ इसे 
जैसे 
हरियल लकड़ी को ।

वैसे ही तरसता  
मचलता हूँ
जैसे 
चातक घटाओं को।

साफ स्वच्छ देखा है मैंने इसे 
कुहासे में बरखा की बूँद  सा 
धुंधले में धुला
कांच का वर्तन सा ।

फिर समझ पाया 
कि
अगर ये छूट गया तो 
टूट गया
फिर यह 
अनगिनत
नुकीले व धारदार
शूलों में बदल जायेगा
और फिर 
चुभता रहेगा जिगर पर 
काटता रहेगा शरीर को
जीवन भर ।

इसलिए
हर पल, हर घड़ी
संभाल के रखता हूँ 
कहीं छूट ना जाए
टूट ना जाए
यह प्यार।

8 फ़रवरी 23

#अडिगशब्दोंकापेहारा

@ बलबीर  राणा 'अडिग'

मंगलवार, 10 जनवरी 2023

अडिग वचन

 


1.

भ्रम  होना ही

गलत  होना है

इसलिए

मत  मिथ्या में  रहो 

कि

मैं  उम्रदराज हूँ

गलत नहीं हो सकता।


2.

गलती  उम्र की

समय  सीमा नहीं मापती

यह  किसी को भी

कहीं  भी

नाप  लेती है।


@ बलबीर राणा अडिग 


रविवार, 8 जनवरी 2023

उतणदंड उत्तराखण्ड

 


अनियंत्रित निर्माण हर प्रखण्ड

विकास की जद में खण्ड-खण्ड

आध्यात्म आस्था गई पानी भरने

जब से आया पर्यटन पाखंड।

 

लिखे जा रहे हैं विनाश शिलाखण्ड

कल केदार आज जोशीमठ दंड

सुरंग शूल कब तक सहेगी धरती

कल और कोई मठ होगा झंड।

 

क्याजी ब्वन ? कैमा ब्वन

उतणदंड उत्तराखण्ड ।

 

रचना : ©® बलबीर राणा अडिग

8 Jan 2023