धरा पर जीवन संघर्ष के लिए है आराम यहाँ से विदा होने के बाद न चाहते हुए भी करना पड़ेगा इसलिए सोचो मत लगे रहो, जितनी देह घिसेगी उतनी चमक आएगी, संचय होगा, और यही निधि होगी जिसे हम छोडके जायेंगे।
प्रवासी रीना छुट्टीयों में गांव जा रखी थी उसे बचपन से बहुत जिज्ञासा थी अपनी जन्म थाती पहाड़ी जीवन वैभव देखने और समझने की। गांव की काष्ठ देह ताईयों, चाचियों और हमउम्र सखियों के साथ खूब घूमी। सीढ़ीनुमा खेत, सदाबहार जंगल, रौनकदार बुग्याळ, खाळ, धार, सदानीरा गदेरे, झरने, कोई जगह नहीं छोड़ी साथ में अपने डी एस एल आर और मोबाईल में कैद करती रही प्रकृति की अनुपमताओं को, सेल्फी हल के पीछे कुड़ते चाचा, चट्टान पर घास काटती भाभी, डालियों पर उछल कूद मचाते लंगूर, गोधुली में घर लौटती बकरियों की तांद, अपनों के वियोग में कराहती बूढ़ी दादी, आदी आदी के साथ ।
नित्य सोशियल मिडीया पर अपडेट। कुछ फोटो कविता गजल में गढ़ी जा रही थी कुछ स्लोगनों में मढ़ी जा रही थी। विडीयो यू टयूब और टिकटॉक पर धूम मचा रहे थे। रीना वायरल थी दुनियां में ट्रेंड कर रही थी और अपने काठ के जीवन मे ठाट की बाट जोहता पहाड़ अपनी जगह मूक बदिर रो रहा था, कराह रहा था पलायन के दंश से। संताप में था अपनी जवानी और पानी के लिए जो कभी उसके काम नहीं आई।
@ बलबीर राणा ‘अडिग’
Adigshabdonkapehara
यही प्रकृति निधि यही बही खाते हैं
मोह, प्रेम राग/अनुराग भरे नाते हैं
चेहरे ये आते जाते राहगीरों के नहीं
ये आनन हर उर में घर कर जाते हैं।
पतंग का दीपक प्रेम, पंछी का कीट
मछली का जल, बृद्ध का अतीत
उषा उमंग का निशा गमन करना
दिवा ज्योति का तिमिर हो जाना।
फेरे हैं ये फिर फिर कर फिर आते हैं
यही प्रकृति निधि ..............
सुकुमार मधुमास का निदाघ तपना
निदाघ का मेघ बन पावस में बहना
तर पावसी धरती शरद में पल्लवित
तरुणाई शीतल हेमंत में प्रफुल्लित।
फिर शिशिर में बुढ़े पत्ते झड़ जाते हैं
यही प्रकृति निधि........
मेघों का निर्भीक अंबर टहलना
खगों का निर्वाध विहारलीन होना
चलती पुरवाई निर्झक मदमाती
धरा नन्हे अंकुर को हाथ बढ़ाती।
सृष्टिकर्ता की कृतियाँ जीवन गीत गाते हैं
यही प्रकृति निधि यही बही खाते हैं।
निदाघ - ग्रीष्म, पावस- वर्षा
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
Adigshabdonkapehara
पहले गिरता
कटे पेड़ की तरह
धड़ाम
फिर अंधड, जलजला
भूकंप, सुनामी
एक साथ थामता
पूरी विनाश लीला
को
फिर !
उठ बैठता
शांत सील
जैसा कुछ हुआ
ना हो
चुपचाप टटोलता
है
बबंडर के अवशेष
शरीर पर।
इस सजा की किसी
से
ना सिकवा न शिकायत
हाँ ! आतंकित
करता
परिजनों को हमेशा
के लिए
थमने का।
@ बलबीर राणा
अडिग
Adigshbdonkapehara.blogspot.com
आदर्श पुरुषों और प्रकृति के अनुपन चरित्रों पर बच्चों के नाम रखने की परम्परा आदिकाल से रही है, बशर्ते इस कलिकाल में लक्षमसिंह भ्रातसेवक न होकर भ्रातहंता बन जाता है और राधा रुकमणी नाम अश्लील राधे माँ चरित्र। परम्परा के अनुरूप माँ बाप ने उसका नाम बंसतीं रखा कि उनके आते ही घर में बसंत आ गया और उनकी लाडली भी इसी मधुमास की तरह झकमकार फुल्यार और सुगंध वाली बने। आशावाद जीवन को उर्जित और अर्जित बनाने वाला जो ठहरा, सभी धर्मावलंबी इसी आशावाद से आज भी अपने आदर्श और देव पुरुषों के नाम रिपीट करते हैं।
बसन्ती का नाम भले बसंत पर हो लेकिन उसकी जिजीविषा को इस शब्द ने हमेशा ललकारा और जीवन उपहास करता रहा। हाँ उसने नाम को चरिथार्त करने के लिए कर्मो की आहुति देना जीवन पर्यन्त नही छोड़ा। लोग कहते बसंती तेरा भाग्य नहीं दुर्भाग्य है और दुर्भाग्य का जन्मांतर बसंत से बैर रहता है। पर बसंती को अपने पर आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास था कि वह जीवन को दो मासी बसंत नहीं बारामासी बंसत बनाएगी। उसे यकीन था कि सत्यपथ पर कर्मो की यात्रा बसंत रूपी जीवन तीर्थ पर ही विश्राम लेता है और कुपथगामी फलांग तक ही बसंत देख सकता उसकी अग्रिम राह चौमास के कुहासे में विलीन रहती है जहाँ जिजीविषा को कुछ नहीं दिखता और जीवन को उजास मिलने की उम्मीद बेमानी।
बसंती का बचपन बासंती बयार के संग चुलबुल गीत में फुदक रहा था कि भाग ने भताक मारी और अचानक इस कोमल लता पर ओला वृष्टि हो गयी, ऊपर उठते बेल के हाथों को वृष्टि ने ठंगरा* कर दिया। आठ वर्ष में तात साया उठ गया। माँ उमा देवी का लावण्य यौवन रामस्वेणी* के लबादे में कच्छ का रेगिस्तान बन गया। चंद्रमुखी लौंग के बिना नाक बेसुणा* और अशोका बृक्ष के जैसे शंकुकार सिंदूर के बिगैर माथा खड़खड़ी* चट्टान जैसे दिखने लगी। बिना माली के बगीचे में अब तीन पत्ते, आठ की बसंती चार साल का दीनू (दिनेश) अर माँ उमा। उस दिन माँ बार बार पछाड़ खा बसंती को गले लगाते कहती हे मेरी बसंती चले गया हमारा बंसत हमेशा के लिए और नन्हीं जान कहती नहीं माँ मैं हूँ।
पीताजी चरण सिंह की अपणी निजी गाड़ी थी जिला मुख्यालय से राज्य राजधानी तक रोज आने जाने का गंतव्य, बारह साल की ड्रावरी में न जाने कितने यात्रियों को उनकी सुखद मंजिल तक पहुंचाया था, मिलनसार आधुनिक व्यसन विष से परे ईमानदार आदमी, बड़े बड़े अधिकारियों की पसंद चरणी ड्राइवर। लक्ष्मी खूब मेहरबान हुई। चाक चौबंद घर कूड़ी से लेकर परिवार की आधुनिक साज सज्जा रखी थी। पढ़ी लिखी सुशील सहचरी उमा के साथ दाम्पत्य गमला बसंती और दिनेश दो फूलों से सुशोभित था।
बल जिसका भाग विधाता ने उल्टी कलम से लिखा हो उसके जीवन में खुशी जल्दी रुष्ठ हो जाती है। चरण सिंह भी इसी उल्टी कलम की लिखाई से था। पीताजी भरी जवानी में देश के लिए बॉर्डर पर चिन गया था उसी गस में माँ पाँच साल तक ही पेंशन खा पायी थी। पंद्रह की उम्र में बिना मात तात का पात चौराहे पर पड़ गया। पहाड़ी ढलान का गंगलौड़ा* लुढ़कते संभलते जैसे तैसे बारहवीं कर पाया था। आगे माँ सरस्वती की बाट चलना मुनासिब न देख जिजीविषा ने गाड़ी का स्टेरिंग थाम लिया था। लगन ने तीन साल में ही गाड़ी का मालिक बना दिया था, अंदर बाहर चरण की चराचर, गिरस्थी में बसंत।
श्री लक्ष्मी का अधिक लगाव इन्शान को लालची बना देता है, भव्यता का लुभावन जैसे पतंग का दीपक। इससे चरण सिंह भी अछूता नहीं रहा था। दिन प्रतिदिन नींद हराम कर रात दिन सवारी ढोने लगा। इसी व्यस्तता में एक दिन, रात को सवारी छोड़कर शहर से अकेला घर आ रहा था कि हिम्मत पर नींद भारी पड़ी और गाड़ी सहित अलकनंदा में समा गया। अपना भाग अपने पीछे घर की डंडयाली* पर बैठा गया।
आठ की चुलबुल बसन्ती के बासंती जीवन को अकारण जेठ की तपन, सावन के कुहासे और पूस की ठिठुरन ने एक साथ झपाक से दबोच लिया था। माँ उमा ने नारी सतीत्व सर माथे रख जवानी की रुमानियत को ठेंगा दिखाया और काठ के पहाड़ी जीवन में काठ की देह बनाते हुए गिरस्थ की मूठ संभाल ली। खेती बाड़ी, मनरेगा मजदूरी के साथ आंगनबाड़ी मास्टरणी से चरण सिंह की सजायी गिरहस्थी को बाग के जैसे बिल्ली कर रही थी।
बसंती बेटी-माटी जो ठैरी, कम उम्र में ही माँ की जांठी* बन गयी चुल्हा चौका से लेकर खेत खलिहान तक सहारा। बेटों के बनस्पत बेटियां को भगवान समय से पहले संवेदनशील और अकलवान बना देता है, यह इसलिए भी कि वह धरती माँ का प्रतिरूप जननी होती है। जनक से जननी का स्थान जादा जिम्मेदाराना और पुज्य ठैरा साब। अठारह वर्ष में बारहवीं करने तक लकारवान* बसंती ने ममता की छाँव में काष्ठ के पहाड़ी गिरस्थी के सारे गुर सीख लिए थे।
बेटी की बढ़ती देह देख माँ उमा को चिंता सताने लगी कि आगे की पढ़ाई के लिए बाहर कॉलेज में कैसे भेजूँ, पर बेटी भी सत्य सावित्री की कोख से जन्मी थी माँ को सब ऊँच नीच का वचन दे बसंती ने पितृ पिता चरण सिंह की मेहनती चरण धुली डंडयाली से माथे लगाई और शहर में डिग्री कालेज में एडमिशन ले लिया। छः साल कॉलेज और घर को बराराबर देखते हुए फर्स्ट डिवीजन से मास्टर डिग्री के साथ बी एड पास कर पक्की मास्टरनी बन गयी। भुला दिनेश भी इंटर पास हो गया था। परिवार में एक बार फिर बासंती बयार बहने लगी।
नोकरी के दो साल बाद समझाने बुझाने पर माँ ने बसंती के हाथ पीले कर दिए, जवांई पेशे के जलागम विभाग का सरकारी कलर्क था। घर की बासंती उड़कर दूर काली गंगा पार चली गयी। बुराँस सी लाल, प्योंली सी कोमल बसंती की जोड़ी निरा बेमेल, क्लर्क पतीदेव ठिगने कद का, काला, मितभाषी, रूखा गड़गड़ा*, कम उम्र में बड़ी तौंद, मुँह चौबीस घंटे गुटके से भरा और शाम को पव्वा का याड़ी। बसंती ने शादी के दिन ही देखा था, बरमाला के वक्त सिहरते सोच रही थी इस बेमल से कैसे निभाऊंगी पर अब कर भी क्या सकती वह सेहरा बांध देहरी पर माला ले खड़ा जो हो चुका था। बेमेल जीवन से सामंजस्य बनाना उसने माँ से खूब सीखा था, इसी बेमेल को जीवन का अटूट मेल बनाकर सहेजने का प्रण बरमाला डालते लिया।
शादी से पहले मिलने को उसीने व्यस्तता का वास्ता दे असहमति दी थी। फोटोशॉप की तस्वीर ठीक ठाक लगी थी वही उसकी सोशियल मीडिया डीपी भी थी। फिर बसंती भी आदर्श नारी की प्रतिमूर्ति, लज्जा से खुद मिलने की पहल नही की थी। गाँव वालों ने खूब ताने दिए कि ऐरां रामस्वेणी नोनी जवें मुच्छयळा जनु बाड़ी ढीन फर। भाग ने फिर भताक* मारी थी। (अरे विधवा की की बेटी का जमाई जली लकड़ी जैसा मडुवे के हलवे का गोला)
रिस्ता दूर की रिश्तेदारी ने दूर काली गंगा पार का ढूंढा था इसलिए लड़के का चाल चलन सूत बेंत बंसन्ती और माँ अच्छी तरह नहीं जान पाई थी। मात्र क्लर्की के खूंटे बाँधने और बंधने पर माँ बेटी तैयार हो गयी थी। एक धार* पार बसंती की पोस्टिंग दूसरी धार पार जवांई की। बसन्ती की छुट्टीयाँ कभी ससुराल में सास ससुर की सेवा कभी पति महोदय के साथ तो कभी माँ की खैर खबर में जंदरा* बनी रहती। पति देव सच्ची में बाड़ी का जैसा ढीना, छुट्टी में भी अपनी जगह से हलचल नहीं होता फिर कहाँ की पिकनिक कहाँ का रोमांस घूमना फिरना। साल में महीना भी पति सानिध्य नहीं मिलता जिसके चलते पति को समझने और समझाने में समय की बेड़ियां आड़े आ रही थी।
बंसन्ती ने दाम्पत्य गाड़ी दुरस्त करने के लिए नोकरी छोड़ने का मन बनाया पर उसकी लगन और आदर्श शिक्षिका की भूमिका से सहकर्मीयों और माँ ने इजाजत नहीं दी। शादी की तीसरी सालग्रह पति के साथ कहीं बाहर मनाने की मंसा से जब वह लंबी छुट्टी लेकर पति के सरकारी आवास पहुंची तो कमरे पर ताला और पति नदारद पाया। ऑफिस और अन्य सहकर्मियों से पता चला पंछी उड़कर बिलैत को गई। वहीं पड़ोस की किसी शहरी महिला के साथ पंद्रह दिन पहले बोरी बिस्तरा बांध टेक्सी सवार हुआ था। और उससे पहले ही बड़ी पहुँच से जुगाड़ मारकर शहर में ट्रांसफर करवा लिया था।
अब खा बसंती माछा ! भाग की एक और भताक। एक बार फिर मायके की देहरी पर बैठा बाप का भाग्य उसे ठहाका मारते दिखा। बसंती कहाँ तेरा बसंत। एक महीने बाद उसका फोन आया कि कोर्ट में तलाक के लिए आ जाना, क्या करती तलाक पर हस्ताक्षर किए और रेगिस्तानी दाम्पत्य को तिलांजली दी।
बसंती कभी सोचती थी कि लोगों के तो साटी बुसेन्दा* पर उसके चांवल क्यों ? चलो देखते हैं दुर्भाग्य कितनी भताक देता है असम्भव न बंश में था ना दूध में, कमर कसी और माँ सरस्वती सेवा भाई की पढ़ाई और माँ की देखभाल में जुट गई। माँ ने लाख समझाया कि दूसरी शादी कर ले अकेला जीवन पहाड़ जैसे होता है सामर्थ्य तक चढ़ेगी पर बाद में क्या होगा ? आज मैं हूँ कल को भै-भोज* किसी के नहीं देखते। लेकिन बसंती ने भीष्म प्रण ली थी कि अब दूसरी शादी नहीं करेगी उसे पति जात से भय लगने लगा था।
बेमेल होने के बाद भी जिस मर्द को इतना चाहा दिन में दसियों बार फोन पर खुसखबर लेती थी। कितना अनुरोध किया था कि या मेरी पोस्टिंग अपने कार्यक्षेत्र में कर दो या आप ही यहाँ आ जाओ पर वह मर्यादा की सौतन पहले से बन बैठा था तो कैसे सात फेरे का महत्व समझता। अब आगे धोका नहीं खाना चाहती मैं भी उमा की बेटी हूँ अपने बच्चे नहीं होंगे तो कौन सी जागीर बंशहीन हो जाएगी, ये इतने विद्यार्थी मेरे बच्चे तो है मदर टेरिसा तो इंग्लैंड से आकर कलकत्ता में भविष्य के पौधौ को सींचती रही, ये तो मेरे मुल्क और मेरी थाती के बच्चे हैं।
अब बसंती का तन मन धन इलाके के गरीब बच्चों को संवारने, निआश्रितों और धार्मिक सेवा में इतना तेज भागने लगा कि पता नहीं चला कब मांग के बालों पर बर्फ गिर गयी। कुछ साल बाद माँ भी नाती सुख देख बैकुण्डवासी हो गयी थी। भुला दिनेश बच्चों सहित शहर में प्रवासी बन गया था।
अब अधेड़ बसंती ही पीताजी की बंजर खोळी* खोलनहार, छुटियों में चौक, कुलाणा, बाड़ी-सगौड़ी* साफ करती, लकड़ी पाणी कठ्ठा करती मकान पर धुंवाँ लागाती, द्यबतों* के थान* में दिया जलाती, तीनभित्या मकान के आठ कमरों और बाहर जगंले के बल्ब ऑन करती, घरबार में जाकर दादा दादी की निशानी कुठारों और फुँगलों को अगरबत्ती करती, रोटी सब्जी बनाती पितरों को अग्याल* रखती, मोरी पर पंचमी को जौ लगाती दिवाली में फूल माला। और फिर फुर्सत पर डंडयाली में बैठे पीताजी के भाग और अपने भाग की हंसी ठिठोली देखती कि कौन असली बसंत।
उसके प्रण ने जीवन को स्वयं के नाम का पर्याय बसंत बनाने के लिए कभी विश्राम नहीं लिया शिक्षा सेवा में रहते हुए आदर्श शिक्षक राष्ट्रपति सम्मान, निआश्रित सेवा में कई समाज सेवा सम्मानों से नवाजी गयी। सेवामुक्त होने के बाद थाह नहीं ली पिताजी के त्यभित्या* मकान को दुबारा सजाया संवारा, बगल में और कमरे बनाये फिर घर में ही निःशुल्क बाल विद्यालय खोल दिया।
अब दिन रात बच्चों की चैं चैं पैं पैं से तिबारी महकती है, बाड़ी सगौड़ी में झकमकार नाना प्रकार के पुष्प और सब्जियाँ खिलते हैं, गौशाला में दुध्यार* गाय और उसकी बछिया रंभाती है, और इन सबके लिए एक झुकी कमर, आंखों पर जंरीर वाला चश्मा और सफेद मुंड की यौवना दिन रात खटकती। आज चरण सिंह के घर में बारामास बसंत कभी खिलखिलाकर हंसता कभी मंद मंद मुस्कारता और इसकी सुंगध से मोहित बसंती घिंदुड़ी जैसी फुदकती रहती और चरण सिंह का भाग्य उस डंडयाली को छोड़ चुपचाप कहीं चला गया था हमेशा के लिए।
गढवाली शब्दों का अर्थ
भाग - भाग्य, ठंगरा - ठूंठ, रामस्वेणी - विधवा, बेसुणा - कुरूप, खड़खड़ी - बिना पेड़ पौधौं का भयावह। गंगलौड़ा - गोल पत्थर। डंडयाली - दोमंजिले वाला कमरा। जांठी - लाठी । लकारवान - योग्यवान। गड़गड़ा - अकड़ालू। भताक - ऊंचाई से गिरना। धार - रिज लाईन। जंदरा - हस्त चालक चक्की। साटी - धान। बुस्येन्दा - बाली पर दाना न बनना। भै-भोज - भय्या भाभी। खोली - मकान का मुख्य बड़ा दरवाजा। कुलाणा - मकान का पिछवाड़ा। बाड़ी सगौड़ी - बगीचे, द्यबता - देवता । थान - मंदिर। अग्याल - नैवेद्य। त्यभित्या - तीन दिवालों वाला। दुध्यार - दूध देने वाली।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'
Adigshbdonkapehara.blogspot.com
अरे लाला उज्याड़ खाया
होता तो कोई बात नहीं थी, पर तुने काम ही ऐसा किया कि तेरी धोण काटनी हो रखी है। लाला, काट दे मैने जो इतना गुनाह किया
तो। बोल क्या बात है? अपने घर की बात है परेसान न हो। माँ रुआँसी होते हुए बोली, लाला
तू मेरे पैंसे वापस दे दे मैने कैसे-कैसे एक-एक करके जोड़े थे। लाला सकते में, अरे बोजी तेरी तबियत तो
ठीक है न ! क्या बोल रही है कौन से पैंसे कैसे पैंसे ? कब दिए तूने मुझे पैंसे ? आ
हा हा ! कौन से पैंसे ? देखो कैसे अनजान बन रहा है। ऐसा अन्यों
करेगा तो कैसे पचेंगे तुझे ? माँ ने गुस्से में कहा। दुकानदार अचरज में पड़ गया
कि मैने इनसे कोई पैंसा लिया नहीं लेकिन ये ऐसा आरोप क्यों लगा रही है। लाला कुछ सोचने
के बाद बोला, अच्छा …! तो ये बात है ।
लाला समझा गया था। लाला
हँसते हुए बोला, तभी तों, मैं सोचता था कि ये लड़का डेली पैंसे कहाँ से लाता है। माँ,
हाँऽऽ..... ! चल अब दाँत मत निपोड़। इतना मातबर मत बन। तु सोचता तो मेरी घर कूड़ी खाली नहीं होती।
अरे बोजी मैं सोचता था कि अपका बुड़ापे का लड़का है और तुम उसे देते होंगे। अरे
इतना तो पार चैंधार वाला मास्टर और तल्ला ख्वाळा का सुबेदार भी नहीं देता अपने बच्चों को। सम्भालो
अपने लड़के को। बल ‘सुई पर गीजी च्वोर मौड़ पर गीजी मनस्वाग‘।
आज अपने घर का सफाचट कर रहा है कल हमारे घर में भी हाथ साफ करेगा, लाला उपदेश पर आ
गया।
माँ, फिर ताना देते हुए।
ओ हो हो....! हे मेरा इमानदार। पूसू तू भला काम नहीं कर रहा है, मेरी जड़ घाम लगेगी
तो फिर देख गरीब के आँसू कहाँ लगेंगे। अरे जब तू समझा गया था कि बच्चा घर से पैंसे
चुराकर तेरी दुकान से टॉफी बिस्कुट खा रहा है तो तूने हमको क्यों नहीं बताया ? कुछ
जमीर बचा या नहीं ? हाँऽऽ... तुम दुकानदारों को तो अपनी बिक्री से मतलब है। अब हिंकी
फिंकी न कर और मेरे जितने पैंसे हैं तेरी दुकान में आये हैं उसे लौटा दे। लाला। अच्छा
! कितनी सयानी हो रखी है, जैसे ये सब समान तूने खरीद कर रखे हों मेरे पास। मेरी टोफी
बिस्कुट जैसे फ्री के आ रखे होगें। तेरा बेटा पिछले तीन महिने से खुद भी चटका रहा है
और अपने दोस्तों को भी खिला रहा है। तभी तो ! मैं कह रहा था कि आजकल मस्तू मास्टर और
सोबनी सुबेदार का लड़का तेरे बेटे के साथ एक गळज्यू
क्यों हो रखे हैं, हर समय उसके साथ चिपके रहते हैं। कोई चीज होती तो मैं बोलता वापस
कर दो, अब खाने वाली चीज कैसे वापिस करोगे ? कर सकते हो तो कर दो मैं आपके पैंस वापस
कर दूँगा वैसे एक बार खरीदा हुआ समान वापस नहीं होता।
माँ फुसलाने वाले अन्दाज
में, चल ये बता वो खडोण्यां आज तक कितने पैंसे लाया होगा तेरे यहाँ ? लाला इतना हिसाब
मैंने भी नहीं लगाया लेकिन लगभग पाँचेक सौ से ज्यादा तो चटका गया होगा, तीन महिने से
लगभग हर दिन आ रहा वह दुकान में। माँ, यहाँ क्या किसी और दुकान में से भी खाता होगा,
पाँचेक सौं से गड्डी इतनी कम नहीं होती। वो तो कल मेरी नजर पड़ गयी कुट्यारी पर। तू
ही बता लाला, मैं तो ठैरी निरपट अनपढ, गिनना मुझे आता नहीं। अब कितने थे पर गठठी से
अन्दाज है चारेक हजार से उपर ही होंगे। अब वहाँ आधे भी नहीं हैं। सबसे छोटा एक रुपये
के नोट से सौ तक थे, बड़े नोट वहीं है पर छोटे वाले सफाचट कर गया निहोण्यां। चल तुने भी क्या करना दुकानदार सौकार जो है, अपना
ही सिक्का खोटा है। और माँ आँसू पौंछते हुए
पुष्कर लाला के घर से निकल गयी।
इस पूरे वार्तालाभ को
मैं लाला के घर के पीछे छुपकर सुन रहा था, मुझे काटो तो खून नहीं। अब आज घर में मेरी
जो पूजा होनी थी उससे अभी से कंपकंपी आने लग गयी थी। और उस दिन पहली बार मेरे बाल चित
को अपराध बोध का अहसास हुआ। उस दिन शाम को कंडाली से खूब स्वागत हुआ। पिताजी जरा नरम
स्वभाव के थे हैरान तो थे लेकिन आखिर माँ के हाथ से कंडाली उन्होने छीनी थी । तात मन
कितना दीर्घ और बड़ा होता है यह भी पहली बार महसूस हुआ। एक दो दिन बाद फिर सब सामान्य
हो गया था सन्दूक की चाबी अब माँ अपने अंगडी पर रखने
लग गयी थी, हाँ चोरी की परिभाषा मेरे दिलो दिमाग में हमेशा के लिए लाॅक हो गया थी।
छः सात साल उम्र की वह
घटना मुझे जीवन का एक बड़ा सूत्र सिखा गयी थी। पुष्कर लाला के शब्द आज भी कानों में
गूँजते रहते हैं कि ‘सुई पर गीजी च्वोर मौड़ पर गीजी मनस्वाग।
वाकया मेरे बाल्यकाल अस्सी के दशक के उत्तरार्ध का है मेरी उम्र महज छः सात साल की रही होगी। घर में खाने पीने और पहनने ओड़ने की कमी नहीं थी और स्कूल के लिए हप्ते दस दिन में चैवनी अठ्ठनी पॉकेट मनी के रुप मिल जाती थी। एक दिन की बात है मुझे स्कूल के लिए पैंसे चाहिए थे और पिताजी घर पर नहीं थे मैंने माँ से पैंसों की मांग की। माँ अन्दर घरबार में गई मैं भी माँ के पीछे चला था। माँ ने एक छोटे से काठ के सन्दूक की चाबी खोली और उससे एक पोटली निकाली जिसके अन्दर दो तीन मोटी गड्डियां नोटों की थी। माँ ने एक गड्डी के बीच से दो रुपये का नोट मुझे दिया था। उसे गिनना तो नहीं आता था लेकिन नोट का साईज और रंग से पहचान जाती थी कितने का नोट है। उस दिन मैं गड्डियों को देख अचंभित हुआ कि यहाँ तो बहुत माया है। बस क्या था कैसे ना कैसे मैने चाबी रखने की जगह खोज ली और शुरु हो गया वहाँ से नोट खिसकाने। दो तीन महिने तक यह सिलसिला चलता रहा जब तक पकड़ायी नहीं मिली थी।
माँ का वह सन्दूक प्रतिकूल
परिस्थितियों में हमारे परिवार की लाईफ लाईन थी। सन्दूक क्या वह ऐन मौके पर द्रपदी
का कृष्ण था। विषेशकर मेहमान नवाजी में। उस सन्दूक में माँ के जेवर या कपड़े नहीं बल्कि
वे जरुरी सामान होते थे जो प्रतिकूल परिस्थितियों में जरुरत को पूरा करते थे। जैसे
सेर पाथी घी, दाल, चीनी, चाय पत्ती, चांवल, एक आध किलो प्याज, आलू और कुछ सूखी सब्जीयाँ।
इस राशन का टर्न ओबर माँ अपने हिसाब से करती रहती थी। परिवार में सबको पता तो था कि
इसमे कुछ है लेकिन उन्हें ये पता नहीं था कि क्या क्या है और कितना है, इस्तेमाल होने
पर ही पता चलता। सन्दूक की चीजें अमरजेन्सी मे इस्तेमाल की जाती थी।
माँ के इन पैंसों का
स्रोत शादी ब्याह या कारिजों की पौ-पिठें, घर आये मेहमान
द्वारा हमारे हाथों में रखे हुए, या गाय भैंस, बकरी के बिक्री पर क्रेता द्वारा दिया
गया किलमकुळा आदि होता था।
कोरोनाकाल के सुरुवाती
लॉकडाउन के दौर में जब सब कुछ बंद हो गया था और लोग दुकानो से भर-भर राशन जमा करने
लगे थे तो तब बरबस ही माँ के उस सन्दूक की याद आई कि संग्रह कैसे संकट मोचन होता है।
आज बाजारवाद के इस युग में लाओ और खावो की आदत ने लोगों की इस आदत का साथ छुड़वा दिया
है। इस डिजीटल दौर में तो लोग घर पर पैंसे भी नहीं रख रहे हैं। लॉकडाउन या कर्फू जैसे
अमरजेन्सी हालात में इन्शान खाली हाथ फिर सरकार और संस्थाओं पर हायतौबा !
बचपन की चोरी की इस घटना
ने प्रशंगवस घर पर संग्रह और बचत के महत्व की प्रसांगिकता को और भी स्पष्ट कर दिया
है, साथ ही उस डकैती पर गुस्सा, तरस और हँसी भी आती है।
@ बलबीर राणा
अडिग
गढ़वाली शब्दों का अर्थ :-
कर्छुले - पगड़ी के अन्दर, बौजी दृ भाभी, चव्वा दृ नीव, उज्याड़ -मवेसियों द्वारा दूसरे के खेत का नुकसान करना, धोण दृ गर्दन, अन्यों दृ अन्या, मातबर दृ ईमानदार, तल्ला ख्वाळे - नीचे का मुहल्ला सुई पर गीजी च्वोर मौड़ पर गीजी मनस्वाग’- सुई पर चोरी आदत और मुरदे पर बाघ को आदमी के मांस का स्वाद लगना, गळज्यू - एक जी पराण, खडोण्यां - खड्डे डालने लायक (एक प्रकार की गाली) कुट्यारी -पेटली, काठ - लकड़ी, कंडाली - बिच्छू घास, अंगडी - उपर का अंग वस्त्र, निहोण्यां - नहीं होने वाली औलाद (एक प्रकार की गाली), घरबार - घर मे अनाज और अन्य सम्पति रखने का कमरा, सेर पाथी - एक आध किलो, पौ-पिठें - सगुन, किलमकुळा - जानवर के किले का मोल जिसे सगुन के रुप में दिया जाता है।