गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

नूतन इक्कीस के नाम काका की चिठ्ठी

 

    


    प्रिय नूतन इक्कीस तेरी जग्वाल अब समाप्ती की ओर है और अब पांच घंटे के बाद तेरी नन्हीं किलकारियां इस धरा मंडल पर गुंजनी सुरु हो जायेंगी। तेरे आने की खुशी में पृथवी वासी अति ब्याकुल हैं। कोई केक, कोई दिया बाती, पटाके फुलझड़ीयां लेकर तेरे स्वागत के लिए बेकरार हैं कुछ कुछ ने तो महंगी से महंगी ब्रान्ड ले रखी हैं कि आज तो छक पीना है और कल से लालमणी को बिल्कुल हाथ नहीं लगायेंगे बल, कसम से। कुछ कुछ तो अबेर के जैसे बोल्या सिगरेट बीड़ी के सुटटे पर सुटटे ऐसे मार रहें है जैसे हाफ टाईम में बाथरुम की आड़ में स्कुल्या छोरे मारते हैं। वे भी कल से पीताम्बरी और स्वेताम्बरी को तिलांजली देगें बल। और तो और कुछ कुछ आदर्श खरचिली गृहणियों ने आज खूब सौपिंग कर ली और घर में खूब पार्टी सार्टी का इंतजाम भी किया कि कल से वे अपने फिजूलखर्ची पर लगाम लगायेंगे। ये तो भ्वोळ से ही देखी जायेगी कि कौन कितना वादा निभता है। प्रिय नूतन इसी तरह पिछले अन्य बर्षों के आने के स्वागत में पृथवी लोकवासी आने वाले नूतन वर्ष का स्वागत सत्कार करते आये है और आगे भी करते रहेंगे। यह लोक आशाबाद पर जीता है और आने वाली चुनौतियों का मुकाबला करता है।  

      अब तेरे आने से पहले पत्र लिखने का खास कारण इस प्रकार है कि रिवाज के अनुरुप पिछले साल तेरे बड़े भाई बीस बीस के स्वागत में हमने कोई कोर कसर छोड़ी थी। पर वा र्निभगी ना ना प्रकार के दुख और सबक दे गया। पिछली जनवरी को चीन के बुहान के अलावा पूरा विश्व नव उंमग और नव उर्जा के साथ बीस के साथ आन्दमयी जीवन निभाने के लिए अपने अपने कर्यों में तल्लीन हो गये थे। मार्च आते आते एक अदृश्य वायरस करोना ने सारे संसार को हिलाना सुरु कर दिया और जन मानस अपनी जान की चिन्ता में त्राहीमान करने लगे।

हमारे देश में सफेद दाड़ी बाल वाले राष्ट्र नायक ने बाईस मार्च को जनता र्कफ्यू की अपील कर दी पूरे देश ने राष्ट्र नेता की आज्ञा का पालन किया और जनता र्कफ्यू को सफल बनाया फिर क्या था फिर था सफेद दाड़ी बाल वाले ने पच्चीस मार्च से सम्पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी, और यह सिलसिला आगे बड़ता गया। जीवन पंछी के पर रुक गये जीवन घरों में कैद हो गया। राशन की दुकानों में लाईन लम्बी होती गयी। पेट्रोल पम्प घाम तापने लग गये सड़के सूनी हो गयी, रेल, जहाज, गाड़ी, घोड़े खाली हाथ बैल बेचे जैसे हल्या के खोल्ये रह गये।

प्रिय नूतन इक्कीस बाबू एक हप्ते में सम्पूर्ण धरती ऐसे चकाचक साफ हो गई मानो ऐरियल डिटर्जेन्ट से धुलाई की हो। खग मृग पोन पंछी स्वछन्द विचरण करने लग गये। वाटसैप फेसबुक के भले दिन आ गये लोग विडीयो कॉल और ऑनलाईन में करतब दिखाने लगे। घर में बैठे बच्चे बड़े बूड़ों संग रामायाण देख संस्कार सिखने लगे और दादी नानियों के किस्सों के दिन आने लगे। एक ही घर के अन्दर रहने वाले जो जो भाई भौज नोकरी के चलते हप्तों तक आपस में नहीं मिल पाते थे वे आपस में कैरम बेटमिंटन, सांप सीड़ी, लूडो और तास सीप में जमने लगे। मर्द किचन और फर्स पौंचे में बीबी का हाथ बांटने लगा। सुबह सुबह घर की छतों में सूर्य नमस्कार और योगासन होने लगा। भारतीय आयुर्वेद जुबान से व्यवहार में आने लगा। बिचारे तेज पत्ता काली मिर्च सौंप, गिलोई आदी औषधियों की घर घर कुटाई होने लगी। रामदेव बाबा की दुकान को और चार चांद लगने लगा।    

      नूतन इक्कीस बाबू तीन महीने ऐसे ही किसी की मौज में तो किसी की फौज में कटी विशेषकर  अपने मजदूर भाईयों का सबसे ज्यादा निरोण हुआ विचारे झोला तमला और अपने सेर पाथों को कोळी उठाकर पैदल ही भूखे नंगे अपने पुश्तेनी घर कूड़ी की और लौटने लगे। गांव की बंजर कुड़ियां आवाद होने लगी। विरान उबरों से धुंवा आने लगा तो जाले लगे डंडियाळियां चहकने लगी। बांझ से घीरी चौक की पठाली बांझा मुक्त होकर खुशी के मारे नाचने लगी। चलो यह र्निभगी करोना किसी के मुख पर तो हंसी लाया।

      पर बाबू क्या बोलना इस दुर्बीज ने ऐसा अनर्थ किया कि जो इसका ग्रास बना उसको अपनो के हाथ का आखरी पानी की घूंट तो दूर कंधा तक नसीब नहीं हुआ। लोग अपनों से ही भय खाने लगे। खिलते स्वाणे मुखड़ों पर म्वाले लग गये, लोग हाथ मिलाना तो दूर हर घड़ी सनिटाईजर से हाथ मलने लगे। लुतड़े लग गये बाबा हाथों पर। बाहर से आये आदमी को लोग ऐसे देखने लगे ऐ ब्वोयी जैसे यमराज आया हो। खैर जाने वाले ने जाना ही था क्योंकि उसका दाना पानी इस लोक में समाप्त हो चुका था पर भय नाग बन सबके झिकुडियों को हिर्र हिर्र डराता रहा। सबसे ज्यादा नींद खराब उन ज्वान नोने नोनियों की हुई जिनकी शादी कैन्सल हुई ऐंरा बिचारे तीन तीन, चार चार महिने सुहागरात की जग्वाल में करवट बदलते रहे। 

      चलो जैसे तैसे सरकार और जनता ने हिम्मत बांधी और काल करोना के साथ जीने का तरिका अपनाना सुरु किया नयें अंग्रेजी शब्द आम लोगों की घर्या जुबानी डिक्सनरी और व्यवहार में शामिल हो गये। जैसे सेनिटाईजेशन, सोशियल डिस्टेसिंग, क्वारन्टाईन, होम आईसोलेसन आदी आदी। बाबू जून से लॉककडाडन खुलना सुरु हुआ और आम जिन्दगी पटरी पर आने लगी। अब तेरे बड़े भ्राता बीस के जाते जाते वैज्ञानिकों ने दुनियां की सांस बढ़ा दी है कि ब्वना छाँ कि वेक्सीन तैयार हो गई बल। किसी किसी देश ने तो लगानी भी सुरु कर दी है बल। पर अभी भी वो लम्बा सफेद फ्रेंचकट दाड़ी वाला अमिताभ बच्चन अपनी भारी रौबिली आवाज में मोबाईल पर समझा बुझा रहा है कि जब तक दवाई नही तब कोई ढिलाई नहीं। अफूं त ढीला होकर करोना ग्रसित हो गया था पर भाई आखिर जंग जीत गया तो उसने बोलाना ही जो ठैरा।

      ये है बाबू नूतन इक्कीस तेरे पीठी के बड़े भाई बीस की बिदागत। ये तुझे इस लिए बताना भी जरुरी था कि उसका असर पसर तेरे पर भी पूरा का पूरा रहने वाला जो ठैरा ताकि तू भी अभी से कमर कस ले। पर बाबू और कुछ अचाणचक वाली आफद मत लाना यार जैसे बाड़ साड़, रगड़ बगड़, खंड मंड और चीन पाकिस्तान जैसे दुर्बिज पड़ोसियों की बिना बात की छिंज्याट। तुझे पता नहीं कि इन झगड़े फिरसादों और करोना के चक्कर से हमारे कई फौजी भाई पूरे साल भर छुटटी नहीं काट पाये ऐरां विचारे देश खातिर लदाख, नीती माणा, सिक्किम और अरुणाचल की हिंवाली पहाड़ियों में तड़तड़े अडिग हैं। चल त मैं भी अब तेरे स्वागत की तैयारी करता हूँ मेरे दगड़या ने स्पेशल ब्रांड रखी है बल आज। बाकी भ्वोळ से देखा जायेगा तेरे साथ। जय हिन्द।

                                                                    तेरा शुभचिन्त

                                                                    अडिग काका

 

@ बलबीर सिंह राणा अडिग

बीस सौ बीस

बीस सौ बीस चला गया तू

चित्र विचित्र दिखा गया तू 

एक ही भेषधारी मानवों में 

देव दानवों को बता गया तू।


इतिहास तुझे जब याद करेगा

पुनरावृति न हो फरियाद करेगा 

देह अपनो के हाथ को तरसी थी 

निरीह निरासा के लिए याद करेगा। 


हाँ कुछ अद्भुत तू  दिखा गया

कुछ नव नीत रीत सिखा गया

चंद में भी निभ जाता जीवन 

राह संयम धैर्य की दिखा गया। 


सत रंगों से विलग तेरे रंग देखे 

कुछ पद छंदों में, कुछ भंग देखे 

नकली शोर सराबे से कुछ दिन

प्रकृति और प्रदत संग संग देखे।


साल बुरा नहीं था बनाया गया 

सरारती जाल में फंसाया गया

बुरे मुल्क के किये के सिले से

सबको भंवर में डुबाया गया । 


अब रुके आहिस्ता चलने लगे 

चेहरों के ढक्कन उतरने लगे

संकुचित वैभव की कलियाँ 

कुसुम बन चमन में फूलने लगे। 


चल अलविदा बीस बीस 

नहीं है तुझसे कोई रीस 

उतार चढ़ाव का है जीवन 

बुझती नहीं जिजीविषा तीस। 


31 दिसंबर 2020

@ बलबीर राणा अड़िग








गुरुवार, 12 नवंबर 2020

दिवाली मुक्तक

 


हजारों दिये चाहे जलाओ घर में
झुलाओ झालरों को पूरे शहर में
तम चमक से तिमिर जाने का नहीं
जो राम ना बसा हो अगर उर में।
 
उड़ाओ रॉकेटों को फोड़ों पटाके
चलाओ अनारों को करो धमाके
खुशी नाद बनके गुंजेगी तभी 
जब चले़ कर्म मर्यादा के रास्ते।
 
रहे भान इतना दिवाली अहम ना बने
बारुद और कचरे से माँ धरा ना पटे
जले प्रेम दीप घर और चौक चोबारा
राम लौ से कोई कौना अछूता ना रहे।
 
बटुवे में रोशनी नहीं समाती
बल-दल शक्ति खुशी नहीं लाती 
राम सोच विचार का नाम दिवाली
ये मनुज मन को उज्जास कराती ।
 
जलेगा प्रीत दीप तो अंधिया ढहेगा
निर्मल गंगा के जैसे निर्वाध बहेगा
तन मन पाप मैल से मुक्त होके रहेगा
पर्व पावक था, है, पावक ही रहेगा।
 
दीप छोटा सा है सूर्य अवतार है
धूप ना दे सके फिर भी पहरेदार है
भले एक फूंक का है वो निवाला
लगे देह पर तो फिर वो अंगार है। 
 
भले सुदामा से पिंड छुड़ा लिया हो
दुधिया बल्बों से घर जगमगाया हो 
दुबका तिमिर कौने का भागेगा नहीं  
रामचरित्र दीप जब ना टिमटिमाया हो। 
 
@ बलबीर राणा ‘अडिग’
 
www.adigshabdonkapehara.blogspot.com


 


 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2020

वायरल पहाड़

 


      प्रवासी रीना छुट्टीयों में गांव जा रखी थी उसे बचपन से बहुत जिज्ञासा थी अपनी जन्म थाती पहाड़ी जीवन वैभव देखने और समझने की। गांव की काष्ठ देह ताईयों, चाचियों और हमउम्र सखियों के साथ खूब घूमी। सीढ़ीनुमा खेत, सदाबहार जंगल, रौनकदार बुग्याळ, खाळ, धार, सदानीरा गदेरे, झरने, कोई जगह नहीं छोड़ी साथ में  अपने डी एस एल आर और मोबाईल में कैद करती रही प्रकृति की अनुपमताओं को, सेल्फी हल के पीछे कुड़ते चाचा, चट्टान पर घास काटती भाभी, डालियों पर उछल कूद मचाते लंगूर, गोधुली में घर लौटती बकरियों की तांद, अपनों के वियोग में कराहती बूढ़ी दादी, आदी आदी के साथ ।

      नित्य सोशियल मिडीया पर अपडेट। कुछ फोटो कविता गजल में गढ़ी जा रही थी कुछ स्लोगनों में मढ़ी जा रही थी। विडीयो यू टयूब और टिकटॉक पर धूम मचा रहे थे।  रीना वायरल थी दुनियां में ट्रेंड कर रही थी और अपने काठ के जीवन मे ठाट की बाट जोहता पहाड़ अपनी जगह मूक बदिर रो रहा था, कराह रहा था पलायन के दंश से। संताप में था अपनी जवानी और पानी के लिए जो कभी उसके काम नहीं आई।

@ बलबीर राणा ‘अडिग’

Adigshabdonkapehara 


रविवार, 18 अक्टूबर 2020

प्रकृति निधि

 यही प्रकृति निधि यही बही खाते हैं

मोह, प्रेम राग/अनुराग भरे नाते हैं

चेहरे ये आते जाते राहगीरों के नहीं

ये आनन हर उर में घर कर जाते हैं।


पतंग का दीपक प्रेम, पंछी का कीट

मछली का जल, बृद्ध का अतीत

उषा उमंग का निशा गमन करना

दिवा ज्योति का तिमिर हो जाना।


फेरे हैं ये फिर फिर कर फिर आते हैं

यही प्रकृति निधि ..............


सुकुमार मधुमास का निदाघ तपना

निदाघ का मेघ बन पावस में बहना

तर पावसी धरती शरद में पल्लवित

तरुणाई शीतल हेमंत में प्रफुल्लित।


फिर शिशिर में बुढ़े पत्ते झड़ जाते हैं

यही प्रकृति निधि........


 मेघों का निर्भीक अंबर टहलना

खगों का निर्वाध विहारलीन होना

चलती पुरवाई निर्झक  मदमाती

धरा नन्हे अंकुर को हाथ बढ़ाती।


सृष्टिकर्ता की कृतियाँ जीवन गीत गाते हैं

यही प्रकृति निधि यही बही खाते हैं।


निदाघ - ग्रीष्म,  पावस- वर्षा


@ बलबीर राणा 'अड़िग'

Adigshabdonkapehara 

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

मिर्गी वाला

 

पहले गिरता

कटे पेड़ की तरह धड़ाम

फिर अंधड, जलजला

भूकंप, सुनामी

एक साथ थामता

पूरी विनाश लीला को

फिर !

उठ बैठता

शांत सील

जैसा कुछ हुआ ना हो

चुपचाप टटोलता है

बबंडर के अवशेष

शरीर पर।

इस सजा की किसी से

ना सिकवा न शिकायत

हाँ ! आतंकित करता

परिजनों को हमेशा के लिए

थमने का। 

 

@ बलबीर राणा अडिग

Adigshbdonkapehara.blogspot.com


 

 

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020

बसंती



      आदर्श पुरुषों और प्रकृति के अनुपन चरित्रों पर बच्चों के नाम रखने की परम्परा आदिकाल से रही है, बशर्ते इस कलिकाल में लक्षमसिंह भ्रातसेवक न होकर भ्रातहंता बन जाता है और राधा रुकमणी नाम अश्लील राधे माँ चरित्र। परम्परा के अनुरूप माँ बाप ने उसका नाम बंसतीं रखा कि उनके आते ही घर में बसंत आ गया और उनकी लाडली भी इसी मधुमास की तरह झकमकार फुल्यार और सुगंध वाली बने। आशावाद जीवन को उर्जित और अर्जित बनाने वाला जो ठहरा, सभी धर्मावलंबी इसी आशावाद से आज भी अपने आदर्श और देव पुरुषों के नाम रिपीट करते हैं। 

     बसन्ती का नाम भले बसंत पर हो लेकिन उसकी जिजीविषा को इस शब्द ने हमेशा ललकारा और जीवन उपहास करता रहा। हाँ उसने नाम को चरिथार्त करने के लिए कर्मो की आहुति देना जीवन पर्यन्त नही छोड़ा। लोग कहते बसंती तेरा भाग्य नहीं दुर्भाग्य है और दुर्भाग्य का जन्मांतर बसंत से बैर रहता है। पर बसंती को अपने पर आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास था कि वह जीवन को दो मासी बसंत नहीं बारामासी बंसत बनाएगी। उसे यकीन था कि सत्यपथ पर कर्मो की यात्रा बसंत रूपी जीवन तीर्थ पर ही विश्राम लेता है और कुपथगामी फलांग तक ही बसंत देख सकता उसकी अग्रिम राह चौमास के कुहासे में विलीन रहती है जहाँ जिजीविषा को कुछ नहीं दिखता और जीवन को उजास मिलने की उम्मीद बेमानी। 

    बसंती का बचपन बासंती बयार के संग चुलबुल गीत में फुदक रहा था कि भाग ने भताक मारी और अचानक इस कोमल लता पर ओला वृष्टि हो गयी, ऊपर उठते बेल के हाथों को वृष्टि ने ठंगरा* कर दिया। आठ वर्ष में तात साया उठ गया। माँ उमा देवी का लावण्य यौवन रामस्वेणी* के लबादे में कच्छ का रेगिस्तान बन गया। चंद्रमुखी लौंग के बिना नाक बेसुणा* और अशोका बृक्ष के जैसे शंकुकार सिंदूर के बिगैर माथा खड़खड़ी* चट्टान जैसे दिखने लगी। बिना माली के बगीचे में अब तीन पत्ते, आठ की बसंती चार साल का दीनू (दिनेश) अर माँ उमा। उस दिन माँ बार बार पछाड़ खा बसंती को गले लगाते कहती हे मेरी बसंती चले गया हमारा बंसत हमेशा के लिए और नन्हीं जान कहती नहीं माँ मैं हूँ। 

   पीताजी चरण सिंह की अपणी निजी गाड़ी थी जिला मुख्यालय से राज्य राजधानी तक रोज आने जाने का गंतव्य, बारह साल की ड्रावरी में न जाने कितने यात्रियों को उनकी सुखद मंजिल तक पहुंचाया था, मिलनसार आधुनिक व्यसन विष से परे ईमानदार आदमी, बड़े बड़े अधिकारियों की पसंद चरणी ड्राइवर। लक्ष्मी खूब मेहरबान हुई। चाक चौबंद घर कूड़ी से लेकर परिवार की आधुनिक साज सज्जा रखी थी। पढ़ी लिखी सुशील सहचरी उमा के साथ दाम्पत्य गमला  बसंती और दिनेश दो फूलों से सुशोभित था। 

     बल जिसका भाग विधाता ने उल्टी कलम से लिखा हो उसके जीवन में खुशी जल्दी रुष्ठ हो जाती है।  चरण सिंह भी इसी उल्टी कलम की लिखाई से था। पीताजी भरी जवानी में देश के लिए बॉर्डर पर चिन गया था उसी गस में माँ पाँच साल तक ही पेंशन खा पायी थी।  पंद्रह की उम्र में बिना मात तात का पात चौराहे पर पड़ गया। पहाड़ी ढलान का गंगलौड़ा* लुढ़कते संभलते जैसे तैसे बारहवीं कर पाया था। आगे माँ सरस्वती की बाट चलना मुनासिब न देख जिजीविषा ने गाड़ी का स्टेरिंग थाम लिया था। लगन ने तीन साल में ही गाड़ी का मालिक बना दिया था, अंदर बाहर चरण की चराचर, गिरस्थी में बसंत। 

     श्री लक्ष्मी का अधिक लगाव इन्शान को लालची बना देता है, भव्यता का लुभावन जैसे पतंग का दीपक। इससे चरण सिंह भी अछूता नहीं रहा था। दिन प्रतिदिन नींद हराम कर रात दिन सवारी ढोने लगा। इसी व्यस्तता में एक दिन, रात को सवारी छोड़कर शहर से अकेला घर आ रहा था कि हिम्मत पर नींद भारी पड़ी और गाड़ी सहित अलकनंदा में समा गया। अपना भाग अपने पीछे घर की डंडयाली* पर बैठा गया।

     आठ की चुलबुल बसन्ती के बासंती जीवन को अकारण जेठ की तपन, सावन के कुहासे और पूस की ठिठुरन ने एक साथ झपाक से दबोच लिया था। माँ उमा ने नारी सतीत्व सर माथे रख जवानी की रुमानियत को ठेंगा दिखाया और काठ के पहाड़ी जीवन में काठ की देह बनाते हुए गिरस्थ की मूठ संभाल ली। खेती बाड़ी, मनरेगा मजदूरी के साथ आंगनबाड़ी मास्टरणी से चरण सिंह की सजायी गिरहस्थी को बाग के जैसे बिल्ली कर रही थी। 

     बसंती बेटी-माटी जो ठैरी, कम उम्र में ही माँ की जांठी* बन गयी चुल्हा चौका से लेकर खेत खलिहान तक सहारा। बेटों के बनस्पत बेटियां को भगवान समय से पहले संवेदनशील और अकलवान बना देता है, यह इसलिए भी कि वह धरती माँ का प्रतिरूप जननी होती है। जनक से जननी का स्थान जादा जिम्मेदाराना और पुज्य ठैरा साब। अठारह वर्ष में बारहवीं करने तक लकारवान* बसंती ने ममता की छाँव में काष्ठ के पहाड़ी गिरस्थी के सारे गुर सीख लिए थे। 

       बेटी की बढ़ती देह देख माँ उमा को चिंता सताने लगी कि आगे की पढ़ाई के लिए बाहर कॉलेज में कैसे भेजूँ,  पर बेटी भी सत्य सावित्री की कोख से जन्मी थी माँ को सब ऊँच नीच का वचन दे बसंती ने पितृ पिता चरण सिंह की मेहनती चरण धुली डंडयाली से माथे लगाई और शहर में डिग्री कालेज में एडमिशन ले लिया। छः साल कॉलेज और घर को बराराबर देखते हुए फर्स्ट डिवीजन से मास्टर डिग्री के साथ बी एड पास कर पक्की मास्टरनी बन गयी। भुला दिनेश भी इंटर पास हो गया था। परिवार में एक बार फिर बासंती बयार बहने लगी। 

     नोकरी के दो साल बाद समझाने बुझाने पर माँ ने बसंती के हाथ पीले कर दिए, जवांई पेशे के जलागम विभाग का सरकारी कलर्क था। घर की बासंती उड़कर दूर काली गंगा पार चली गयी। बुराँस सी लाल, प्योंली सी कोमल बसंती की जोड़ी निरा बेमेल,  क्लर्क पतीदेव ठिगने कद का, काला, मितभाषी, रूखा गड़गड़ा*, कम उम्र में बड़ी तौंद, मुँह चौबीस घंटे गुटके से भरा और शाम को पव्वा का याड़ी। बसंती ने शादी के दिन ही देखा था, बरमाला के वक्त सिहरते सोच रही थी इस बेमल से कैसे निभाऊंगी पर अब कर भी क्या सकती वह सेहरा बांध देहरी पर माला ले खड़ा जो हो चुका था। बेमेल जीवन से सामंजस्य बनाना उसने माँ से खूब सीखा था, इसी बेमेल को जीवन का अटूट मेल बनाकर सहेजने का प्रण बरमाला डालते लिया। 

    शादी से पहले मिलने को उसीने व्यस्तता का वास्ता दे असहमति दी थी। फोटोशॉप की तस्वीर ठीक ठाक लगी थी वही उसकी सोशियल मीडिया डीपी भी थी। फिर बसंती भी आदर्श नारी की प्रतिमूर्ति, लज्जा से खुद मिलने की पहल नही  की थी। गाँव वालों ने खूब ताने दिए  कि ऐरां रामस्वेणी नोनी जवें मुच्छयळा जनु बाड़ी ढीन फर। भाग ने फिर भताक*  मारी थी। (अरे विधवा की की बेटी का जमाई जली लकड़ी जैसा मडुवे के हलवे का गोला)

       रिस्ता दूर की रिश्तेदारी ने दूर काली गंगा पार का ढूंढा था इसलिए लड़के का चाल चलन सूत बेंत बंसन्ती और माँ अच्छी तरह नहीं जान पाई थी। मात्र क्लर्की के खूंटे बाँधने और बंधने पर माँ बेटी तैयार हो गयी थी। एक धार* पार बसंती की पोस्टिंग दूसरी धार पार जवांई की। बसन्ती की छुट्टीयाँ कभी ससुराल में सास ससुर की सेवा कभी पति महोदय के साथ तो कभी माँ की खैर खबर में जंदरा* बनी रहती। पति देव सच्ची में बाड़ी का जैसा ढीना, छुट्टी में भी अपनी जगह से हलचल नहीं होता फिर कहाँ की पिकनिक कहाँ का रोमांस घूमना फिरना।  साल में महीना भी पति सानिध्य नहीं मिलता जिसके चलते पति को समझने और समझाने में समय की बेड़ियां आड़े आ रही थी। 

        बंसन्ती ने दाम्पत्य गाड़ी दुरस्त करने के लिए नोकरी छोड़ने का मन बनाया पर उसकी लगन और आदर्श शिक्षिका की भूमिका से सहकर्मीयों और माँ ने इजाजत नहीं दी। शादी की तीसरी सालग्रह पति के साथ कहीं बाहर मनाने की मंसा से जब वह  लंबी छुट्टी लेकर   पति के सरकारी आवास पहुंची तो कमरे पर ताला और पति नदारद पाया। ऑफिस और अन्य सहकर्मियों से पता चला पंछी उड़कर बिलैत को गई। वहीं पड़ोस की किसी शहरी महिला के साथ पंद्रह दिन पहले बोरी बिस्तरा बांध टेक्सी सवार हुआ था। और उससे पहले ही बड़ी पहुँच से जुगाड़ मारकर शहर में ट्रांसफर करवा लिया था।

      अब खा बसंती माछा ! भाग की एक और भताक। एक बार फिर मायके की देहरी पर बैठा बाप का भाग्य उसे ठहाका मारते दिखा। बसंती कहाँ तेरा बसंत। एक महीने बाद उसका फोन आया कि कोर्ट में तलाक के लिए आ जाना, क्या करती तलाक पर हस्ताक्षर किए और रेगिस्तानी दाम्पत्य को तिलांजली दी। 

       बसंती कभी सोचती थी कि लोगों के तो साटी बुसेन्दा* पर उसके चांवल क्यों ? चलो देखते हैं दुर्भाग्य कितनी भताक देता है असम्भव न बंश में था ना दूध में, कमर कसी और माँ सरस्वती सेवा भाई की पढ़ाई और माँ की देखभाल में जुट गई। माँ ने लाख समझाया कि दूसरी शादी कर ले अकेला जीवन पहाड़ जैसे होता है सामर्थ्य तक चढ़ेगी पर बाद में क्या होगा ? आज मैं हूँ कल को भै-भोज* किसी के नहीं देखते। लेकिन बसंती ने भीष्म प्रण ली थी कि अब दूसरी शादी नहीं करेगी उसे पति जात से भय लगने लगा था। 

       बेमेल होने के बाद भी जिस मर्द को इतना चाहा दिन में दसियों बार फोन पर खुसखबर लेती थी। कितना अनुरोध किया था कि या मेरी पोस्टिंग अपने कार्यक्षेत्र में कर दो या आप ही यहाँ आ जाओ पर वह मर्यादा की सौतन पहले से बन बैठा था तो कैसे सात फेरे का महत्व समझता। अब आगे धोका नहीं खाना चाहती मैं भी उमा की बेटी हूँ अपने बच्चे नहीं होंगे तो कौन सी जागीर बंशहीन हो जाएगी, ये इतने विद्यार्थी मेरे बच्चे तो है मदर टेरिसा तो इंग्लैंड से आकर कलकत्ता में भविष्य के पौधौ को सींचती रही, ये तो मेरे मुल्क और मेरी थाती के बच्चे हैं। 

       अब बसंती का तन मन धन इलाके के गरीब बच्चों को संवारने, निआश्रितों और धार्मिक सेवा में इतना तेज भागने लगा कि पता नहीं चला कब मांग के बालों पर बर्फ गिर गयी। कुछ साल बाद माँ भी नाती सुख देख बैकुण्डवासी हो गयी थी। भुला दिनेश बच्चों सहित शहर में प्रवासी बन गया था। 

      अब अधेड़ बसंती ही पीताजी की बंजर खोळी* खोलनहार, छुटियों में चौक, कुलाणा, बाड़ी-सगौड़ी* साफ करती, लकड़ी पाणी कठ्ठा करती मकान पर धुंवाँ लागाती, द्यबतों* के थान* में दिया जलाती, तीनभित्या मकान के आठ कमरों और बाहर जगंले के बल्ब ऑन करती, घरबार में जाकर दादा दादी की निशानी कुठारों और फुँगलों को अगरबत्ती करती, रोटी सब्जी बनाती पितरों को अग्याल* रखती, मोरी पर पंचमी को जौ लगाती दिवाली में फूल माला। और फिर फुर्सत पर डंडयाली में बैठे पीताजी के भाग और अपने भाग की हंसी ठिठोली देखती कि कौन असली बसंत। 

       उसके प्रण ने जीवन को स्वयं के नाम का पर्याय बसंत बनाने के लिए कभी विश्राम नहीं लिया शिक्षा सेवा में रहते हुए आदर्श शिक्षक राष्ट्रपति सम्मान, निआश्रित सेवा में कई समाज सेवा सम्मानों से नवाजी गयी। सेवामुक्त होने के बाद थाह नहीं ली पिताजी के त्यभित्या* मकान को दुबारा सजाया संवारा, बगल में और कमरे बनाये फिर घर में ही निःशुल्क बाल विद्यालय खोल दिया।  

     अब दिन रात बच्चों की चैं चैं पैं पैं से तिबारी महकती है, बाड़ी सगौड़ी में झकमकार नाना प्रकार के पुष्प और सब्जियाँ खिलते हैं, गौशाला में दुध्यार* गाय और उसकी बछिया रंभाती है, और इन सबके लिए एक झुकी कमर, आंखों पर जंरीर वाला चश्मा और सफेद मुंड की यौवना दिन रात खटकती। आज चरण सिंह के घर में बारामास बसंत कभी खिलखिलाकर हंसता कभी मंद मंद मुस्कारता और इसकी सुंगध से मोहित बसंती घिंदुड़ी जैसी फुदकती रहती और चरण सिंह का भाग्य उस डंडयाली को छोड़ चुपचाप कहीं चला गया था हमेशा के लिए।


गढवाली शब्दों का अर्थ 

भाग - भाग्य, ठंगरा - ठूंठ, रामस्वेणी - विधवा, बेसुणा - कुरूप, खड़खड़ी - बिना पेड़ पौधौं का भयावह। गंगलौड़ा - गोल पत्थर। डंडयाली - दोमंजिले वाला कमरा। जांठी - लाठी । लकारवान - योग्यवान। गड़गड़ा - अकड़ालू। भताक - ऊंचाई से गिरना। धार - रिज लाईन। जंदरा - हस्त चालक चक्की। साटी - धान। बुस्येन्दा - बाली पर दाना न बनना। भै-भोज - भय्या भाभी। खोली - मकान का मुख्य बड़ा दरवाजा। कुलाणा - मकान का पिछवाड़ा। बाड़ी सगौड़ी - बगीचे, द्यबता - देवता । थान -  मंदिर। अग्याल - नैवेद्य। त्यभित्या - तीन दिवालों वाला। दुध्यार - दूध देने वाली।

@ बलबीर राणा 'अड़िग' 

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